श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०५१ ] * गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा * १७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कृपा हो तो मुझसे कहिये ॥ ७३ ॥ ऋषि बोले-जो नित्य, निर्मल, शोकरहित, ज्ञानस्वरूप, परमार्थरूप, आदि-मध्य और अन्तसे रहित और सीमारहित ब्रह्म है, उसीको सन्तजन गणाधिपति गणेश कहते हैं ॥ ७४ ॥ जिनसे ओंकारकी उत्पत्ति हुई, जिनसे वेद प्रकट हुए और जिनसे जगत् उत्पन्न हुआ, जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है, उन्हें ही गणनायक गणेश जानो ॥ ७५ ॥ जगत्की सृष्टि करनेकी कामनासे ब्रह्माजीने जिनको सन्तुष्ट करनेके लिये पूरे सौ वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तप किया था। तदनन्तर उन प्रसन्न हुए गणेशजीका हर्षित मनवाले विधाता (ब्रह्माजी)-ने अनेक प्रकारके उपचारों, दिव्य रत्नों और फलोंसे पूजन किया ॥ ७६-७७ ॥ उन्होंने अपने मानसिक संकल्पसे सिद्धि-बुद्धि नामक दो कन्याओंको उत्पन्नकर उन गणेशजीको [पत्नीरूपमें] प्रदान किया, [तब उनकी आराधनासे] प्रसन्न होकर उन सर्वव्यापी भगवान् गणेशने उन्हें एकाक्षरी विद्या प्रदान की ॥ ७८ ॥ तब वर प्राप्त करके ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की। पूर्वकालमें विष्णुने [भी] उन्हें षडक्षर मन्त्रसे प्रसन्न किया था ॥ ७९ ॥ उन श्रीहरिने मूर्तिका निर्माणकर पूर्वमें कहे गये विधानसे उनका व्रत किया। उन्होंने पूरे एक वर्षतक व्रतसम्बन्धी नियमोंका सांगोपांग पालन किया था ॥ ८० ॥ तदनन्तर गणेशजीसे वर प्राप्तकर सम्पूर्ण जगत्का पालन किया। इस प्रकार उन गणेशजीको सम्पूर्ण भूमण्डलमें स्तुत जानिये ॥ ८१ ॥ वे गणेशजी विश्वरूप, अनादि और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं। सम्पूर्ण दुःखोंसे विमुक्तिके लिये तुम उनका प्रयत्नपूर्वक सम्यक् रूपसे आराधन करो ॥ ८२ ॥ क्षत्रियने कहा-हे मुनिवर! अब मुझे यह बताइये कि इस श्रेष्ठ व्रतको किस समय और किस विधिसे करना चाहिये। सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्तिके लिये मैं आपके कथनानुसार इस व्रतको करूँगा ॥ ८३ ॥ मुनि (सौभरि) बोले-श्रावणमासके शुक्ल- पक्षकी चतुर्थी तिथिको इस व्रतका आरम्भ करे और भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीतक परम भक्ति- पूर्वक इसे करता रहे। गणेशजीकी पार्थिव मूर्तिका षोडशोपचार पूजन प्रतिदिन भक्तिपूर्वक करे, तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। हे राजन्! तुम ऐसा करो, इससे तुम अपनी सभी मनोकामनाओंको प्राप्त कर लोगे ॥ ८४-८५ १/२ ॥ भृगु बोले-हे सुव्रत! यह सुनकर तुमने उस व्रतको किया था। सौभरिमुनिके आश्रम-मण्डलमें जब तुम्हारा व्रत समाप्त हुआ तो गणेशजीकी कृपासे तुम्हारा घर दिव्य हो गया ॥ ८६-८७ ॥ वह घर दिव्य स्त्री-पुरुषोंसे युक्त, दास-दासियोंसे समन्वित, वेदघोषसे गुंजायमान और गोरूपी धनसे परिपूर्ण था। दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तुम्हारी पत्नी वैसे ही सुसज्जित तुम्हारे पुत्रोंके साथ आश्चर्यचकित होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ८८-८९ ॥ 'मेरे पति कब आयेंगे'- इस प्रकार सोचते हुए वह चिन्तामग्न थी, तभी तुम मुनिसे आज्ञा लेकर अपने घर चले गये। उस दिव्य भवनको छोड़कर तुम अपने [पुराने] घरको ढूँढ़ने लगे, तभी तुम्हारी पत्नीद्वारा भेजे गये लोग तुम्हें उस भवनमें ले आये ॥ ९०-९१ ॥ तब तुम्हें भी उन वरदायक गणेशजीका प्रभाव ज्ञात हुआ। उसी व्रतके प्रभावसे तुम्हें इस जन्ममें राज्य प्राप्त हुआ ॥ ९२ ॥ शिवजी बोले- [हे स्कन्द!] भृगुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर हर्षित मनवाले राजा कर्दमने वह सब किया, जो भृगु [मुनि]-द्वारा कहा गया था ॥ ९३ ॥ इस व्रतके प्रभावसे राजा ज्ञान और वैराग्यसे युक्त होकर यथेच्छ भोगोंका भोग करके तथा पुत्रोंको अपने पदपर स्थापितकर गणेशजीके उस धामको चले गये, जहाँसे पुनरावर्तन नहीं होता। हे स्कन्द! व्रतोंमें उत्तम यह व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ९४-९५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_7_2_Front