भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 656 में से

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पृष्ठ 187

उ०ख०-अ०५७ ] * भुशुण्डिमुनिका प्रारम्भिक जीवन * १८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तब वह 'नाम' नामका मछुआरा म्यानसे तलवार निकालकर उसे उठाये मुद्गल [मुनि]-के निकट उन्हें मार डालनेका मन बनाकर गया। [परंतु] गजानन गणेशजीके भक्त मुद्गलके प्रभावसे उसके शस्त्र तथा दृढ़ मुट्ठीसे तलवार भी फिसल गयी और उस दुष्टकी बुद्धि भी उसी क्षण परिवर्तित हो गयी॥ १४-१५१/२ ॥ उसे उस अवस्थामें देखकर वे मुनिवर [मुद्गलजी] हँस पड़े। तत्पश्चात् संयतचित्त होकर उससे पूछा— बताओ, तुम्हारे सभी शस्त्र बँधे होनेपर भी क्यों गिर पड़े? ॥ १६-१७ ॥ इन्द्र कहते हैं— [हे राजा शूरसेन!] गणेशतीर्थमें स्नान करने और उन मुनिका दर्शन करनेसे ज्ञान-वैराग्यसे युक्त हुआ वह [मछुआरा] मुद्गलजीसे बोला ॥ १८ ॥ मछुआरा बोला— हे ब्रह्मन् ! मैं यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात मानता हूँ कि इस कुण्ड (गणेशतीर्थ)- में स्नान और विशेष रूपसे आपके दर्शनसे मेरी बुद्धि परिवर्तित हो गयी। बाल्यकालसे ही मेरी बुद्धि दुष्टतापूर्ण और पापपरायण हो गयी थी। हे प्रभो! मैंने आजतक असंख्य पाप किये हैं ॥ १९-२० ॥ इस समय आपकी कृपासे मेरी मति [इन पाप- कर्मोंसे] विरक्त हो गयी है। अब मैं अपने इन गिरे हुए शस्त्रोंको पुनः ग्रहण नहीं करूँगा ॥ २१ ॥ अब आप मेरे ऊपर पूर्ण कृपा कीजिये और मेरा इस भवसागरसे उद्धार कीजिये। साधु पुरुष दीन पापीजनोंपर भी अनुग्रह करते हैं। हे महामुने! जैसे पारसमणिका धातुओंसे सम्पर्क व्यर्थ नहीं होता, वैसे ही साधु पुरुषोंकी संगति कभी भी व्यर्थ नहीं देखी गयी है ॥ २२-२३ ॥ इन्द्र कहते हैं— [हे राजन्!] उस मछुआरेके इस प्रकार कहनेपर शरणागतके त्यागमें दोषका विशेष रूपसे स्मरण करते हुए वे मुद्गलमुनि उससे कृपापूर्वक बोले— ॥ २४ ॥ मुद्गलजी बोले— दानादि कृत्य विधिपूर्वक किये जाते हैं, उनमें तुम्हारा अधिकार नहीं है, तथापि तुमपर कृपा करनेके लिये तुम्हें गजानन गणेशजीके मनुष्योंके लिये सभी सिद्धियोंको देनेवाले नामजपका उपदेश करता

[दायाँ स्तम्भ] हूँ। तदनन्तर [जब वह] कैवर्तक महर्षि मुद्गलको प्रणाम करने लगा, तो उन्होंने उसके मस्तकपर अपना अभयप्रद श्रीहस्त स्थापित किया और 'गणेशाय नमः'— इस नाममन्त्रका उपदेश दिया ॥ २५-२६१/२ ॥ उन्होंने अपनी यष्टिको उसके सामने भूमिमें रोपित कर दिया और उससे प्रीतिपूर्वक बोले कि जबतक इस यष्टिमें अंकुर न निकल आये और जबतक मैं आ न जाऊँ, तबतक तुम इस मन्त्रका जप करते रहो ॥ २७-२८ ॥ एक आसनमें बैठकर वायुमात्रका भक्षण करते हुए एकाग्रचित्तसे [जप करते हुए] सायं-प्रातः नित्य- निरन्तर यष्टिमूलमें जल डालते रहना ॥ २९ ॥ इन्द्र बोले— मछुआरा नाम मुद्गलमुनिद्वारा उपदेश पाकर और उन मुनिके अन्तर्हित हो जानेके बाद अपने जीवनसे निराश होकर वहीं स्थित हो गया ॥ ३० ॥ मुनिकी यष्टिको सामने रखकर वनमें वृक्षकी छायाका आश्रय लेकर एक आसनमें स्थित हुआ वह [गणेशजीके] नाममन्त्रका [निरन्तर] जप करता रहा ॥ ३१ ॥ निराहार और निराकांक्ष रहते हुए इन्द्रियसूहोंपर विजय पाकर एवं मनको वशमें करके [वह तप करता रहा।] इस प्रकार सहस्र वर्ष बीत जानेपर उस यष्टिमें अंकुर निकल आये। तब वह मुनिके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगा। [उस समय] उसका शरीर दीमकोंकी बाँबीसे वेष्टित हो गया था और उसपर लताओंका जाल-सा फैल गया था ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर वे मुद्गलमुनि दैववशात् उस स्थानमें आये, तो उन्हें उस कैवर्त (मछुआरे) और यष्टिका स्मरण हुआ। तब भ्रमण करते हुए उन मुनिने उस उत्तम यष्टिको अंकुरित हुए और उस मछुआरेको दीमकोंकी बाँबीसे आक्रान्त शरीरवाला देखा ॥ ३४-३५ ॥ उसका वह उत्तम तप सम्पूर्ण मुनियोंके लिये भी दुष्कर था। उस समय उन मुद्गलमुनिने बड़े प्रयत्नपूर्वक मात्र नेत्रोंको देखकर उसे पहचाना ॥ ३६ ॥ तदनन्तर उन मुनिश्रेष्ठने उसके शरीरपर स्थित दीमकोंकी बाँबीको हटाया और अभिमन्त्रित जलसे उसके