श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०५१ ] * गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा * १६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 (गणेशभक्त)-को गणपतिस्वरूप मानकर उसीका पूजन | पूजन करे, तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको सन्तुष्टकर हवनके शेष करना चाहिये। उसके पूजनसे गणेशजीको जितनी | कार्य सम्पन्न करे ॥ २७ ॥ प्रसन्नता होती है, उतना स्वयंके पूजनसे नहीं ॥ २० ॥ | हवनकी आहुति-संख्याका दशांश तर्पण करे और सम्पूर्ण रोगोंसे होनेवाली पीड़ाओंसे मुक्तिके लिये | तर्पणके दशांशके रूपमें वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको सपत्नीक गणेशजीकी तीन उत्तम मूर्तियोंकी जो नौ दिनोंतक पूजा | तथा कुछ अन्यको भी भोजन कराये ॥ २८ ॥ करता है, उसकी सभी पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं ॥ २१ ॥ | उन्हें आभूषण, वस्त्र तथा शक्तिके अनुसार दक्षिणा सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल, काँसा, मोती या मूँगेसे | प्रदान करे तथा उनकी पत्नियों एवं अन्य स्त्रियोंको भी निर्मित मूर्ति भी यह सब प्रदान करती है ॥ २२ ॥ | वस्त्रसहित अलंकार प्रदान करे ॥ २९ ॥ हे देवि ! इस प्रकार व्रत करनेपर तुम सम्पूर्ण | सिद्धि-बुद्धिसहित गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये कामनाओंको प्राप्त करोगी। जब भाद्रपदमासमें चतुर्थी | वित्तशाठ्य (धनसम्बन्धी कृपणता) न करते हुए अपने तिथि प्राप्त हो, तो उस तिथिको अपने वैभवके अनुसार | वैभवके अनुसार आचरण (गणेश-पूजन) करे ॥ ३० ॥ आदरपूर्वक महान् उत्सवका आयोजन करना चाहिये। | तत्पश्चात् अपने सुहृज्जनोंके साथ स्वयं भी वादन-गायनसहित गणेशजीकी कथाका श्रवण करते | आदरपूर्वक भोजन करे। दूसरे दिन मूर्तिको प्रसन्नतापूर्वक हुए रात्रि-जागरण करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ | पालकीमें स्थापित करे। उसे छत्र, ध्वज, पताकाओं और [अगले दिन] प्रभातकालमें निर्मल जलमें स्नानकर | चँवरोंसे सुशोभित करे। उसके आगे-आगे किशोर पूर्वकी भाँति वरदायक देव भगवान् गणेशका पूजन करे, | दण्ड-युद्ध करते चलें ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर हवन-कार्य आरम्भ करे ॥ २५ ॥ | वाद्यवादकोंके द्वारा किये जाते हुए वेणु, वीणा, जपकी सांगताके लिये कुण्ड या स्थण्डिलमें | मृदंग, भेरी, पटह आदिके घोष, गायकोंके गायन और जपका दशांश हवन करे, तत्पश्चात् पहले [देव- | नृत्यांगनाओंके नृत्यके साथ उसे किसी विशाल सरोवरमें प्रीत्यर्थ] बलिदान करके फिर पूर्णाहुति करे ॥ २६ ॥ | ले जाकर जलमें विसर्जित करे, तत्पश्चात् वादन और तदनन्तर गौ, भूमि, वस्त्र, धन आदिसे आचार्यका | गायनके साथ अपने घरको वापस लौट आये ॥ ३३-३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हिमवान्-पार्वतीसंवादमें चतुर्थीव्रतविधिवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥ ❖ ── ✦ ── ❖ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा पार्वतीजी बोलीं—हे पिताजी! आपने गणेश- | थी ? ॥ २ ॥ चतुर्थीकी महिमा [एवं उसके अनुष्ठानादिका] भलीभाँति | मेरे संशयका उच्छेदन करनेके लिये इसे मुझसे वर्णन किया, मैं अब आपके अमृततुल्य वचनों [-के | विस्तारपूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी श्रवण]-से प्रसन्न हो गयी हूँ; परंतु हे हिमालय! मुझे | कथाके विषयमें जो प्रश्न करता है, जो कथाको कहता कुछ संशय है, आप उसका निवारण करें ॥ १ ॥ | है और जो अन्य कोई भी श्रवण करता है—वे तीनों हे महीधर ! पूर्वकालमें इस व्रतको किस-किसने | मनुष्य पुण्यके भागी होते हैं। उनका जीवन, जन्म लेना, किया था और इस [व्रत-विधि]-को किसने किससे | ज्ञान और कर्म सफल हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥ कहा था तथा किसने कौन-सी सिद्धि प्राप्त की | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] इस प्रकार