श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०५३ ] * हिमवान्-पार्वती-संवादमें राजा चंद्रांगदका उपाख्यान * १७७ उनसे बहुत प्रार्थना की। दैवयोगसे वे किसी समय शिकार | सुनकर वे राजा बोले— ॥ १९ ॥ खेलनेके लिये लकड़बग्घों, रुरु जातिके मृगों, [वन] | 'मैं हेमांगदका बलवान् पुत्र चंद्रांगद हूँ, सूकरों तथा अन्य पशु-पक्षियोंसे भरे वनमें गये ॥ ८-९ ॥ | मालवदेशके कर्णनगरमें मेरा निवास है। राक्षसीके भयसे उन्होंने नीले रंगका अँगरखा पहन रखा था और | अत्यन्त त्रस्त होकर मैं [इस तालाबकी] विशाल नीले रंगका ही साफा बाँध रखा था तथा ऊपरसे उत्तरीय | जलराशिमें प्रविष्ट हो गया और आप लोगोंके द्वारा धारण कर रखा था। उन्होंने अँगुलियोंकी रक्षाके लिये | यहाँ लाया गया। आप लोगोंने जो कुछ पूछा, उसे गोहके चर्मके बने दस्ताने पहन रखे थे तथा तलवार- | मैंने निवेदन कर दिया ॥ २०-२१ ॥ ढाल एवं कटार धारण कर रखी थी ॥ १० ॥ | आखेटरत मेरे साथके सभी लोग [राक्षसीद्वारा] शीघ्रगामी अश्वपर समारूढ़ होकर तथा हाथोंमें | खा लिये गये। इस सरोवरके जलकी कृपासे मैं इस समय धनुष-बाण धारणकर वे बलवान् राजा वैसे ही वीरोंके | जीवित हूँ।' तब राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर समुदाय, मन्त्रियों और सेवकोंसे घिरे, मृगों और वराहोंको | उन नागकन्याओंने पुनः उनसे कहा— ॥ २२ ॥ मारकर नगरको भेजते हुए वनमें भ्रमण कर रहे थे कि | वे [नागकन्याएँ] बोलीं— 'आप हम लोगोंके बलवान् राक्षसोंद्वारा देख लिये गये ॥ ११-१२ ॥ | पति हो जायें, इससे आपके सभी प्रिय कार्य सम्पन्न हो उन गुफा-जैसे मुखवाले, गड्ढे-जैसे नेत्रों और | जायेंगे। हम नागकन्याओंके साथ भोग-विलास अत्यन्त फैले हुए जबड़ोंवाले एवं नभःस्पर्शी विशाल शरीरवाले | दुर्लभ है' ॥ २३ ॥ राक्षसोंको देखकर वे शीतज्वरसे पीड़ित रोगीकी भाँति | उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उन नृपश्रेष्ठ काँपने लगे। उन्हें देखकर [राजाके] सभी वीर सैनिक | (राजा चंद्रांगद)-ने कहा—'हे माताओ! मेरा एकपत्नी- और सेवकगण भी भाग खड़े हुए। उनमेंसे कुछ तो | व्रत है, उसका मैं कैसे त्याग करूँ! चंद्रवंशमें उत्पन्न मरकर यमलोकको चले गये और कुछ मूर्च्छित होकर | राजाओंके धर्मका मैं आप सबसे वर्णन करता हूँ— पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३-१४ ॥ | सोमवंशमें उत्पन्न साधु स्वभाववाले राजा परद्रव्य, वहाँ एक क्रूर राक्षसी [भी] थी। वह कामदेवके | परद्रोह, परदारा तथा परनिन्दाकी इच्छा भी नहीं करते। सौन्दर्यको भी पराभूत करनेवाले उन राजाको देखकर | [वेद-शास्त्रोंका] अध्ययन, यज्ञ, दान, शरणागतकी काममोहित हो गयी और उसने उनका आलिंगनकर | रक्षा, निषिद्धाचरणका त्याग तथा वेदविहित आचारका चुम्बन किया। उसने राजाके मन्त्रियोंको अपने गुप्तागारमें | पालन—ये द्विजसंज्ञक त्रैवर्णिकों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और प्रविष्ट कर लिया और उनके सेवकोंका भक्षण कर लिया। | वैश्य)-के धर्म हैं और याजनादि (यज्ञ कराना, दान इसी बीच राजा वहाँसे पलायन कर गये ॥ १५-१६ ॥ | लेना तथा अध्यापन करना) तीन धर्म केवल ब्राह्मणोंके वे [भागकर] एक तालाबमें छिप गये, जिससे वह | लिये विहित हैं। आतिथ्य विशेष रूपसे सभी वर्णोंका राक्षसी उन्हें नहीं देख पायी। [उधर] राजा [तालाबमें] | परम धर्म है।' ॥ २४-२७१/२ ॥ नागकन्याओंद्वारा पकड़ लिये गये और वे उन्हें पातालस्थित | राजाकी इस प्रकारकी बात सुनकर उन सभी नाग- अपने भवनमें ले आयीं ॥ १७ ॥ | कुमारियोंने उन्हें शाप दे दिया कि तुम्हें अपनी पत्नीसे वहाँ नागकन्याओंने उन्हें वस्त्रालंकारों और आभूषणोंसे | बहुधा वियोग होगा। उन कामविह्वल और दुखी नागकन्याओंने विभूषित किया। तत्पश्चात् नागकन्याओंने उनसे पूछा | उन्हें जंजीरोंसे बाँध दिया ॥ २८-२९ ॥ कि आपका आगमन कहाँसे हुआ है ॥ १८ ॥ | [उधर] उस राक्षसीने राजाको प्राप्त करनेके लिये हे नरश्रेष्ठ! आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? | उस सरोवरका [सम्पूर्ण] जल पी डाला और [उसमें आपका क्या कार्य है? सत्य कहिये। उनका यह वचन | रहनेवाले] सम्पूर्ण जलचरोंको खा गयी, फिर भी वह