भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 656 में से

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१८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उन मुनिके चले जानेपर कुछ दिनों बाद श्रावणमास | स्मरण और ध्यानसे तथा गीत, वाद्य, नृत्य एवं ब्राह्मण- आनेपर उसने गजानन गणेशजीकी सुन्दर-सी पार्थिव | भोजनसे उन परमात्माको प्रसन्न किया ॥ ३४-३५१/२ ॥ मूर्ति बनायी तथा पहले कही गयी विधिसे अत्यन्त | उसने नारदमुनिके वचनानुसार दीर्घकालसे खोये मनोहर पूजा की ॥ ३२-३३ ॥ | हुए अपने प्रियतमकी प्राप्तिके लिये पलमात्र दुग्धका उसने दिव्य गन्धों, दिव्य वस्त्रों, दिव्य पुष्पों, अनेक | पान करते हुए श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे प्रकारके दिव्य नैवेद्यों, फलों, सुवर्ण [दक्षिणा], दीपों, | भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीतक [गणेशजीका] उत्तम व्रत पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तवन, गणेशजीके नाम- | किया ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्दुमती-नारद-संवाद' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४॥ पचपनवाँ अध्याय गणेशचतुर्थीव्रतके माहात्म्यके सन्दर्भमें राजा चन्द्रांगद और रानी इन्दुमतीके पुनर्मिलनकी कथा हिमवान् बोले-[हे पार्वती !] इस प्रकार उस | स्नान करके अभी-अभी भवनको गयी हैं। उपवास और रानी इन्दुमतीके गणेशचतुर्थीव्रतके पूर्ण होनेपर गणेशजीकी | व्रतका पालन करती हुई वे अत्यन्त कृश शरीरवाली हो कृपासे पातालमें नागकन्याओंकी मति बदल गयी ॥ १ ॥ | गयी हैं, उनकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं ॥ ८ ॥ तब उन्होंने राजाको बन्धनमुक्त कर दिया और | वे अपने पुत्र राजकुमारमें अपने प्राणोंको स्थितकर वस्त्राभूषणों तथा अनेक प्रकारके रत्नों एवं महान् धन- | नाममात्रको जीवित हैं। उनमें कुछ [नागरिकों]-ने सम्पत्तिसे उनका यथाविधि पूजन किया ॥ २ ॥ | नगरमें जाकर इस शुभ समाचारकी घोषणा कर दी ॥ ९ ॥ उन्होंने राजा [चन्द्रांगद]-को मनके समान वेगवाला | तब वह रानी इन्दुमती अत्यन्त आप्त पुरुषोंद्वारा अश्व प्रदानकर विदा किया। तब वे राजा उस तालाबसे | 'राजा आ गये हैं' इस वचनको सुनकर योगविद् बाहर आये और अश्वको एक विशाल वृक्षसे बाँधकर | ब्रह्मज्ञानीकी भाँति आनन्दसागरमें निमग्न हो गयी ॥ १० ॥ जब स्नान करने लगे, तब कुछ नागरिकोंकी दृष्टि उनपर | तदनन्तर रानी इन्दुमतीने मन्त्रियोंके नेतृत्वमें सैनिकोंको पड़ी। कुछ नागरिकोंने उनको राजा चन्द्रांगद समझा और | राजाके पास भेजा और नगरको रंग-बिरंगी ध्वजाओं कुछ लोग उन्हें भिन्न व्यक्ति समझ रहे थे। उनमें कुछ | और पताकाओंसे सुशोभित करवा दिया ॥ ११ ॥ कहने लगे कि यह चन्द्रांगद-जैसा तो है, किंतु राजा | उसने राजमार्गोंपर जलका छिड़काव करा दिया चन्द्रांगद नहीं है। उनमेंसे कुछने उनके पास जाकर पूछा | और सभाको यत्नपूर्वक सुसज्जित करा दिया तथा कि 'आप कौन हैं? कहाँके रहनेवाले हैं? कहाँसे आये | स्वयंको वस्त्रों, अलंकारों और आभूषणोंसे विभूषित हैं? हे प्रभो! आपका नाम क्या है? यह सब हमें | किया। उसने गाय, भूमि, स्वर्ण आदि अनेक प्रकारके बताइये' ॥ ३-५ ॥ | दान देकर बहुत-से द्विजोंको सन्तुष्ट किया और सौभाग्यवती उनके इस प्रकारके वचन सुनकर उन नृपश्रेष्ठ | स्त्रियोंके हाथमें आरती [-के थाल] देकर वह उनके [चन्द्रांगद]-ने [रानी] इन्दुमती और राजकुमारका दुखी | साथ गायन और वादनकी [मांगलिक] ध्वनिसहित मनसे कुशल-समाचार पूछा। तब उन लोगोंने उन्हें | नगरसे सरोवरपर आयी ॥ १२-१३१/२ ॥ पहचान लिया और प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन | मन्त्रियोंने उन नृपश्रेष्ठके सम्मुख जाकर उन्हें किया ॥ ६-७ ॥ | प्रणामकर प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया। उन्होंने कहा कि हे नृप ! आपकी पत्नी (रानी इन्दुमती) | तत्पश्चात् अन्य सभी नागरिकोंने यथाक्रम उन्हें प्रणाम