श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०५४] * प्रजाजनोंको आश्वासन देना * १७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है। अतः उसे नाशवान् जानकर शोकका त्यागकर उठो। | प्रकारके दान दिये ॥ १८-१९१/२ ॥ तुम्हारे धर्मात्मा और पुण्यवान् पतिको मुक्ति प्राप्त हो | तत्पश्चात् उस सौभाग्यशालिनी इन्दुमतीने हर्षित गयी होगी। संसारमें यदि वे कदाचित् जीवित होंगे तो | होकर अनेक प्रकारके [मंगल] वाद्य बजवाये और घर- घर आ जायँगे; क्योंकि पुण्योंकी अधिकतासे तो मनुष्य | घरमें शर्करा भिजवायी। उसने लोगोंको वस्त्र और स्वर्ग जाकर भी पुनः लौट आता है अथवा यहाँ आये | ताम्बूल देकर घर वापस जानेकी आज्ञा दी ॥ २०-२१ ॥ हुए किसी मुनिसे जो भूत-भविष्यका ज्ञाता हो, उससे | उसके बाद उस राजकन्या (रानी इन्दुमती)-ने पूछा जाय तो वह सब कुछ बता देगा, तदनन्तर जो भी | पुनः आदरपूर्वक देवर्षि नारदके चरणोंमें मस्तक रखकर करना होगा] वह हम सब करेंगे ॥ ७-१०१/२ ॥ | प्रणाम किया और उनसे अपने पतिकी प्राप्तिका उपाय हिमवान् बोले-तदनन्तर इस प्रकार लोगोंद्वारा | पूछा ॥ २२ ॥ प्रबोधित किये जानेपर रानी इन्दुमती थोड़े ही समयमें | इन्दुमती बोली-हे मुने! मेरे पति कहाँ और उनके वचनोंसे आश्वस्त हो गयी और उसने अपने | किस प्रकार रह रहे हैं? हे वेदज्ञ! किस उपायसे मुझे आँसुओंको वस्त्रसे पोंछकर वहाँ आये सभी लोगोंको | उनका दर्शन होगा? हे मुने! मुझपर कृपा करिये और विदा किया ॥ ११-१२ ॥ | उस उपायको बताइये, चाहे वह कितना भी कठिन व्रत, सौभाग्य-चिह्नोंको त्यागकर वह अत्यन्त क्षीणताको | दान या तप हो ॥ २३-२४ ॥ प्राप्त हो गयी थी। वह [प्रायः] रोती रहती, शोक करती | नारदजी बोले-मैं उस उत्तम व्रतको संक्षेपमें रहती, लम्बी-लम्बी साँसें लेती तथा बार-बार मूर्च्छित | तुमसे कहता हूँ। उसे श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे हो जाती थी। तदनन्तर बारह वर्षोंके पश्चात् दिव्यदर्शन | प्रसन्नतापूर्वक आरम्भ करना चाहिये। प्रभातकालमें नारद मुनि अपनी इच्छासे विचरण करते हुए उसके | दातून करके नदी, तालाब या वापीमें संकल्पपूर्वक स्नान भवनमें आये। उन्हें देखकर वह अपने पतिका वृत्तान्त | करे ॥ २५-२६ ॥ बताते हुए शीघ्र ही रोने लगी और उनसे उस दुःखको | तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके घर जाकर कहा, जो उसने बारह वर्षमें अनुभव किया था। तब | गणेशजीकी चार भुजाओंवाली उत्तम और सुन्दर मूर्ति नारदमुनिने उसके रुदनको सुनकर उसे हर्ष प्रदान करते | बनाये तथा स्थिर चित्तसे षोडश उपचारोंसे पूजन करे हुए कहा- ॥ १३-१५१/२ ॥ | और दिन-रातमें स्वयं [द्वारा] प्रयत्नपूर्वक [बनाये गये] नारदजी बोले-तुम्हारा पति कहीं स्थित है, | एक अन्नका भोजन करे अथवा एक बार भोजन करे तुम्हें उसके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये। तुम नील | या उपवास करे। इस प्रकार भाद्रपदमासकी शुक्लपक्षकी वर्णके वस्त्रसे अपने सिरको आच्छादित करो। कर्णाभूषणोंसे | चतुर्थी तिथितक व्रत करे ॥ २७-२८१/२ ॥ दोनों कानोंको अलंकृत करो। अपने भालपर कुंकुमकी | हे पतिव्रते ! हे सुन्दरि ! अपने वैभवके अनुरूप गीत, सुन्दर बिन्दी लगाओ, हाथमें कंगन और कण्ठमें मंगलसूत्र | वाद्य और नृत्य आदिपूर्वक महोत्सव करे और ब्राह्मणोंको धारण करो ॥ १६-१७१/२ ॥ | भोजन कराये। हे कल्याणि ! इस प्रकार व्रत करो, इससे हिमवान् बोले-सत्यवादी और सर्वज्ञ मुनिके | तुम्हारा पतिके साथ मिलन होगा। हे सुन्दरि ! वह जीवित वचनोंपर विश्वास करके उस (रानी इन्दुमती)-ने तत्काल | है, पातालमें नागकन्याओंद्वारा उसे बन्दी बनाया गया है। सभी वस्त्राभूषणोंको मँगाकर हर्षित होकर वैसा ही | हे राज्ञि ! मैं सत्य कहता हूँ, मेरा वचन अन्यथा नहीं किया, जैसा नारदजीने कहा था। तदनन्तर उसने समस्त | होगा ॥ २९-३१ ॥ ब्राह्मणोंको बुलवाकर सर्वप्रथम नारदजीका सम्यक् प्रकारसे | हिमवान् बोले-उन मुनिके द्वारा इस प्रकार पूजनकर सभी ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें अनेक | कहे जानेपर रानीने आदरपूर्वक व्रत प्रारम्भ किया।