भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 656 में से

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पृष्ठ 183

उ०ख०-अ०५५] * गणेशचतुर्थीव्रत-माहात्म्यमें चन्द्रांगद और इन्दुमतीके पुनर्मिलनकी कथा * १८१


[बायाँ स्तम्भ]

किया और राजा [चन्द्रांगद]-के बैठ जानेपर उनकी आज्ञासे सभी लोग बैठ गये। तदनन्तर वे श्रेष्ठ राजा सभीको कुशल-प्रश्न आदिसे प्रसन्नकर उन्हें यथायोग्य ताम्बूल और वस्त्र देकर सम्मानित करके इन्दुमतीके शिविरमें गये॥ १४-१६१/२॥

उन्होंने बारह वर्षकी अवधिमें शेष रह गये करणीय कृत्योंको धर्मशास्त्रोंके द्रष्टा द्विजोंद्वारा सम्पन्न कराया। राजाने गणेशजीका सर्वप्रथम पूजन किया। तत्पश्चात् पुण्याहवाचन करवाया तथा भगवान् शंकरका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा आदिसे सन्तुष्ट किया ॥ १७-१८॥

तत्पश्चात् नारियल फोड़कर वे इन्दुमतीके सम्मुख गये और वहाँ उन्होंने इन्दुमतीको चन्द्रमाकी क्षीण कलाओंकी भाँति [तेजोहीन तथा कृश] देखा॥ १९॥

तब रानी इन्दुमतीने सौभाग्यवती युवतियोंसे राजाकी आरती उतरवायी और उनसे उनके ऊपर लाजा (धानके लावा) और पुष्पोंकी वृष्टि करवायी॥ २०॥

तब आनन्दके आँसुओंसे भरी आँखोंको सम्यक् प्रकारसे पोंछकर हर्ष और शोकसे समन्वित वे दोनों परस्पर वार्ता करने लगे॥ २१॥

उन दोनोंने वियोगजन्य अपने-अपने मानसिक क्लेशको एक-दूसरेसे शोकपूर्वक कहा, तब मन्त्रियोंने उनको नियतिके विधानकी अनिवार्यता बतलाते हुए अनेक प्रकारके वचनोंसे सान्त्वना दी॥ २२॥

तदनन्तर वे राजाको अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तथा छत्र और पताकासे सुशोभित एक महान् गजराजपर बैठाकर [नगरको] ले गये॥ २३॥

वह महागवराज पादरक्षकोंसे घिरा हुआ था और उसपर लटकते हुए चार घण्टे सुशोभित हो रहे थे। लाठी लिये हुए सौ पुरुष लोगोंको रास्तेसे हटाते हुए उसके आगे-आगे चल रहे थे॥ २४॥

बहुत-से आग्नेयास्त्रधारी, अश्वारोही और रथारोही राजाके बायें और दायें पार्श्वमें स्थित होकर हाथीको देखते हुए शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे॥ २५॥

राजाके आगे-आगे बहुत-से नट, नृत्यांगनाएँ,


[दायाँ स्तम्भ]

वाद्य-वादक और वन्दीजन तथा उनके पीछे गजारोही चल रहे थे। इस प्रकार आदरपूर्वक राजाने नगरमें प्रवेश किया। उस समय सैनिकोंके चलनेसे उठी धूलसे [नभमण्डल] व्याप्त हो जानेसे सूर्य निस्तेज-से प्रतीत होने लगे थे। यद्यपि वह नगर अलंकृत किया गया था, लेकिन [धूलके कारण] कुछ भी सूझ नहीं रहा था॥ २६-२७॥

तदनन्तर सभी लोग परस्पर एक-दूसरेका अभिवादन करके अपने-अपने घर चले गये, तत्पश्चात् विशिष्ट जनोंको राजभवनमें ले जाया गया। वहाँ वे सब राजाद्वारा वस्त्र और ताम्बूल देकर सम्मानित होनेके बाद उनकी आज्ञा पाकर घर चले गये। राजाने ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जाति-बान्धवोंके साथ भोजन किया ॥ २८-२९॥

तदनन्तर रात्रिमें उन दोनों [राजा और रानी]-ने सुन्दर विधिसे निर्मित, बहुमूल्य गद्दोंसे युक्त, जिसपर चादर बिछा था और तकिया लगा था, ऐसे पलंगपर शयन किया। वे दोनों बार-बार शोक करते हुए अपने-अपने दुःखोंको कह रहे थे, तब पुरोहितद्वारा सान्त्वना देनेपर वे दोनों सुखपूर्वक सो गये॥ ३०-३१॥

नृपश्रेष्ठ चन्द्रांगदने अपनी पत्नीद्वारा किये गये विनायकव्रतके माहात्म्यको सुनकर स्वयं भी उसे करनेका मनमें संकल्प किया॥ ३२॥

हे सुमुखि! तदनन्तर श्रावणमासके आनेपर राजा चन्द्रांगदने महोत्सवपूर्वक इस व्रतको किया॥ ३३॥

ऋषि बोले—पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर पार्वतीजी अत्यन्त हर्षित हुईं और उन्होंने आदरपूर्वक श्रावणमासमें [गणेशचतुर्थीका] व्रत किया॥ ३४॥

पार्वतीजीने यथोक्त (शास्त्रोक्त) विधिसे [गणेशजीकी] मूर्तिका निर्माणकर गजानन गणेशजीका ध्यान करते हुए पयमात्राका आहारकर प्रयत्नपूर्वक [उनकी] पूजा की। इससे भगवान् शंकरका भी मन चंचल हो उठा और वे शूलपाणि स्वयं उन पार्वतीजीके आश्रममें पधारे॥ ३५-३६॥

गणेशचतुर्थी [भाद्रशुक्ल चतुर्थी]-को उस शुभव्रतके सम्यक् रूपसे पूर्ण हो जानेपर देवी पार्वती ने वृषभपर

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