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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 656 में से

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पृष्ठ 174

१७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- परायण राजा हुआ। उसने अपने तेजसे समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथिवीका पालन किया। उसके गुणोंके वशीभूत होकर देवता लोग नित्य उसकी सभामें स्थित रहते थे॥५१-५२॥ दैवयोगसे किसी समय भृगुमुनि उसके भवनमें आये। तब राजाने उठकर अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें श्रेष्ठ आसनपर बैठाकर गुरुके समान उनका पूजन किया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भृगु जब भोजनकर [अपने आसनपर] स्थित हुए तब राजाने कहा— ॥ ५३-५४॥ राजा बोले—हे भगवन्! हे सम्पूर्ण तत्त्वोंके जाननेवाले! मैं कुछ पूछता हूँ, उसे बतलायें। मैं पूर्वजन्ममें कौन था और मैने कौन-सा सुकृत (पुण्य कार्य) किया था, जिसके कारण मुझे ऐसा कण्टकरहित (शत्रुहीन) राज्य प्राप्त हुआ? ऐसा राज्य न तो किसी नृपतिको प्राप्त हुआ और न ही आगे किसीको प्राप्त होगा॥५५-५६॥ मैं गन्धर्वों, नागों, राक्षसों और देवताओंका भी पूज्य हूँ; हे मुने! कुबेरकी सम्पत्तिसे तुलना करनेवाली मेरी सम्पत्तिको देखिये। तीनों लोकोंमें जो कुछ भी रत्नसदृश अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है, उसे मैं अपने तेजसे यहाँ ले आया हूँ। जिस-जिस पदार्थकी मैं इच्छा करता हूँ, उस-उसको मैं अपने भवनमें स्थित देखता हूँ॥ ५७-५८॥ हे प्रभो! किस कर्मसे यह सब मुझे प्राप्त हुआ, उसे बताइये। हे पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ! मैं उस पुण्य कार्यको पुनः करना चाहता हूँ॥५९॥ भृगुजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! मैं योगबलसे बतलाता हूँ—तुम पूर्वजन्ममें पवित्र आचरणवाले दुर्बल क्षत्रिय थे॥६०॥ तुम अपने परिवारका भरण-पोषण करनेके लिये अनेक प्रकारके कर्म किया करते थे, परंतु तुम्हारे द्वारा किया जानेवाला कर्म फलप्रद नहीं होता था ॥ ६१॥ तब भार्या और सन्तानोंके निष्ठुर वाक्योंसे अत्यन्त पीड़ित होकर पत्नी और पुत्रोंसे बिना बताये तुम गहन वनको चले गये ॥ ६२॥

वहाँ सभी दिशाओंमें भ्रमण करते हुए तुमने सिद्धासनमें विराजमान और श्रेष्ठ मुनियोंसे सेवित [मुनिश्रेष्ठ] सौभरिको देखा ॥ ६३॥ वे शिष्योंको दुःखोंका नाश करनेवाली महाविद्याका उपदेश दे रहे थे। हे नृप! उन दिव्यर्षि सौभरि तथा अन्य ऋषिगणोंको देखकर तुम दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। तब उन सबके द्वारा तुम्हारा अभिनन्दन किया गया और मुनिद्वारा प्रस्तुत किये गये सुन्दर आसनपर तुम बैठ गये। तदनन्तर अवसर पाकर तुमने उन दिव्य मुनिसे आदरपूर्वक इस प्रकार पूछा— ॥ ६४-६५१/२ ॥ क्षत्रियने कहा—हे स्वामिन्! हे मुने! मैंने इस संसारके दुःखोंसे बहुत-अधिक कष्ट पाया है। पत्नी, सन्तान और मित्रोंके वचनरूपी बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हूँ, फिर भी उन निष्ठुर सुहृदोंके प्रति मेरे मनमें वैराग्य नहीं होता। हे मुने! मैं सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास [आदि द्वन्द्वों]-से भी बहुत पीड़ित हूँ। मुझे इस दुःखरूपी सागरसे पार करानेवाला कोई उपाय बतलायें ॥ ६६-६८॥ शिवजी बोले—[हे स्कन्द !] उसके इस प्रकारके वचन सुनकर करुणापूर्ण चित्तवाले सौभरिमुनिने राजाके दुःखका विनाश करनेवाले उपायका चिन्तन किया; तत्पश्चात् सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले उस उपायको उस क्षत्रियसे कहा— ॥ ६९१/२ ॥ ऋषि बोले—[हे क्षत्रिय!] मैं जिस व्रतको कह रहा हूँ, उसे स्थिर मनसे करो ॥ ७० ॥ इसके अनुष्ठानमात्रसे सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है। यह ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और ब्रह्मर्षियोंद्वारा किया गया है ॥ ७१ ॥ इससे वे सम्पूर्ण दुःखोंसे मुक्त हो गये और उन्होंने उत्तमोत्तम सिद्धि प्राप्त की। वरदायक गणेशजीका यह व्रत धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ ७२ ॥ क्षत्रियने कहा—वे गणेशजी कौन हैं? उनका शील कैसा है? उनका रूप कैसा है? उनका स्वभाव कैसा है? उनके क्या कर्म हैं? वे कैसे उत्पन्न हुए? यह सब यदि मेरे सुननेयोग्य हो और यदि मुझपर आपकी Kalyana Visheshank 2021_Section_7_1_Back