श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०५२ ] * राजा नलके पूर्वजन्मका वृत्तान्त * १७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शुभागमनसे] मेरा जन्म, मेरा राज्य, मेरे माता-पिता, मेरा | तुमने उन मुनिको भक्तिभावसे प्रणाम किया॥ २४-२५॥ कुल और मेरा जीवन सफल हो गया। हे महामुने! अब | तब दीनों और अनाथोंके प्रति दयाभाव रखनेवाले आप अपने आनेका कारण शीघ्र बतलायें॥ १४१/२ ॥ | उन कौशिकमुनिने तुम्हें उठाया और दुखी जानकर गौतम [ मुनि ] बोले—हे नृप! मेरे मनमें तुम्हारे | आशीष देते हुए बोले—॥ २६ ॥ वैभवको देखनेकी महती इच्छा थी। स्वर्गस्थित ब्रह्मा, | मेरे [आराध्य] देवेश गजानन गणेशजी तुम्हारे इन्द्र, विष्णु और शूलपाणि शिव आदि देवता भी तुम्हारी | लिये कल्याण करनेवाले होंगे। उनके सौम्य आशीषको स्तुति (प्रशंसा) करते हैं। मृत्युलोकमें स्थित हुए भी तुम | सुनकर तुम्हें परम प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ २७ ॥ धन्य हो, जो कि मनुष्य और देवता तुम्हारी प्रशंसा करते | हे राजन्! तब तुमने उन विप्र [श्रेष्ठ]—से सम्पूर्ण हैं॥ १५-१६॥ | कामनाओंको प्रदान करनेवाला, दरिद्रताका नाश करनेवाला मैं नित्यतृप्त होते हुए भी तुम्हारी इस पूजा और | और भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाला कल्याणकारी उपाय तुम्हारे वैभवको देखकर तृप्त हो गया हूँ, इस समय मुझे | पूछा, तब कौशिकजीने तुमसे गणेशजीकी आराधना अनुज्ञा दीजिये, मैं अपने आश्रमको जाऊँगा॥ १७ ॥ | करनेको कहा॥ २८१/२ ॥ नल बोले—हे वेद-वेदांगके ज्ञाता! हे ब्रह्मन्! हे | कौशिक बोले—हे नरेश! तुम गणेशजीका मात्र सर्वशास्त्रप्रवर्तक! हे दयानिधे! हे मुने! क्षणभर रुककर | एक मासतक व्रत करो। गणेशजीकी देखनेमें सुन्दर मेरे संशयको नष्ट कीजिये॥ १८ ॥ | लगे—ऐसी एक मिट्टीकी मूर्तिका निर्माण करो, उसकी मुनि बोले—हे महाराज! आपने उचित ही प्रश्न | पहले बतायी गयी विधिसे पूजा करो और उनकी किया है; मैं आपके प्रति स्नेहभाव होनेके कारण रुक | कथाका श्रवण करो। प्रतिदिन ऐसा करते हुए जब एक गया हूँ। आपकी आज्ञाका उल्लंघन तो नाग, [अन्य] | मास पूरा हो जायगा, तब तुम सिद्धि प्राप्त कर राजागण तथा देवता भी नहीं करते हैं॥ १९ ॥ | लोगे॥ २९-३०१/२ ॥ राजा (नल) बोले—हे ब्रह्मन्! अपना वैभव | मुनि बोले—ऐसा सुनकर उस भूपतिने पुनः देखकर मुझे स्वयं भी आश्चर्य होता है। यह सब मेरे किस | कौशिकसे कहा कि मैं गजाननको नहीं जानता हूँ, उनका पुण्य अथवा किस तपस्याके प्रभावसे हुआ? मैं पूर्वजन्ममें | स्वरूप मुझसे कहिये। उन देवदेवेश [-के स्वरूप]—को कौन था—यह भी यथार्थ रूपसे बतलाइये॥ २०१/२ ॥ | जानकर मैं उनका उत्तम व्रत करूँगा॥ ३१-३२ ॥ मुनि बोले—[हे राजन्!] तुम गौड़ देशके | उनके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वे मुनिश्रेष्ठ वाणीसे निकटवर्ती देशमें पिप्पल नामक पुरमें ज्ञानवान् और पवित्र, | परे स्वरूपवाले परब्रह्मस्वरूप गजानन गणेशजीद्वारा परंतु धनहीन क्षत्रिय थे। तुम अपनी पत्नी, सन्तानों और | अवतार लेकर धारण किये गये वैकारिक स्वरूपोंका मित्रोंके वाग्बाणोंसे अत्यन्त ताड़ित थे। अतः सबसे तुम्हें | वर्णन करते हुए बोले—॥ ३३१/२ ॥ विराग हो गया और तुम इन सबसे बिना कुछ कहे | कौशिक बोले—जो सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता, पिता, (बताये) गहन वनमें चले गये। वह वन वृक्षों, वल्लारियों, | माता और जगद्गुरु हैं; ब्रह्मा, इन्द्र, शिव और विष्णुके सिंहों, व्याघ्रों, हाथियों और मृगोंसे भरा हुआ था। वहाँ | जो ध्येय हैं; वे ही गजानन गणेशजी हैं॥ ३४१/२ ॥ जलमें उत्पन्न होनेवाले कमलादि पुष्पोंसे सुशोभित शीतल | [गौतम ] मुनि बोले—उनके इस प्रकारके वचन जलसे युक्त सरोवर भी थे॥ २१-२३१/२ ॥ | सुनकर तुम उन मुनीश्वरके चरणोंमें प्रणामकर उनकी इस वनसे उस वनमें घूमते हुए तुमने तपस्याके | आज्ञासे अपने घरको चले गये थे। तुमने श्रावण शुक्ल निधिरूप कौशिकमुनिके आश्रमको देखा, जो वेदघोष | पक्षकी चतुर्थीसे [गणेशजीके] उत्तम व्रतका आरम्भ (उच्च स्वरमें वेदमन्त्रोंके पाठ)—से गूँज रहा था। वहाँ जाकर | किया॥ ३५-३६॥