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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 656 में से

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पृष्ठ 180

१७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

सर्वथा तृप्त नहीं हुई ॥ ३० ॥ इस वृत्तान्तको पलंगपर बैठी हुई कमलसदृश नेत्रोंवाली रानीने उस राक्षसीसे बचकर आये हुए अपने दूतसे सुना। राजाको [सरोवरमें] डूब गया सुनकर वह दुखित होकर [पलंगसे] पृथ्वीपर गिर पड़ी और महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गयी। [उस समय] सखियाँ उसे पंखा झलने लगीं ॥ ३१-३२ ॥ उन सखियोंने बारम्बार रोती हुई रानीपर शीतल जल छिड़का, इससे वह उठकर बैठ गयी और अपने वक्ष, सिर तथा मुखको पीटती हुई रुदन करने लगी ॥ ३३॥ वह 'हे भर्ता! हे कान्त!'—इस प्रकार कहती हुई अत्यन्त शोकसे विलाप करने लगी। [रानी कहने लगी—] हे प्राणनाथ! मुझ प्रियवादिनीको छोड़कर आप कहाँ चले गये? मेरे शरीरके सभी अंग भलीभाँति ठीक हैं, मैं आपके चरणोंमें प्रणत रहनेवाली हूँ, आपका प्रिय करनेवाली हूँ, मैं नित्य पतिके कार्यमें संलग्न रहनेवाली हूँ और नित्य अतिथियोंका पूजन करनेवाली हूँ॥ ३४-३५॥

मेरे स्वामी कहाँ भोजन करते होंगे? स्वर्णनिर्मित पलंग और बहुमूल्य आस्तरण (चादर)-को त्यागकर कहाँ निद्रा लेते होंगे? सुगन्धित तैलका त्यागकर मेरे कान्त कैसे स्नान करते होंगे? उनके बिना अब प्रजाओंका पालन कौन करेगा? ॥ ३६-३७ ॥ अपनी सन्तानवत् प्रजाओंका आह्लादन कौन करेगा? आज गुणों और प्रतापके निधान [वे राजा] अस्त क्यों हो गये हैं? उन महात्माके बिना मैं दिशाओंको शून्य देख रही हूँ। [उनके बिना] अब मैं कहाँ सुख देखूँगी और वे भी कहाँ सुख पायेंगे? ॥ ३८-३९ ॥ हे देव! कुलांगनाओंको स्वामीके साथ जैसा सुख मिलता है, वैसा सुख स्वामीके न रहनेपर इहलोक या परलोकमें नहीं मिलता। शरणमें आये हुए दीनोंकी रक्षा कौन करेगा? इस प्रकार दीन होकर अत्यन्त विह्वलतापूर्वक वह रोने लगी ॥ ४०-४१ ॥ उसने अपने आभूषण तोड़कर दूर फेंक दिये। सभी कंगनों एवं चूड़ियों आदिको तोड़ डाला तथा मूर्च्छित हो गयी ॥ ४२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें चंद्रांगदोपाख्यानके अन्तर्गत 'चंद्रांगदका निग्रह' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

चौवनवाँ अध्याय प्रजाजनोंको आश्वासन देना, रानी इन्दुमतीका राजाको मृत समझकर विलाप करना तथा नारदजीके उपदेशसे गणेशचतुर्थीका व्रत करना

पार्वतीजी बोलीं—हे पिताजी! उस रानीके मूर्च्छित हो जानेपर प्रजाजनोंने क्या किया? हृदयको आनन्द देनेवाले इस प्रसंगको विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १॥ हिमवान् बोले—तदनन्तर बात-चीतमें कुशल सभी नगरनिवासी अपने आँसुओंको पोंछकर राजाकी पत्नीके पास जाकर उसे आश्वासन देते हुए कहने लगे— ॥ २ ॥ नगरनिवासी बोले—हे माता! उठिये, शोक मत कीजिये। अपने पुत्रमें मन लगाइये। मृत प्राणीके लिये शोकाश्रु दाहक होते हैं, इसलिये अपने पतिका हित करिये। हे शुभानने! मरणधर्मा मनुष्योंमें कोई चिरंजीवी

नहीं देखा गया है। जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यागकर लोग अन्य (नवीन) वस्त्रोंको ग्रहण कर लेते हैं, इसी प्रकार प्राणी भी एक देहको छोड़कर दूसरी शुभ (सुन्दर) देह ग्रहण कर लेते हैं ॥ ३-४ १/२ ॥ हे कल्याणि! यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि स्वयं मरणधर्मा और मृत्युके मुखमें स्थित होते हुए भी प्राणी दूसरे मृत व्यक्तिके लिये शोक करता है; वह अपने देहके आत्मासे होनेवाले भावी वियोगको नहीं जानता ॥ ५-६ ॥ मनुष्य 'सब कुछ मेरा है'—ऐसा मानता है, जबकि हे सत्यव्रती! ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समुद्रसहित जो चराचर जगत् है, वह स्वयं दैव और कालके वशमें