श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
आरूढ़ भगवान् शिवको अपने आश्रममें आया हुआ देखा। तब उन्होंने उठकर उनके युगल-चरणकमलोंमें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया और सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरका विधिवत् पूजन किया। तदनन्तर प्रेमविह्वल पार्वतीजीने उन महादेवसे कहा— ॥ ३७-३८ ॥ देवी बोलीं— 'आप मुझे छोड़कर क्यों चले गये थे ? आपने मुझे क्यों विस्मृत कर दिया ? हे विभो ! आपका एक निमेषका भी वियोग कल्प-कल्पके समान हो रहा था। पिताके निर्देशपर मैंने गणेशजीके इस व्रतको किया। [उन्हीं] वरदाता गणेशजीकी कृपासे मैंने आपका दर्शन प्राप्त किया' ॥ ३९-४०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] उसी समय हिमवान् वहाँ आये। उन्होंने आदरपूर्वक सती [पार्वती]- का हाथ उन शिवके हाथमें दे दिया। तब गन्धर्वोंसहित सभी देवताओंने आदरपूर्वक गजानन गणेशजीका और सज्जनोंका कल्याण करनेवाले शिव-शिवाका पूजन किया। उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाशसे फूलोंकी वृष्टि होने लगी ॥ ४१-४३ ॥ तदनन्तर उन सभीने गजानन गणेशजीको नमस्कारकर विविध स्तोत्रोंसे उनका स्तवनकर उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् शंकरने भी जय-जयकार करते हुए गजाननका स्तवन किया ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् [भगवान् शंकर]-ने पार्वतीको अर्धाङ्गिनी बनाकर शीघ्र ही कैलासपर्वतके लिये प्रस्थान किया तथा अन्य सब लोग भी अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! हे महामुने ! तुमने गणाधिपति गणेशजीके व्रतके माहात्म्यके सम्बन्धमें जो कुछ पूछा था, मैंने वह सब कुछ बतला दिया। अब मैं तुमसे पुनः एक अन्य कथानकको कहता हूँ, जिसको सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकर-पार्वतीके मिलनका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥
छप्पनवाँ अध्याय
गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान
भृगुजी बोले— हे राजन् ! इस प्रकार मैंने [गणेश- चतुर्थी व्रतके] सम्पूर्ण माहात्म्यको कहा। अब जो ब्रह्माजीद्वारा व्यासजीके प्रति कहा गया था, उसे तुम पुनः सुनो ॥ १ ॥ सोमकान्त बोले— हे महामुने ! अमित बुद्धिवाले व्यासजीने ब्रह्माजीके मुखसे क्या सुना ? उसे आप कहिये। [उसे श्रवण किये बिना] मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥ भृगुजी बोले— [हे राजन्!] इस प्रकार [गणेश- चतुर्थीव्रतके माहात्म्य-सम्बन्धी] कथानकको सुनकर व्यासजीने आदरपूर्वक ब्रह्माजीसे पूछा। हे निष्पाप [राजन्] ! तब उन्होंने भी आदरपूर्वक उसको कहना प्रारम्भ किया ॥ ३ ॥ व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन् ! आप मुझसे गणनायक गणेशजीकी श्रेष्ठ कथाको पुनः कहिये। विघ्नेश्वर गणेशजीकी सत्कथाको श्रवण करनेकी मेरी लालसा अत्यधिक बढ़ती जा रही है ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! कौतूहलसे भरी हुई गणेशजीकी एक अन्य कथाका श्रवण करो, जो शूरसेन आदि [राजाओं]-द्वारा अनुभूत है ॥ ५ ॥ मध्य देशके अत्यन्त रमणीय सहस्र नामक नगरमें शूरसेन नामके एक महान् बलवान् राजा हुए। वे वेद- वेदांगके पारगामी विद्वान्, धनवान्, रूपवान्, दानी, यज्ञकर्ता, प्रजाके रक्षक, शक्तित्रय^१से सम्पन्न, मानी, राजनीतिमें व्यवहार्य छः अंगों^२में दक्ष, [शत्रुपर विजय पानेके] चार उपायों^३के प्रयोगमें चतुर, चतुरंगिणी^४ सेनासे सम्पन्न और द्विज- देवताओंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले थे ॥ ६-८ ॥
१. प्रभु, मन्त्र और उत्साह—ये तीन प्रकारकी राजशक्तियाँ होती हैं। २. परराष्ट्रनीतिकी सफलताके लिये राजाद्वारा व्यवहार्य छः उपाय—१.सन्धि, २.विग्रह, ३.यान (चढ़ाई), ४.आसन (विराम), ५.द्वैधीभाव और ६.संश्रय। ३. साम, दान, भेद और दण्ड। ४. पैदल सेना, गजसेना, रथारोही और अश्वारोही।