श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुमने गणेशजीकी शास्त्रोक्त पार्थिव मूर्तिका निर्माण | तुम त्रैलोक्यके मनुष्योंसे वन्दित हो और तुममें अचल किया और स्थिर अवस्थामें, बोलते हुए, मौनावस्थामें, | लक्ष्मी प्रतिष्ठित है। अब मुझे अनुमति दो; [क्योंकि] चलते हुए, शयनावस्थामें तथा भोजन करते हुए तुम | जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने निरूपित कर भगवान् गजाननका ध्यान करते रहने लगे। इससे तुम्हें | दिया ॥ ४०-४११/२॥ अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति हुई ॥ ३७१/२॥ | हिमवान् बोले-[हे पार्वती !] इस प्रकार गौतम [उस] व्रतके प्रभावसे तुम अनेक हाथियों, रथों, | (मुनि)-के चले जानेपर उनके वचनोंका विश्वास करके अश्वों आदिसे सम्पन्न, गोसम्पदा, धन-सम्पत्तिसे युक्त, | राजा नलने गणेशजीकी सुन्दर मूर्तिका निर्माणकर व्रतको दास-दासियोंवाले और श्रीमान् (ऐश्वर्यसम्पन्न) हो | करना आरम्भ किया। उस (राजा नल)-ने प्रतिदिन गये ॥ ३८१/२॥ | भक्तिपूर्वक गणेशजीकी कथाका श्रवणकर इस व्रतके [इष्ट] देव गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये तुमने | प्रभावसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त किया। हे पुत्री! इस सभी प्रकारके दान दिये और प्रसन्नतापूर्वक गणेशजीके | प्रकार मैंने नलद्वारा किये गये व्रतको तुम्हें बतला महान् मूल्यवान् मन्दिरका निर्माण कराया ॥ ३९१/२॥ | दिया ॥ ४२-४४॥ तुम यथेच्छ भोगोंका भोगकर समय आनेपर मृत्युको | गौतमाने उन्हें पूर्वजन्ममें किये गये व्रतका ही प्राप्त हुए और अब निषधदेशमें 'नल' नामक राजाके | उपदेश दिया था, उसके सम्पूर्ण प्रभावका कथन करनेमें रूपमें उत्पन्न हुए हो। उसी (गणेशाराधन)-के प्रभावसे | तो कोई भी समर्थ नहीं है ॥ ४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'राजा नलके द्वारा किये गये व्रतका निरूपण' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ ❖ ❖ तिरपनवाँ अध्याय हिमवान्-पार्वती-संवादमें राजा चंद्रांगदका उपाख्यान हिमवान् बोले- हे शुभानने! अब मैं राजा | पुत्री ! [सभामें लगे हुए] नील, लोहित और पीतवर्णके चंद्रांगद और उनकी पत्नी इन्दुमतीद्वारा किये गये इस | रत्नोंसे जटित स्तम्भोंमें अत्यन्त स्वच्छ वस्त्र भी प्रतिबिम्बित व्रतको तुमसे कहता हूँ। मालवदेशमें कर्ण नामका एक | होकर अनेक वर्णवाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ४-५॥ विख्यात नगर है, वहाँ चंद्रांगद नामका अत्यन्त पराक्रमी | राजाकी सर्वांगसुन्दरी पत्नी इन्दुमतीके नामसे विख्यात राजा हुआ था ॥ १-२॥ | थी। वह अत्यन्त साधु स्वभाववाली, महान् भाग्यशालिनी, वह [राजा] अणिमादि* सिद्धियोंसे युक्त, समस्त | पतिसेवामें रत रहनेवाली, गृहकार्योंमें उद्विग्न न होनेवाली, शास्त्रोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता, यज्ञ करनेवाला, दानी, महान् | देवताओं-अतिथियोंकी पूजा करनेवाली, धार्मिक, व्रतपरायणा ज्ञानी और वेद-वेदांगोंका पारगामी विद्वान् था ॥ ३ ॥ | और सास-ससुरकी सेवा करनेवाली थी ॥ ६-७॥ उसकी राजसभा अलौकिक सुधर्मा सभाको भी | धर्मात्मा होनेपर भी राजा चंद्रांगदको [शिकार पराभूत करनेवाली थी, उसमें लगी सूर्यकान्तमणिकी | खेलनेका व्यसन था, अतः ] उनके मन्त्रियोंने 'पापको किरणोंसे नेत्रोंके तेजका हरण-सा हो जाता था। हे | बढ़ानेवाली महाभयंकर जीवहिंसाको रोकिये' - इस प्रकारकी
- अणिमा (अणु जितना हल्का हो जानेकी सामर्थ्य), लघिमा (अत्यन्त लघु हो जानेकी अलौकिक शक्ति), गरिमा (अपने शरीरका भार इच्छानुसार बढ़ा सकनेकी सामर्थ्य), प्राप्ति (किसी भी पदार्थको प्राप्त करनेकी शक्ति), प्राकाम्य (सभी कामनाओंको पूर्ण कर सकनेकी शक्ति), महिमा (अपने शरीरको विशाल कर सकनेकी शक्ति), ईशित्व (दूसरोंपर प्रभुत्व कर सकनेकी शक्ति), वशित्व (वशमें करनेकी योगसे प्राप्त शक्ति), कामावशायिता (सत्यसंकल्पता)।