श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header] उ०ख०-अ०५१ ] * गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा * १७१
[Column 1] हे षडानन! [उस दिन] गणेश्वर गणेशजीके षडक्षर, अष्टाक्षर अथवा एकाक्षर मन्त्रका जप करे ॥ २९ ॥ हे स्कन्द ! अथवा गणेशजीके दशाक्षर या द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करे। प्रतिदिन एक लाख या दस हजार जप करना चाहिये ॥ ३० ॥ [यदि यह जप-संख्या सम्भव न हो तो] इस जप-संख्याका आधा या इस आधेका आधा जप करना चाहिये तथा जपका दशांश हवन करना चाहिये। व्रतके समय भगवान् गणेशजीका निद्रा-तन्द्रासे रहित होकर अहर्निश ध्यान करते रहना चाहिये ॥ ३१ ॥ भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथि प्राप्त होनेपर एक पल अथवा आधे पल या चौथाई पलकी गजानन गणेशजीकी सोनेकी मयूरवाहना या मूषक- वाहना सुन्दर प्रतिमाका निर्माण कराये और लघु मण्डप बनाकर उसके नीचे धान्यराशि फैलाये तथा उसपर सोने, चाँदी या ताँबेके बने कलश स्थापित करे। उस कलशपर सोने, चाँदी या ताँबेका [धान्यपूर्ण] पात्र रखे। तदनन्तर पंच पल्लव और पंचरत्नसे युक्त पात्रसहित कलशको एक जोड़ा वस्त्रमें लपेट दे, फिर पहले पीठपूजा करके तब वहाँ उन सर्वव्यापक गणेशजीको स्थापित करे। हे षडानन! [स्थापनाके समय] उनके पूर्वोक्त मूल मन्त्रों तथा वैदिक मन्त्रोंका पाठ करता रहे ॥ ३२-३६ ॥ तदनन्तर गजानन भगवान् गणेशजीका ध्यानकर परम प्रसन्नतापूर्वक उनका आवाहन करे और उन्हें आसन, पाद्य और आचमनीय जल प्रदान करे ॥ ३७ ॥ हे स्कन्द! [तत्पश्चात्] उन्हें रत्नयुक्त जलसे अर्घ्य दे और पंचामृतसे शुभ स्नान कराये। तदनन्तर सुगन्धित जलसे उन परमेश्वरको स्नान कराये ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उन्हें धोती और उत्तरीय-दो रक्तवर्णके वस्त्र और उत्तम यज्ञोपवीत प्रदान करे और उन परमेश्वरको अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित करे ॥ ३९ ॥ तत्पश्चात् गन्ध, अक्षत, धूप, दीप और विविध प्रकारके नैवेद्योंसे भी पूजन करे तथा बड़ा, पुआ, लड्डू, शालि चावलसे बनी खीर आदि व्यंजनोंको पञ्चामृतों (दुग्ध, दधि, घृत, मधु तथा शर्करा)-के सहित उन
[Column 2] परमेश्वरको भोजनार्थ अर्पण करे। तदनन्तर उनके हाथमें चन्दनका लेप लगाये और फल तथा ताम्बूल अर्पित करे ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् गणेशजीको सुवर्णकी दक्षिणा चढ़ाकर उनके ऊपर छत्र लगाये तथा व्यजन एवं चँवर डुलाये। तदनन्तर आरती करके मन्त्रपुष्पांजलि देकर स्तुति- प्रार्थना करे। तदनन्तर गणेशजीकी उनके सहस्रनामोंसे स्तुति करके ब्राह्मण-पूजन करे। रात्रिमें जागरण करके गीत-नृत्य आदि मांगलिक कृत्य करे ॥ ४२-४३ ॥ प्रभातकालमें निर्मल जलमें स्नानकर यथाविधि नित्य कर्मोंका सम्पादनकर भगवान् गणेशका पूर्ववत् पूजन करे, तदनन्तर हवन करे। अनेक प्रकारके द्रव्योंसे हवन करके आचार्यका पूजन करे। तदनन्तर गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण आदिको गुरुको निवेदित करे ॥ ४४-४५ ॥ अन्य ब्राह्मणोंको भी पर्याप्त मात्रामें दक्षिणा प्रदान करे, तत्पश्चात् एक सौ आठ ब्राह्मणोंको भोजन कराये। यदि शक्ति हो तो उससे भी अधिक ब्राह्मणोंको भोजन कराये अथवा इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। [तदुपरान्त] दीनों, अन्धों एवं दयनीय जनोंको खीरसहित भोजन प्रदान करे। ब्राह्मण-भोजनके पश्चात् ब्राह्मणोंको पुनः दक्षिणा दे और उनसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहणकर मित्रों एवं बन्धु-बान्धवोंसहित स्वयं मौन रहकर आदरपूर्वक भोजन करे ॥ ४६-४८ ॥ शिवजी बोले-हे स्कन्द! इस प्रकार मैंने तुमसे वरदाता गणेशजीके शुभ व्रतके विषयमें कहा, जो मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ४९ ॥ स्कन्दने कहा-हे पितः ! मुझे भलीभाँति बतलाइये कि इस व्रतका किसने [पूर्वकालमें] पालन किया था और इसके प्रभावसे समस्त सम्पत्तियोंको अविकल रूपसे प्राप्त किया था ॥ ५० ॥ महादेवजी बोले-हे महाबाहु कार्तिकेय ! तुम आदरपूर्वक आरम्भसे [इस वृत्तान्तको] श्रवण करो। इस विषयमें मैं तुमसे एक पुरातन इतिहास कहता हूँ-पूर्वकालमें कर्दम नामवाला एक महान् धर्म-
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