श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उन (पार्वती)-के द्वारा पूछे जानेपर हिमवान्ने अनेक मनुष्योंके द्वारा किये गये वरदायक गणेशजीके व्रतके विषयमें कहा- ॥ ५ ॥ हिमवान् बोले- हे पार्वती ! सुनो, मैं तुमसे इस सर्वसिद्धिकर व्रतके इतिहाससहित पुरातन संवादको कहता हूँ। गिरिश्रेष्ठ कैलासमें सुखासनमें विराजमान और देवताओं, गन्धर्वों एवं श्रेष्ठ ऋषियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करते हुए जगद्गुरु भगवान् शंकरको नमस्कार करके और उनका स्तवनकर महान् तेजस्वी षडानन स्कन्दने उनसे पूछा - ॥ ६-७१/२ ॥ स्कन्द बोले- हे देवाधिदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भक्तोंको अभय करनेवाले ! मैंने आपकी कृपासे अनेक दिव्य कथाओंका श्रवण किया; तथापि हे तात ! [उनका श्रवणकर] मैं वैसे ही तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ; जैसे बारम्बार अमृतका पान करनेपर भी तृप्ति नहीं होती। हे देव ! अब मुझे सर्वार्थसिद्धि देनेवाले व्रतके विषयमें बताइये, जिसका अनुष्ठान करनेसे वरदायक गणेशजीकी कृपासे सिद्धियाँ साधक मनुष्यकी हथेलीपर स्थित होनेके समान [सुलभ] हो जाती हैं॥ ८-१०१/२ ॥ शिवजी बोले- हे स्कन्द ! तुम्हारे द्वारा पूछा गया प्रश्न सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, अतः तुम्हें साधुवाद है। हे पुत्र ! मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये गणेशजीको प्रिय, महासिद्धि प्रदान करनेवाला और पृथ्वीपर किये जानेवाले व्रतोंमें उत्तम [इस गणेशचतुर्थी] व्रतको कहता हूँ ॥ ११-१२ ॥ हे कार्तिकेय ! [यह व्रत ] सभी पुरुषार्थोंका साधक है। हे स्कन्द! यज्ञ, दान, जप और होमादिके बिना भी यह व्रत सर्वसिद्धिकर और पुत्र-पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला है। यह महत्तम व्रत राजा, राजकुमार या राजाके मन्त्रीको भी शीघ्र वशमें करनेवाला है। इस व्रतके प्रभावसे पुरुष अनेक जन्मोंमें एकत्रित महापापों और उपपापोंसे क्षणभरमें मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंका भाजन हो जाता है। इस व्रतके समान गणेशजीको प्रीति प्रदान करनेवाला पृथ्वीपर कोई अन्य व्रत नहीं है ॥ १३-१६१/२ ॥ स्कन्दजी बोले- हे तात ! यह महान् उत्तम व्रत किस मासमें होता है ? इसका विधान क्या है और पूर्वकालमें किसने इसका आचरण किया था ? यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो यह सब मुझसे कहिये ॥ १७-१८ ॥ शिवजी बोले- श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको स्नान करके गुरुके घर जाय। गुरुको प्रणाम करके तत्पश्चात् उनका विधिपूर्वक पाद्य, आचमन, वस्त्र एवं श्रेष्ठ आभूषणोंसे पूजन करके और उन्हें भली प्रकार प्रसन्न करके उनकी आज्ञासे व्रतको आरम्भ करे ॥ १९-२० ॥ [स्कन्दजी बोले-] हे तात ! आप मुझे सर्वसिद्धिकारक और कामनाओंको प्रदान करनेवाले गणेशजीके व्रतका उपदेश कीजिये। हे प्रभो ! हे गुरो ! आप ही मेरे लिये श्रीगणेशजी हैं। हे प्रभो ! मैं आपकी आज्ञासे इस उपदिष्ट व्रतका अनुष्ठान करूँगा, जिससे कि मैं निस्सन्देह समस्त कामनाओंका आश्रय बन सकूँ ॥ २१-२२ ॥ [ शिवजीने कहा - ] गुरुके द्वारा व्रतका उपदेश दे देनेपर वह उनके साथ गंगाजीके किनारे जाय अथवा देवमन्दिरके समीपवर्ती सरोवरमें विधिपूर्वक स्नान करे। हे षडानन ! सफेद सरसों तथा तिलकी खली एवं आँवलेके चूर्णके उबटनको लगाकर स्नान करे, तत्पश्चात् [सन्ध्या-वन्दनादि ] नित्यकर्मका सम्पादनकर घर जाय ॥ २३-२४ ॥ [घर जाकर ] शुद्ध आसनमें बैठकर गणेशजीका पूजन करके तत्पश्चात् गुरुके द्वारा उपदिष्ट विधिसे व्रतका आरम्भ करे। श्रावण शुक्लपक्षकी चतुर्थीको गणेशजीकी पार्थिव मूर्ति बनाकर उस दिनसे भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीतक प्रतिदिन उसका पूजन करे ॥ २५-२६ ॥ इस उत्तम व्रतको करते समय ब्रह्मचर्यमें स्थित रहना चाहिये। व्रती या तो उपवास रखे या दिन और रात्रिके बीच एक बार भोजन करे या केवल रात्रिमें एक बार भोजन करे अथवा बिना माँगे प्राप्त भोजन एक बार करे। दिनके चतुर्थ प्रहरमें सम्यक् रूपसे बैठकर लवणरहित, मधुर हविष्यान्नका भोजन करे और भक्तिपूर्वक व्रतका आचरण करे ॥ २७-२८ ॥