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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 656 में से

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पृष्ठ 176

१७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] इस तरहका [प्रभावशाली] अन्य कोई व्रत लोकमें नहीं सुना गया है। हे स्कन्द! यदि तुम्हारी [कोई] इच्छा हो, तो इस सर्वार्थसाधक व्रतको करो ॥ ९६ ॥ [यह व्रत] देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, ऋषियों और मनुष्योंद्वारा किया गया है। इसे [राजा] नल, [रानी] इन्दुमती और राजा चन्द्रांगदने भी किया था और सम्पूर्ण मनोकामनाओंको सम्यक् रूपसे प्राप्तकर [अन्तमें] वे गणेशजीके धामको चले गये ॥ ९७ ॥

[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] गिरिराज [हिमवान्] बोले—[हे पार्वती!] इस प्रकार मैंने तुमसे इतिहाससहित इस महान् व्रतको कहा। तुम मनमें वरदायक गणेशजीका ध्यान करके इस व्रतको करो ॥ ९८ ॥ हे महाभागे! तुम इस व्रतको करके [भगवान्] शंकरको [अवश्य] पा लोगी। [हे पुत्री!] तुम्हारे स्नेहवश मैंने इसे आज तुमसे कहा है। इसे [अन्यके सम्मुख] प्रकट मत करना ॥ ९९ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हिमवान्-पार्वती-संवाद' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ बावनवाँ अध्याय राजा नलके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

[बायाँ स्तम्भ - नीचे] पार्वतीजी बोलीं—हे पिताजी! नल कौन थे? उन नलने इस [गणेशचतुर्थी] व्रतको किस कारणसे किया था?—यह मुझे बतलाइये। [गणेशजीके व्रतविषयक] इन आख्यानोंको श्रवण करनेसे मेरे मनको शान्ति मिल रही है॥ १॥ हिमवान् बोले—पूर्वकालमें निषधदेशमें नल नामवाले एक महान् राजा हुए थे। वे ब्राह्मणभक्त, वेदज्ञ, शूरवीर, दानी, प्रतिष्ठित, धनवान्, मननशील, रथवाहन, खड्ग-बाण-धनुष-तूणीर और कवच धारण करनेवाले, बलवान्, अस्त्र-विद्यामें निपुण, देवताओंके लिये भी पूज्य, त्रिलोकीमें गमन करनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न और पवित्र [हृदयवाले] थे॥ २-३॥ उनके गुणोंका वर्णन करनेमें [सहस्र मुखवाले] शेष भी मौन हो जाते थे। उनके पास संख्यासे परे अर्थात् असंख्य घोड़े, हाथी, रथी, धनुर्धारी, शस्त्रधारी और आग्नेयास्त्रधारी थे। उनके भयसे दिक्पालोंसहित इन्द्रादि देवता [भी] काँपते थे॥ ४-५॥ उनकी पत्नी दमयन्ती [साक्षात्] सौन्दर्यका निवास- स्थान थी। ब्रह्माजीने सम्पूर्ण [दोषोंका] दमनकर और [रमणीक पदार्थोंके] सारभागको ग्रहणकर उसका निर्माण किया था, इसीलिये वह 'दमयन्ती' नामसे प्रसिद्ध हुई।

[दायाँ स्तम्भ - नीचे] ब्रह्माजीने तीनों लोकोंकी स्त्रियोंके सौन्दर्यको दमयन्तीमें प्रतिष्ठित किया था॥ ६-७॥ वह [दमयन्ती] अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत और अनेक मणियोंसे विभूषित रहती थी। उसका कण्ठप्रदेश मुक्ताहारसे सुशोभित रहता था तथा वह सुन्दरी [सम्पूर्ण] सद्गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ८॥ उन (राजा नल)-का पद्महस्त नामक महान् पराक्रमी मन्त्री था, जो बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और नीतिमें अंगिराके समान था॥ ९॥ ऊँचाईमें वे (नरेश) सुमेरुपर्वतके समान और गाम्भीर्यमें समुद्रके सदृश थे। किसी समयकी बात है, वे महामनस्वी राजा नल सभागृहमें नृपसमूहके मध्य विराजमान थे; सुन्दर स्वरूपवाली दर्शनीय अप्सराएँ उनके सम्मुख नृत्य कर रही थीं। ब्रह्मर्षिगणोंसे संयुक्त उन (राजा नल)-की वन्दीजन स्तुति कर रहे थे। उसी समय गौतममुनि राजाके पास आये॥ १०-१२॥ राजाने उठकर उन्हें आदरपूर्वक सुन्दर आसनपर बिठाया, तदनन्तर परम भक्तिभावसे उनका पूजन किया और तब राजा नलने उनसे पूछा—॥ १३॥ [राजा] नल बोले—हे स्वामिन्! हे महामुने! आपके दर्शनसे मैं अनुगृहीत हो गया हूँ। आज [आपके

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