श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सम्पूर्ण शरीरका सिंचन किया। तदुपरान्त जपके प्रभावसे दिव्य शरीर तथा गणपति के सारूप्यको पा लेनेवाले उस कैवर्तकको मुनिने सम्बोधित किया ॥ ३७-३८ ॥ उसके दो [दिव्य] हाथ थे और वह भगवान् विनायकके शुभ नामका जप कर रहा था। मुनिके द्वारा उद्बोधित किये जानेपर उसने अपने नेत्र खोले ॥ ३९ ॥ उसके नेत्रोंसे उत्पन्न अग्नि विद्युत्की भाँति आकाशको चली गयी और वह त्रिलोकीको दग्ध करनेके लिये उद्यत हो गयी, तब मुनिके द्वारा उसका निवारण किया गया। वह मछुआरा भी अपने करुणामय गुरु उन मुद्गलमुनिको नमनकर और उनका आलिंगनकर वैसे ही प्रसन्न हुआ, जैसे पुत्र अपने पिताका आलिंगनकर प्रसन्न होता है ॥ ४०-४१ ॥ तब उस 'नाम' नामक मछुआरेको, जिसे उपदेश दिया था, पुनः वल्मीकसे उत्पन्न होनेके कारण उन्होंने अपना पुत्र मान लिया। हे राजन् ! मुद्गलमुनिने उसका आदरपूर्वक नामकरण किया; उसके भ्रूमध्यसे शुण्डा (सूँड़) निकल आयी थी, इसलिये उन्होंने उसका 'भृशुण्डी' नाम रखा ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर उन मुद्गलमुनिने उसे एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और वरदान देते हुए कहा कि तुम मेरे वचनके प्रभावसे इस एकाक्षरमन्त्रके ऋषि बनो और मुनियोंमें श्रेष्ठ हो जाओ। इन्द्रादि देवताओं, गन्धर्वों और सिद्धोंके लिये भी पूज्य हो जाओ। जैसे भगवान् गणेशका ध्यान और दर्शन पापोंका नाश करनेवाला होता है, वैसे ही [प्रभावसे सम्पन्न हुए] हे मुनि ! तुम भृशुण्डीके रूपमें विख्यात हो जाओ। जिसको तुम्हारा दर्शन हो जाय, वह मनुष्य कृतकृत्य हो जायेगा ॥ ४४-४६ ॥ मेरे कथनानुसार (आशीर्वादसे) तुम्हारी आयु एक लाख कल्पोंकी होगी। इस प्रकार मुद्गलजी जब उसे बहुत-से वरदान दे रहे थे, तो उसी समय इन्द्रादि देवता और नारदादि मुनि भी उसका दर्शन करनेके लिये आये और उसे प्रणिपात करते हुए बोले- 'हे भृशुण्डी ! आपके दर्शनसे हमारा जन्म, हमारी विद्या, हमारे माता- पिता, हमारी तपस्या और हमारा यश सार्थक हो गया ॥ ४७-४८ ॥ हे मुने! आप ही गणनाथ हैं, आप ही हमारे पूजनीय हैं। तब उन भृशुण्डीमुनिने भी उन सबका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर, उन्हें प्रणामकर विदा कर दिया ॥ ४९ ॥ तत्पश्चात् वे पुनः पद्मासनमें स्थित होकर एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे। वे अपने सम्मुख गणेशजीकी सुन्दर मूर्तिकी प्रतिष्ठाकर प्रतिदिन उसका षोडश उपचारोंसे पूजन करने लगे। उनका आश्रम वापी, सरोवर, वृक्ष और लताओंसे सुशोभित हो रहा था। वहाँ सिंह और मृग तथा नेवले एवं विषधर सर्प भी वैरका त्यागकर रहते थे ॥ ५०-५१ १/२ ॥ तदनन्तर सौ वर्ष बीत जानेपर गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए और बोले- 'तुम तो मेरा सारूप्य प्राप्त कर लिये हो, फिर अब क्यों तपस्या कर रहे हो ? तुम तो कृतकृत्य हो चुके हो अर्थात् तुम्हारे सारे कार्य पूर्ण हो गये हैं; अब तुम अपनी आयु पूर्णकर अन्तमें मेरे सायुज्यको प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३ ॥ यह क्षेत्र 'नामल'* नामसे सुविख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंको अनेक प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होंगी ॥ ५४ ॥ यहाँ स्थित मेरी मूर्तिके दर्शनसे मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होगा। [इसके दर्शनसे] पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्रलाभकी और विद्यार्थीको ज्ञानकी प्राप्ति होगी ॥ ५५ ॥ इन्द्र बोले- हे नृपश्रेष्ठ शूरसेन! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कुछ मैंने वर्णन कर दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भृशुण्डी-उपाख्यान' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥
- यह प्राचीन 'अमलाश्मक्षेत्र' है। धर्मराज यमने माताके शापसे छूटनेके लिये यहाँ गणेशजीकी आराधना की थी। यमराजद्वारा स्थापित आशापूरक गणेशजीकी मूर्ति भी यहाँ है। यहाँपर 'सुबुद्धिप्रदतीर्थ' नामक कुण्ड भी है। भृशुण्डि योगेन्द्रकी भी यहाँ मूर्ति है।