श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०५६ ] * गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान * १८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] सम्पूर्ण पृथिवीमण्डल सदैव उनके वशवर्ती रहा। उनका नगर पृथवीतलपर इन्द्रके नगर (स्वर्ग)-से भी विशिष्ट प्रतीत होता था। उनकी पत्नीका नाम पुण्यशीला था, जो अत्यन्त पुण्यशालिनी थी। उसके रूपकी समानता करनेवाली नारी त्रैलोक्यमण्डलमें कोई नहीं थी ॥ ९-१० ॥ जिसके पातिव्रत्यसम्बन्धी गुणोंको देखकर अरुन्धतीको भी लज्जा आ जाती थी और उसके असूयात्यागको देखकर अनसूया भी लघुताको प्राप्त हो जाती थीं ॥ ११ ॥ किसी समय वे राजा शूरसेन मन्त्रियों और श्रेष्ठ वीरोंसे घिरे हुए राजसभामें विराजमान थे, उस समय उन्होंने नेत्रज्योतिका हरण कर लेनेवाले अग्निसदृश तेजवाले आकाशचारी उत्तम विमानको देखा। उसे देखकर गायन-श्रवणमें आसक्त राजाके साथ सभी सभासद् व्याकुल होकर 'यह क्या है, यह क्या है?'— कहते हुए दूतोंको इस विषयमें ज्ञात करनेके लिये प्रेरित करने लगे। [तब] वे दूत उस सूर्यसदृश प्रभाववाले विमानको देखनेके लिये गये ॥ १२-१४ ॥ [उन राजदूतोंमें] एक कोई राजदूत, जो वैश्य-पुत्र था और [किसी उत्कट पापके कारण] कुष्ठरोगसे ग्रस्त था। उसकी दृष्टि पड़ते ही वह विमान भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर दूतोंने राजाके पास जाकर कहा—'हे महाराज! पुण्यशाली देवगणोंसे संयुक्त वह देदीप्यमान विमान किसी दुष्टके दृष्टिपातसे भूतलपर गिर पड़ा' ॥ १५—१६ १/२ ॥ तब अत्यन्त हर्षित राजा दो मन्त्रियोंको साथ ले अश्वपर आरूढ़ हो विमानको देखनेकी उत्सुकतासे अपनेको महान् भाग्यशाली मानते हुए अपने बन्धु- बान्धवोंसहित वहाँ गये। उस समय अनेक प्रकारके बाजे बज रहे थे। वहाँ उन सबने सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रको देखा। उन्हें देखकर सब अपने-अपने वाहनोंसे उतर गये और उन्हें प्रणाम किया ॥ १७-१९ ॥ तदनन्तर अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत और सम्पूर्ण देवगणोंसे घिरे हुए बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्रसे राजाने हाथ जोड़कर कहा—'हे शचीपते ! आज यह धरणी धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी सम्पत्ति धन्य हो गयी, मेरे पूर्वज तथा हम सबके नेत्र
[दायाँ स्तम्भ] आज धन्य हो गये, जो कि इस मृत्युलोकमें अनुगामियोंसहित मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ ॥ २०—२१ १/२ ॥ ब्रह्मा, ईशान (शिव) आदि देवता भी जिनके वशवर्ती हैं, जिनका दर्शन सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा ही सम्भव है, अन्य किसी भी भाँति नहीं, ऐसे आपका आज हम सब लोगोंको दर्शन न जाने किस पुण्यसे हुआ है! हे प्रभो ! यह आपका जो विमान है, वह पृथवीतलपर कैसे गिर पड़ा ? हे देव ! सम्प्रति मेरा यह संशय आप दूर करें और आप कहाँ गये थे अथवा कहाँ जायँगे— यह भी बतलाइये' ॥ २२—२४ १/२ ॥ शतक्रतु इन्द्र बोले—हे राजन् ! उस आश्चर्यमयी घटनाको सुनो, जिसे नारदजीने मुझसे कहा था। हे नृप ! मैं उसे तुमसे कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर [उसका] श्रवण करो ॥ २५ १/२ ॥ नारदजी बोले—हे शक्र ! मैं मृत्युलोक (पृथ्वी)- में भृशुण्डीके आश्रममें गया था, वे गणेशजीके स्वरूपमें स्थित होकर निरन्तर (रात्रि-दिन) [गणेशजीके मन्त्रका] जप करते रहते हैं ॥ २६ ॥ उनके द्वारा [गणेशजीके स्वरूपका] ध्यान किये जानेसे उनका भी स्वरूप वैसा (गणेशजीके स्वरूप- जैसा) ही हो गया है—यह आश्चर्यमयी घटना मैंने वहाँ देखी। उन गजाननस्वरूपधारी मुनिद्वारा पूजित होकर, उन्हें नमस्कारकर और उनकी आज्ञा ले मैं यहाँ आपके दर्शनके लिये आ गया। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र ! मैंने ऐसा [विलक्षण] सारूप्य पृथ्वीपर अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! ॥ २७-२८ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजन् !] तब मैं नारदजीका पूजनकर और उन्हें विदाकर उसी क्षण अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक उस प्रकारके मुनिका दर्शन करनेके लिये चल दिया ॥ २९ ॥ मन और वायुके समान वेगशाली श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर मैंने गजाननरूपधारी [भृशुण्डी] मुनिके [पास जाकर उनका] दर्शन किया। उनका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर, उनके चरणोंमें प्रणामकर तथा उनकी पूजा ग्रहणकर जब सपरिवार अमरावती जानेकी इच्छासे