श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैं चला, तो तुम्हारे नगरके समीप यह विमान जैसे ही पहुँचा, उसी समय तुम्हारे कुष्ठरोगसे ग्रस्त पापी दूतकी दृष्टि पड़ते ही यह यहाँ भूतलपर गिर पड़ा। हे नृप! मैंने सारी बात तुमसे कह दी ॥ ३०-३२१/२॥ [राजा] शूरसेन बोले- हे शतक्रतु इन्द्र! किस तपस्यासे या किस व्रत-साधनसे भृशुण्डीने गजाननका स्वरूप प्राप्त कर लिया? हे प्रभो! वह सब मुझसे कहिये। प्राणीको जैसे अमृतका पान करनेपर तृप्ति नहीं होती, और पीनेकी इच्छा रहती है, वैसे ही इस अमृतोपम कथाका श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है अर्थात् गणपति-महिमा-सम्बन्धिनी अन्य कथाओंका श्रवण करनेकी लालसा बढ़ती जा रही है। हे स्वामिन्! गजाननकी अमृतोपम कथाओंको सुननेसे कौन विरत हो सकता है॥ ३३-३४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शक्रके विमानका पतन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय भृशुण्डीमुनिका प्रारम्भिक जीवन, मुद्गलमुनिकी उनपर कृपा, उनकी कठोर तपस्या तथा उन्हें गणेश-सारूप्यकी प्राप्ति शतक्रतु इन्द्र बोले— [हे राजन्!] अब मैं तुमसे इस प्राचीन कथाको कहता हूँ कि जिस प्रकार मुनि भृशुण्डीने गणाधिपति गणेशजीकी भक्तिके प्रभावसे उनका सारूप्य प्राप्त कर लिया था ॥ १ ॥ दण्डकारण्य देशमें 'नन्दुर' संज्ञक नगरमें 'नाम' नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट मछुआरा रहता था ॥ २॥ वह बाल्यकालसे ही चोरी करने लग गया था और युवा होनेपर परायी स्त्रियोंसे व्यभिचारकर्म करने लगा था। वह दूसरोंके न देखते और देखते हुए भी उनकी वस्तुएँ चुरा लेता था तथा 'मैंने चोरी नहीं की' इस प्रकारकी शपथ भी ले लेता था ॥ ३ ॥ वह दो व्यक्तियों (सुहृदों)-के हृदयमें भेद उत्पन्न करनेके लिये मिथ्या शपथ लेता था। वह जुआ खेलने और मदिरा पीनेमें लगा रहता था, इसलिये लोगोंने उसे गाँवसे बाहर निकाल दिया। तब वह वहाँसे बहुत दूर वन्य प्रान्तके पहाड़की एक गुफामें पत्नीसहित रहने लगा। उसने उस मार्गमें जानेवाले बहुत-से पथिकोंको मार डाला था। इस प्रकार [जब] उसके पास बहुत- सा धन हो गया तो उसने उससे बच्चोंसहित अपनी स्त्रीको अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित किया और अपने धन-वैभवसे उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ४-६॥ वह शस्त्र, तलवार-ढाल, बहुत-से पाश, उत्तम धनुष, दोनों सिरोंपर लौहबद्ध लाठी और बाणोंसे परिपूर्ण विशाल तरकस धारण किये रहता था ॥ ७ ॥ वह वृक्षकी किसी ऊँची डालपर बैठकर या उसके कोटर (खोखले भाग)-में छिपकर [उस मार्गसे जानेवाले] बहुत-से यात्रियोंको मारकर उनकी विविध वस्तुओं, वस्त्रों तथा आभूषणोंको लाकर घरमें संचित करता था तथा दूसरे नगरमें ले जाकर उन्हें बेच देता था और नित्य अपने भवनमें यथेष्ट विषयोंका सेवन किया करता था ॥ ८-९॥ इस प्रकार पापपूर्ण आचरण करनेवाला वह वनमें अनेक पशुओंका भी वध करता था। एक बार किसी वन्य पशुके पीछे दौड़ता हुआ वह एक योजन दूरतक चला गया ॥ १० ॥ [परंतु] पशु उसकी पहुँचसे दूर जा चुका था और वह [दौड़ता हुआ] थककर धरतीपर गिर पड़ा। तदनन्तर वह दुष्ट बड़े कष्टसे उठकर धीरे-धीरे चलने लगा। मार्गमें चलते हुए उसने पवित्र गणेशतीर्थको देखा। वहाँ उसने केवल श्रमका परिहार करनेके लिये ही स्नान किया ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर अपने व्यवसाय (लूट-पाट)-के उद्देश्यसे जब वह जा रहा था तो मार्गमें उसने मुद्गल [मुनि]- को देखा, जो गणनाथ गणेशजीके नाम-मन्त्रका जप कर रहे थे ॥ १३ ॥