श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उ०ख०-अ०५४] * प्रजाजनोंको आश्वासन देना * १७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है। अतः उसे नाशवान् जानकर शोकका त्यागकर उठो। | प्रकारके दान दिये ॥ १८-१९१/२ ॥ तुम्हारे धर्मात्मा और पुण्यवान् पतिको मुक्ति प्राप्त हो | तत्पश्चात् उस सौभाग्यशालिनी इन्दुमतीने हर्षित गयी होगी। संसारमें यदि वे कदाचित् जीवित होंगे तो | होकर अनेक प्रकारके [मंगल] वाद्य बजवाये और घर- घर आ जायँगे; क्योंकि पुण्योंकी अधिकतासे तो मनुष्य | घरमें शर्करा भिजवायी। उसने लोगोंको वस्त्र और स्वर्ग जाकर भी पुनः लौट आता है अथवा यहाँ आये | ताम्बूल देकर घर वापस जानेकी आज्ञा दी ॥ २०-२१ ॥ हुए किसी मुनिसे जो भूत-भविष्यका ज्ञाता हो, उससे | उसके बाद उस राजकन्या (रानी इन्दुमती)-ने पूछा जाय तो वह सब कुछ बता देगा, तदनन्तर जो भी | पुनः आदरपूर्वक देवर्षि नारदके चरणोंमें मस्तक रखकर करना होगा] वह हम सब करेंगे ॥ ७-१०१/२ ॥ | प्रणाम किया और उनसे अपने पतिकी प्राप्तिका उपाय हिमवान् बोले-तदनन्तर इस प्रकार लोगोंद्वारा | पूछा ॥ २२ ॥ प्रबोधित किये जानेपर रानी इन्दुमती थोड़े ही समयमें | इन्दुमती बोली-हे मुने! मेरे पति कहाँ और उनके वचनोंसे आश्वस्त हो गयी और उसने अपने | किस प्रकार रह रहे हैं? हे वेदज्ञ! किस उपायसे मुझे आँसुओंको वस्त्रसे पोंछकर वहाँ आये सभी लोगोंको | उनका दर्शन होगा? हे मुने! मुझपर कृपा करिये और विदा किया ॥ ११-१२ ॥ | उस उपायको बताइये, चाहे वह कितना भी कठिन व्रत, सौभाग्य-चिह्नोंको त्यागकर वह अत्यन्त क्षीणताको | दान या तप हो ॥ २३-२४ ॥ प्राप्त हो गयी थी। वह [प्रायः] रोती रहती, शोक करती | नारदजी बोले-मैं उस उत्तम व्रतको संक्षेपमें रहती, लम्बी-लम्बी साँसें लेती तथा बार-बार मूर्च्छित | तुमसे कहता हूँ। उसे श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे हो जाती थी। तदनन्तर बारह वर्षोंके पश्चात् दिव्यदर्शन | प्रसन्नतापूर्वक आरम्भ करना चाहिये। प्रभातकालमें नारद मुनि अपनी इच्छासे विचरण करते हुए उसके | दातून करके नदी, तालाब या वापीमें संकल्पपूर्वक स्नान भवनमें आये। उन्हें देखकर वह अपने पतिका वृत्तान्त | करे ॥ २५-२६ ॥ बताते हुए शीघ्र ही रोने लगी और उनसे उस दुःखको | तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके घर जाकर कहा, जो उसने बारह वर्षमें अनुभव किया था। तब | गणेशजीकी चार भुजाओंवाली उत्तम और सुन्दर मूर्ति नारदमुनिने उसके रुदनको सुनकर उसे हर्ष प्रदान करते | बनाये तथा स्थिर चित्तसे षोडश उपचारोंसे पूजन करे हुए कहा- ॥ १३-१५१/२ ॥ | और दिन-रातमें स्वयं [द्वारा] प्रयत्नपूर्वक [बनाये गये] नारदजी बोले-तुम्हारा पति कहीं स्थित है, | एक अन्नका भोजन करे अथवा एक बार भोजन करे तुम्हें उसके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये। तुम नील | या उपवास करे। इस प्रकार भाद्रपदमासकी शुक्लपक्षकी वर्णके वस्त्रसे अपने सिरको आच्छादित करो। कर्णाभूषणोंसे | चतुर्थी तिथितक व्रत करे ॥ २७-२८१/२ ॥ दोनों कानोंको अलंकृत करो। अपने भालपर कुंकुमकी | हे पतिव्रते ! हे सुन्दरि ! अपने वैभवके अनुरूप गीत, सुन्दर बिन्दी लगाओ, हाथमें कंगन और कण्ठमें मंगलसूत्र | वाद्य और नृत्य आदिपूर्वक महोत्सव करे और ब्राह्मणोंको धारण करो ॥ १६-१७१/२ ॥ | भोजन कराये। हे कल्याणि ! इस प्रकार व्रत करो, इससे हिमवान् बोले-सत्यवादी और सर्वज्ञ मुनिके | तुम्हारा पतिके साथ मिलन होगा। हे सुन्दरि ! वह जीवित वचनोंपर विश्वास करके उस (रानी इन्दुमती)-ने तत्काल | है, पातालमें नागकन्याओंद्वारा उसे बन्दी बनाया गया है। सभी वस्त्राभूषणोंको मँगाकर हर्षित होकर वैसा ही | हे राज्ञि ! मैं सत्य कहता हूँ, मेरा वचन अन्यथा नहीं किया, जैसा नारदजीने कहा था। तदनन्तर उसने समस्त | होगा ॥ २९-३१ ॥ ब्राह्मणोंको बुलवाकर सर्वप्रथम नारदजीका सम्यक् प्रकारसे | हिमवान् बोले-उन मुनिके द्वारा इस प्रकार पूजनकर सभी ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें अनेक | कहे जानेपर रानीने आदरपूर्वक व्रत प्रारम्भ किया।
१८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उन मुनिके चले जानेपर कुछ दिनों बाद श्रावणमास | स्मरण और ध्यानसे तथा गीत, वाद्य, नृत्य एवं ब्राह्मण- आनेपर उसने गजानन गणेशजीकी सुन्दर-सी पार्थिव | भोजनसे उन परमात्माको प्रसन्न किया ॥ ३४-३५१/२ ॥ मूर्ति बनायी तथा पहले कही गयी विधिसे अत्यन्त | उसने नारदमुनिके वचनानुसार दीर्घकालसे खोये मनोहर पूजा की ॥ ३२-३३ ॥ | हुए अपने प्रियतमकी प्राप्तिके लिये पलमात्र दुग्धका उसने दिव्य गन्धों, दिव्य वस्त्रों, दिव्य पुष्पों, अनेक | पान करते हुए श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे प्रकारके दिव्य नैवेद्यों, फलों, सुवर्ण [दक्षिणा], दीपों, | भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीतक [गणेशजीका] उत्तम व्रत पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तवन, गणेशजीके नाम- | किया ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्दुमती-नारद-संवाद' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४॥ पचपनवाँ अध्याय गणेशचतुर्थीव्रतके माहात्म्यके सन्दर्भमें राजा चन्द्रांगद और रानी इन्दुमतीके पुनर्मिलनकी कथा हिमवान् बोले-[हे पार्वती !] इस प्रकार उस | स्नान करके अभी-अभी भवनको गयी हैं। उपवास और रानी इन्दुमतीके गणेशचतुर्थीव्रतके पूर्ण होनेपर गणेशजीकी | व्रतका पालन करती हुई वे अत्यन्त कृश शरीरवाली हो कृपासे पातालमें नागकन्याओंकी मति बदल गयी ॥ १ ॥ | गयी हैं, उनकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं ॥ ८ ॥ तब उन्होंने राजाको बन्धनमुक्त कर दिया और | वे अपने पुत्र राजकुमारमें अपने प्राणोंको स्थितकर वस्त्राभूषणों तथा अनेक प्रकारके रत्नों एवं महान् धन- | नाममात्रको जीवित हैं। उनमें कुछ [नागरिकों]-ने सम्पत्तिसे उनका यथाविधि पूजन किया ॥ २ ॥ | नगरमें जाकर इस शुभ समाचारकी घोषणा कर दी ॥ ९ ॥ उन्होंने राजा [चन्द्रांगद]-को मनके समान वेगवाला | तब वह रानी इन्दुमती अत्यन्त आप्त पुरुषोंद्वारा अश्व प्रदानकर विदा किया। तब वे राजा उस तालाबसे | 'राजा आ गये हैं' इस वचनको सुनकर योगविद् बाहर आये और अश्वको एक विशाल वृक्षसे बाँधकर | ब्रह्मज्ञानीकी भाँति आनन्दसागरमें निमग्न हो गयी ॥ १० ॥ जब स्नान करने लगे, तब कुछ नागरिकोंकी दृष्टि उनपर | तदनन्तर रानी इन्दुमतीने मन्त्रियोंके नेतृत्वमें सैनिकोंको पड़ी। कुछ नागरिकोंने उनको राजा चन्द्रांगद समझा और | राजाके पास भेजा और नगरको रंग-बिरंगी ध्वजाओं कुछ लोग उन्हें भिन्न व्यक्ति समझ रहे थे। उनमें कुछ | और पताकाओंसे सुशोभित करवा दिया ॥ ११ ॥ कहने लगे कि यह चन्द्रांगद-जैसा तो है, किंतु राजा | उसने राजमार्गोंपर जलका छिड़काव करा दिया चन्द्रांगद नहीं है। उनमेंसे कुछने उनके पास जाकर पूछा | और सभाको यत्नपूर्वक सुसज्जित करा दिया तथा कि 'आप कौन हैं? कहाँके रहनेवाले हैं? कहाँसे आये | स्वयंको वस्त्रों, अलंकारों और आभूषणोंसे विभूषित हैं? हे प्रभो! आपका नाम क्या है? यह सब हमें | किया। उसने गाय, भूमि, स्वर्ण आदि अनेक प्रकारके बताइये' ॥ ३-५ ॥ | दान देकर बहुत-से द्विजोंको सन्तुष्ट किया और सौभाग्यवती उनके इस प्रकारके वचन सुनकर उन नृपश्रेष्ठ | स्त्रियोंके हाथमें आरती [-के थाल] देकर वह उनके [चन्द्रांगद]-ने [रानी] इन्दुमती और राजकुमारका दुखी | साथ गायन और वादनकी [मांगलिक] ध्वनिसहित मनसे कुशल-समाचार पूछा। तब उन लोगोंने उन्हें | नगरसे सरोवरपर आयी ॥ १२-१३१/२ ॥ पहचान लिया और प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन | मन्त्रियोंने उन नृपश्रेष्ठके सम्मुख जाकर उन्हें किया ॥ ६-७ ॥ | प्रणामकर प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया। उन्होंने कहा कि हे नृप ! आपकी पत्नी (रानी इन्दुमती) | तत्पश्चात् अन्य सभी नागरिकोंने यथाक्रम उन्हें प्रणाम
उ०ख०-अ०५५] * गणेशचतुर्थीव्रत-माहात्म्यमें चन्द्रांगद और इन्दुमतीके पुनर्मिलनकी कथा * १८१
[बायाँ स्तम्भ]
किया और राजा [चन्द्रांगद]-के बैठ जानेपर उनकी आज्ञासे सभी लोग बैठ गये। तदनन्तर वे श्रेष्ठ राजा सभीको कुशल-प्रश्न आदिसे प्रसन्नकर उन्हें यथायोग्य ताम्बूल और वस्त्र देकर सम्मानित करके इन्दुमतीके शिविरमें गये॥ १४-१६१/२॥
उन्होंने बारह वर्षकी अवधिमें शेष रह गये करणीय कृत्योंको धर्मशास्त्रोंके द्रष्टा द्विजोंद्वारा सम्पन्न कराया। राजाने गणेशजीका सर्वप्रथम पूजन किया। तत्पश्चात् पुण्याहवाचन करवाया तथा भगवान् शंकरका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा आदिसे सन्तुष्ट किया ॥ १७-१८॥
तत्पश्चात् नारियल फोड़कर वे इन्दुमतीके सम्मुख गये और वहाँ उन्होंने इन्दुमतीको चन्द्रमाकी क्षीण कलाओंकी भाँति [तेजोहीन तथा कृश] देखा॥ १९॥
तब रानी इन्दुमतीने सौभाग्यवती युवतियोंसे राजाकी आरती उतरवायी और उनसे उनके ऊपर लाजा (धानके लावा) और पुष्पोंकी वृष्टि करवायी॥ २०॥
तब आनन्दके आँसुओंसे भरी आँखोंको सम्यक् प्रकारसे पोंछकर हर्ष और शोकसे समन्वित वे दोनों परस्पर वार्ता करने लगे॥ २१॥
उन दोनोंने वियोगजन्य अपने-अपने मानसिक क्लेशको एक-दूसरेसे शोकपूर्वक कहा, तब मन्त्रियोंने उनको नियतिके विधानकी अनिवार्यता बतलाते हुए अनेक प्रकारके वचनोंसे सान्त्वना दी॥ २२॥
तदनन्तर वे राजाको अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तथा छत्र और पताकासे सुशोभित एक महान् गजराजपर बैठाकर [नगरको] ले गये॥ २३॥
वह महागवराज पादरक्षकोंसे घिरा हुआ था और उसपर लटकते हुए चार घण्टे सुशोभित हो रहे थे। लाठी लिये हुए सौ पुरुष लोगोंको रास्तेसे हटाते हुए उसके आगे-आगे चल रहे थे॥ २४॥
बहुत-से आग्नेयास्त्रधारी, अश्वारोही और रथारोही राजाके बायें और दायें पार्श्वमें स्थित होकर हाथीको देखते हुए शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे॥ २५॥
राजाके आगे-आगे बहुत-से नट, नृत्यांगनाएँ,
[दायाँ स्तम्भ]
वाद्य-वादक और वन्दीजन तथा उनके पीछे गजारोही चल रहे थे। इस प्रकार आदरपूर्वक राजाने नगरमें प्रवेश किया। उस समय सैनिकोंके चलनेसे उठी धूलसे [नभमण्डल] व्याप्त हो जानेसे सूर्य निस्तेज-से प्रतीत होने लगे थे। यद्यपि वह नगर अलंकृत किया गया था, लेकिन [धूलके कारण] कुछ भी सूझ नहीं रहा था॥ २६-२७॥
तदनन्तर सभी लोग परस्पर एक-दूसरेका अभिवादन करके अपने-अपने घर चले गये, तत्पश्चात् विशिष्ट जनोंको राजभवनमें ले जाया गया। वहाँ वे सब राजाद्वारा वस्त्र और ताम्बूल देकर सम्मानित होनेके बाद उनकी आज्ञा पाकर घर चले गये। राजाने ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जाति-बान्धवोंके साथ भोजन किया ॥ २८-२९॥
तदनन्तर रात्रिमें उन दोनों [राजा और रानी]-ने सुन्दर विधिसे निर्मित, बहुमूल्य गद्दोंसे युक्त, जिसपर चादर बिछा था और तकिया लगा था, ऐसे पलंगपर शयन किया। वे दोनों बार-बार शोक करते हुए अपने-अपने दुःखोंको कह रहे थे, तब पुरोहितद्वारा सान्त्वना देनेपर वे दोनों सुखपूर्वक सो गये॥ ३०-३१॥
नृपश्रेष्ठ चन्द्रांगदने अपनी पत्नीद्वारा किये गये विनायकव्रतके माहात्म्यको सुनकर स्वयं भी उसे करनेका मनमें संकल्प किया॥ ३२॥
हे सुमुखि! तदनन्तर श्रावणमासके आनेपर राजा चन्द्रांगदने महोत्सवपूर्वक इस व्रतको किया॥ ३३॥
ऋषि बोले—पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर पार्वतीजी अत्यन्त हर्षित हुईं और उन्होंने आदरपूर्वक श्रावणमासमें [गणेशचतुर्थीका] व्रत किया॥ ३४॥
पार्वतीजीने यथोक्त (शास्त्रोक्त) विधिसे [गणेशजीकी] मूर्तिका निर्माणकर गजानन गणेशजीका ध्यान करते हुए पयमात्राका आहारकर प्रयत्नपूर्वक [उनकी] पूजा की। इससे भगवान् शंकरका भी मन चंचल हो उठा और वे शूलपाणि स्वयं उन पार्वतीजीके आश्रममें पधारे॥ ३५-३६॥
गणेशचतुर्थी [भाद्रशुक्ल चतुर्थी]-को उस शुभव्रतके सम्यक् रूपसे पूर्ण हो जानेपर देवी पार्वती ने वृषभपर
१८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
आरूढ़ भगवान् शिवको अपने आश्रममें आया हुआ देखा। तब उन्होंने उठकर उनके युगल-चरणकमलोंमें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया और सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरका विधिवत् पूजन किया। तदनन्तर प्रेमविह्वल पार्वतीजीने उन महादेवसे कहा— ॥ ३७-३८ ॥ देवी बोलीं— 'आप मुझे छोड़कर क्यों चले गये थे ? आपने मुझे क्यों विस्मृत कर दिया ? हे विभो ! आपका एक निमेषका भी वियोग कल्प-कल्पके समान हो रहा था। पिताके निर्देशपर मैंने गणेशजीके इस व्रतको किया। [उन्हीं] वरदाता गणेशजीकी कृपासे मैंने आपका दर्शन प्राप्त किया' ॥ ३९-४०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] उसी समय हिमवान् वहाँ आये। उन्होंने आदरपूर्वक सती [पार्वती]- का हाथ उन शिवके हाथमें दे दिया। तब गन्धर्वोंसहित सभी देवताओंने आदरपूर्वक गजानन गणेशजीका और सज्जनोंका कल्याण करनेवाले शिव-शिवाका पूजन किया। उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाशसे फूलोंकी वृष्टि होने लगी ॥ ४१-४३ ॥ तदनन्तर उन सभीने गजानन गणेशजीको नमस्कारकर विविध स्तोत्रोंसे उनका स्तवनकर उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् शंकरने भी जय-जयकार करते हुए गजाननका स्तवन किया ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् [भगवान् शंकर]-ने पार्वतीको अर्धाङ्गिनी बनाकर शीघ्र ही कैलासपर्वतके लिये प्रस्थान किया तथा अन्य सब लोग भी अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! हे महामुने ! तुमने गणाधिपति गणेशजीके व्रतके माहात्म्यके सम्बन्धमें जो कुछ पूछा था, मैंने वह सब कुछ बतला दिया। अब मैं तुमसे पुनः एक अन्य कथानकको कहता हूँ, जिसको सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकर-पार्वतीके मिलनका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥
छप्पनवाँ अध्याय
गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान
भृगुजी बोले— हे राजन् ! इस प्रकार मैंने [गणेश- चतुर्थी व्रतके] सम्पूर्ण माहात्म्यको कहा। अब जो ब्रह्माजीद्वारा व्यासजीके प्रति कहा गया था, उसे तुम पुनः सुनो ॥ १ ॥ सोमकान्त बोले— हे महामुने ! अमित बुद्धिवाले व्यासजीने ब्रह्माजीके मुखसे क्या सुना ? उसे आप कहिये। [उसे श्रवण किये बिना] मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥ भृगुजी बोले— [हे राजन्!] इस प्रकार [गणेश- चतुर्थीव्रतके माहात्म्य-सम्बन्धी] कथानकको सुनकर व्यासजीने आदरपूर्वक ब्रह्माजीसे पूछा। हे निष्पाप [राजन्] ! तब उन्होंने भी आदरपूर्वक उसको कहना प्रारम्भ किया ॥ ३ ॥ व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन् ! आप मुझसे गणनायक गणेशजीकी श्रेष्ठ कथाको पुनः कहिये। विघ्नेश्वर गणेशजीकी सत्कथाको श्रवण करनेकी मेरी लालसा अत्यधिक बढ़ती जा रही है ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! कौतूहलसे भरी हुई गणेशजीकी एक अन्य कथाका श्रवण करो, जो शूरसेन आदि [राजाओं]-द्वारा अनुभूत है ॥ ५ ॥ मध्य देशके अत्यन्त रमणीय सहस्र नामक नगरमें शूरसेन नामके एक महान् बलवान् राजा हुए। वे वेद- वेदांगके पारगामी विद्वान्, धनवान्, रूपवान्, दानी, यज्ञकर्ता, प्रजाके रक्षक, शक्तित्रय^१से सम्पन्न, मानी, राजनीतिमें व्यवहार्य छः अंगों^२में दक्ष, [शत्रुपर विजय पानेके] चार उपायों^३के प्रयोगमें चतुर, चतुरंगिणी^४ सेनासे सम्पन्न और द्विज- देवताओंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले थे ॥ ६-८ ॥
१. प्रभु, मन्त्र और उत्साह—ये तीन प्रकारकी राजशक्तियाँ होती हैं। २. परराष्ट्रनीतिकी सफलताके लिये राजाद्वारा व्यवहार्य छः उपाय—१.सन्धि, २.विग्रह, ३.यान (चढ़ाई), ४.आसन (विराम), ५.द्वैधीभाव और ६.संश्रय। ३. साम, दान, भेद और दण्ड। ४. पैदल सेना, गजसेना, रथारोही और अश्वारोही।
उ०ख०-अ०५६ ] * गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान * १८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] सम्पूर्ण पृथिवीमण्डल सदैव उनके वशवर्ती रहा। उनका नगर पृथवीतलपर इन्द्रके नगर (स्वर्ग)-से भी विशिष्ट प्रतीत होता था। उनकी पत्नीका नाम पुण्यशीला था, जो अत्यन्त पुण्यशालिनी थी। उसके रूपकी समानता करनेवाली नारी त्रैलोक्यमण्डलमें कोई नहीं थी ॥ ९-१० ॥ जिसके पातिव्रत्यसम्बन्धी गुणोंको देखकर अरुन्धतीको भी लज्जा आ जाती थी और उसके असूयात्यागको देखकर अनसूया भी लघुताको प्राप्त हो जाती थीं ॥ ११ ॥ किसी समय वे राजा शूरसेन मन्त्रियों और श्रेष्ठ वीरोंसे घिरे हुए राजसभामें विराजमान थे, उस समय उन्होंने नेत्रज्योतिका हरण कर लेनेवाले अग्निसदृश तेजवाले आकाशचारी उत्तम विमानको देखा। उसे देखकर गायन-श्रवणमें आसक्त राजाके साथ सभी सभासद् व्याकुल होकर 'यह क्या है, यह क्या है?'— कहते हुए दूतोंको इस विषयमें ज्ञात करनेके लिये प्रेरित करने लगे। [तब] वे दूत उस सूर्यसदृश प्रभाववाले विमानको देखनेके लिये गये ॥ १२-१४ ॥ [उन राजदूतोंमें] एक कोई राजदूत, जो वैश्य-पुत्र था और [किसी उत्कट पापके कारण] कुष्ठरोगसे ग्रस्त था। उसकी दृष्टि पड़ते ही वह विमान भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर दूतोंने राजाके पास जाकर कहा—'हे महाराज! पुण्यशाली देवगणोंसे संयुक्त वह देदीप्यमान विमान किसी दुष्टके दृष्टिपातसे भूतलपर गिर पड़ा' ॥ १५—१६ १/२ ॥ तब अत्यन्त हर्षित राजा दो मन्त्रियोंको साथ ले अश्वपर आरूढ़ हो विमानको देखनेकी उत्सुकतासे अपनेको महान् भाग्यशाली मानते हुए अपने बन्धु- बान्धवोंसहित वहाँ गये। उस समय अनेक प्रकारके बाजे बज रहे थे। वहाँ उन सबने सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रको देखा। उन्हें देखकर सब अपने-अपने वाहनोंसे उतर गये और उन्हें प्रणाम किया ॥ १७-१९ ॥ तदनन्तर अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत और सम्पूर्ण देवगणोंसे घिरे हुए बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्रसे राजाने हाथ जोड़कर कहा—'हे शचीपते ! आज यह धरणी धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी सम्पत्ति धन्य हो गयी, मेरे पूर्वज तथा हम सबके नेत्र
[दायाँ स्तम्भ] आज धन्य हो गये, जो कि इस मृत्युलोकमें अनुगामियोंसहित मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ ॥ २०—२१ १/२ ॥ ब्रह्मा, ईशान (शिव) आदि देवता भी जिनके वशवर्ती हैं, जिनका दर्शन सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा ही सम्भव है, अन्य किसी भी भाँति नहीं, ऐसे आपका आज हम सब लोगोंको दर्शन न जाने किस पुण्यसे हुआ है! हे प्रभो ! यह आपका जो विमान है, वह पृथवीतलपर कैसे गिर पड़ा ? हे देव ! सम्प्रति मेरा यह संशय आप दूर करें और आप कहाँ गये थे अथवा कहाँ जायँगे— यह भी बतलाइये' ॥ २२—२४ १/२ ॥ शतक्रतु इन्द्र बोले—हे राजन् ! उस आश्चर्यमयी घटनाको सुनो, जिसे नारदजीने मुझसे कहा था। हे नृप ! मैं उसे तुमसे कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर [उसका] श्रवण करो ॥ २५ १/२ ॥ नारदजी बोले—हे शक्र ! मैं मृत्युलोक (पृथ्वी)- में भृशुण्डीके आश्रममें गया था, वे गणेशजीके स्वरूपमें स्थित होकर निरन्तर (रात्रि-दिन) [गणेशजीके मन्त्रका] जप करते रहते हैं ॥ २६ ॥ उनके द्वारा [गणेशजीके स्वरूपका] ध्यान किये जानेसे उनका भी स्वरूप वैसा (गणेशजीके स्वरूप- जैसा) ही हो गया है—यह आश्चर्यमयी घटना मैंने वहाँ देखी। उन गजाननस्वरूपधारी मुनिद्वारा पूजित होकर, उन्हें नमस्कारकर और उनकी आज्ञा ले मैं यहाँ आपके दर्शनके लिये आ गया। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र ! मैंने ऐसा [विलक्षण] सारूप्य पृथ्वीपर अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! ॥ २७-२८ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजन् !] तब मैं नारदजीका पूजनकर और उन्हें विदाकर उसी क्षण अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक उस प्रकारके मुनिका दर्शन करनेके लिये चल दिया ॥ २९ ॥ मन और वायुके समान वेगशाली श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर मैंने गजाननरूपधारी [भृशुण्डी] मुनिके [पास जाकर उनका] दर्शन किया। उनका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर, उनके चरणोंमें प्रणामकर तथा उनकी पूजा ग्रहणकर जब सपरिवार अमरावती जानेकी इच्छासे
१८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैं चला, तो तुम्हारे नगरके समीप यह विमान जैसे ही पहुँचा, उसी समय तुम्हारे कुष्ठरोगसे ग्रस्त पापी दूतकी दृष्टि पड़ते ही यह यहाँ भूतलपर गिर पड़ा। हे नृप! मैंने सारी बात तुमसे कह दी ॥ ३०-३२१/२॥ [राजा] शूरसेन बोले- हे शतक्रतु इन्द्र! किस तपस्यासे या किस व्रत-साधनसे भृशुण्डीने गजाननका स्वरूप प्राप्त कर लिया? हे प्रभो! वह सब मुझसे कहिये। प्राणीको जैसे अमृतका पान करनेपर तृप्ति नहीं होती, और पीनेकी इच्छा रहती है, वैसे ही इस अमृतोपम कथाका श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है अर्थात् गणपति-महिमा-सम्बन्धिनी अन्य कथाओंका श्रवण करनेकी लालसा बढ़ती जा रही है। हे स्वामिन्! गजाननकी अमृतोपम कथाओंको सुननेसे कौन विरत हो सकता है॥ ३३-३४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शक्रके विमानका पतन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय भृशुण्डीमुनिका प्रारम्भिक जीवन, मुद्गलमुनिकी उनपर कृपा, उनकी कठोर तपस्या तथा उन्हें गणेश-सारूप्यकी प्राप्ति शतक्रतु इन्द्र बोले— [हे राजन्!] अब मैं तुमसे इस प्राचीन कथाको कहता हूँ कि जिस प्रकार मुनि भृशुण्डीने गणाधिपति गणेशजीकी भक्तिके प्रभावसे उनका सारूप्य प्राप्त कर लिया था ॥ १ ॥ दण्डकारण्य देशमें 'नन्दुर' संज्ञक नगरमें 'नाम' नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट मछुआरा रहता था ॥ २॥ वह बाल्यकालसे ही चोरी करने लग गया था और युवा होनेपर परायी स्त्रियोंसे व्यभिचारकर्म करने लगा था। वह दूसरोंके न देखते और देखते हुए भी उनकी वस्तुएँ चुरा लेता था तथा 'मैंने चोरी नहीं की' इस प्रकारकी शपथ भी ले लेता था ॥ ३ ॥ वह दो व्यक्तियों (सुहृदों)-के हृदयमें भेद उत्पन्न करनेके लिये मिथ्या शपथ लेता था। वह जुआ खेलने और मदिरा पीनेमें लगा रहता था, इसलिये लोगोंने उसे गाँवसे बाहर निकाल दिया। तब वह वहाँसे बहुत दूर वन्य प्रान्तके पहाड़की एक गुफामें पत्नीसहित रहने लगा। उसने उस मार्गमें जानेवाले बहुत-से पथिकोंको मार डाला था। इस प्रकार [जब] उसके पास बहुत- सा धन हो गया तो उसने उससे बच्चोंसहित अपनी स्त्रीको अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित किया और अपने धन-वैभवसे उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ४-६॥ वह शस्त्र, तलवार-ढाल, बहुत-से पाश, उत्तम धनुष, दोनों सिरोंपर लौहबद्ध लाठी और बाणोंसे परिपूर्ण विशाल तरकस धारण किये रहता था ॥ ७ ॥ वह वृक्षकी किसी ऊँची डालपर बैठकर या उसके कोटर (खोखले भाग)-में छिपकर [उस मार्गसे जानेवाले] बहुत-से यात्रियोंको मारकर उनकी विविध वस्तुओं, वस्त्रों तथा आभूषणोंको लाकर घरमें संचित करता था तथा दूसरे नगरमें ले जाकर उन्हें बेच देता था और नित्य अपने भवनमें यथेष्ट विषयोंका सेवन किया करता था ॥ ८-९॥ इस प्रकार पापपूर्ण आचरण करनेवाला वह वनमें अनेक पशुओंका भी वध करता था। एक बार किसी वन्य पशुके पीछे दौड़ता हुआ वह एक योजन दूरतक चला गया ॥ १० ॥ [परंतु] पशु उसकी पहुँचसे दूर जा चुका था और वह [दौड़ता हुआ] थककर धरतीपर गिर पड़ा। तदनन्तर वह दुष्ट बड़े कष्टसे उठकर धीरे-धीरे चलने लगा। मार्गमें चलते हुए उसने पवित्र गणेशतीर्थको देखा। वहाँ उसने केवल श्रमका परिहार करनेके लिये ही स्नान किया ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर अपने व्यवसाय (लूट-पाट)-के उद्देश्यसे जब वह जा रहा था तो मार्गमें उसने मुद्गल [मुनि]- को देखा, जो गणनाथ गणेशजीके नाम-मन्त्रका जप कर रहे थे ॥ १३ ॥
उ०ख०-अ०५७ ] * भुशुण्डिमुनिका प्रारम्भिक जीवन * १८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] तब वह 'नाम' नामका मछुआरा म्यानसे तलवार निकालकर उसे उठाये मुद्गल [मुनि]-के निकट उन्हें मार डालनेका मन बनाकर गया। [परंतु] गजानन गणेशजीके भक्त मुद्गलके प्रभावसे उसके शस्त्र तथा दृढ़ मुट्ठीसे तलवार भी फिसल गयी और उस दुष्टकी बुद्धि भी उसी क्षण परिवर्तित हो गयी॥ १४-१५१/२ ॥ उसे उस अवस्थामें देखकर वे मुनिवर [मुद्गलजी] हँस पड़े। तत्पश्चात् संयतचित्त होकर उससे पूछा— बताओ, तुम्हारे सभी शस्त्र बँधे होनेपर भी क्यों गिर पड़े? ॥ १६-१७ ॥ इन्द्र कहते हैं— [हे राजा शूरसेन!] गणेशतीर्थमें स्नान करने और उन मुनिका दर्शन करनेसे ज्ञान-वैराग्यसे युक्त हुआ वह [मछुआरा] मुद्गलजीसे बोला ॥ १८ ॥ मछुआरा बोला— हे ब्रह्मन् ! मैं यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात मानता हूँ कि इस कुण्ड (गणेशतीर्थ)- में स्नान और विशेष रूपसे आपके दर्शनसे मेरी बुद्धि परिवर्तित हो गयी। बाल्यकालसे ही मेरी बुद्धि दुष्टतापूर्ण और पापपरायण हो गयी थी। हे प्रभो! मैंने आजतक असंख्य पाप किये हैं ॥ १९-२० ॥ इस समय आपकी कृपासे मेरी मति [इन पाप- कर्मोंसे] विरक्त हो गयी है। अब मैं अपने इन गिरे हुए शस्त्रोंको पुनः ग्रहण नहीं करूँगा ॥ २१ ॥ अब आप मेरे ऊपर पूर्ण कृपा कीजिये और मेरा इस भवसागरसे उद्धार कीजिये। साधु पुरुष दीन पापीजनोंपर भी अनुग्रह करते हैं। हे महामुने! जैसे पारसमणिका धातुओंसे सम्पर्क व्यर्थ नहीं होता, वैसे ही साधु पुरुषोंकी संगति कभी भी व्यर्थ नहीं देखी गयी है ॥ २२-२३ ॥ इन्द्र कहते हैं— [हे राजन्!] उस मछुआरेके इस प्रकार कहनेपर शरणागतके त्यागमें दोषका विशेष रूपसे स्मरण करते हुए वे मुद्गलमुनि उससे कृपापूर्वक बोले— ॥ २४ ॥ मुद्गलजी बोले— दानादि कृत्य विधिपूर्वक किये जाते हैं, उनमें तुम्हारा अधिकार नहीं है, तथापि तुमपर कृपा करनेके लिये तुम्हें गजानन गणेशजीके मनुष्योंके लिये सभी सिद्धियोंको देनेवाले नामजपका उपदेश करता
[दायाँ स्तम्भ] हूँ। तदनन्तर [जब वह] कैवर्तक महर्षि मुद्गलको प्रणाम करने लगा, तो उन्होंने उसके मस्तकपर अपना अभयप्रद श्रीहस्त स्थापित किया और 'गणेशाय नमः'— इस नाममन्त्रका उपदेश दिया ॥ २५-२६१/२ ॥ उन्होंने अपनी यष्टिको उसके सामने भूमिमें रोपित कर दिया और उससे प्रीतिपूर्वक बोले कि जबतक इस यष्टिमें अंकुर न निकल आये और जबतक मैं आ न जाऊँ, तबतक तुम इस मन्त्रका जप करते रहो ॥ २७-२८ ॥ एक आसनमें बैठकर वायुमात्रका भक्षण करते हुए एकाग्रचित्तसे [जप करते हुए] सायं-प्रातः नित्य- निरन्तर यष्टिमूलमें जल डालते रहना ॥ २९ ॥ इन्द्र बोले— मछुआरा नाम मुद्गलमुनिद्वारा उपदेश पाकर और उन मुनिके अन्तर्हित हो जानेके बाद अपने जीवनसे निराश होकर वहीं स्थित हो गया ॥ ३० ॥ मुनिकी यष्टिको सामने रखकर वनमें वृक्षकी छायाका आश्रय लेकर एक आसनमें स्थित हुआ वह [गणेशजीके] नाममन्त्रका [निरन्तर] जप करता रहा ॥ ३१ ॥ निराहार और निराकांक्ष रहते हुए इन्द्रियसूहोंपर विजय पाकर एवं मनको वशमें करके [वह तप करता रहा।] इस प्रकार सहस्र वर्ष बीत जानेपर उस यष्टिमें अंकुर निकल आये। तब वह मुनिके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगा। [उस समय] उसका शरीर दीमकोंकी बाँबीसे वेष्टित हो गया था और उसपर लताओंका जाल-सा फैल गया था ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर वे मुद्गलमुनि दैववशात् उस स्थानमें आये, तो उन्हें उस कैवर्त (मछुआरे) और यष्टिका स्मरण हुआ। तब भ्रमण करते हुए उन मुनिने उस उत्तम यष्टिको अंकुरित हुए और उस मछुआरेको दीमकोंकी बाँबीसे आक्रान्त शरीरवाला देखा ॥ ३४-३५ ॥ उसका वह उत्तम तप सम्पूर्ण मुनियोंके लिये भी दुष्कर था। उस समय उन मुद्गलमुनिने बड़े प्रयत्नपूर्वक मात्र नेत्रोंको देखकर उसे पहचाना ॥ ३६ ॥ तदनन्तर उन मुनिश्रेष्ठने उसके शरीरपर स्थित दीमकोंकी बाँबीको हटाया और अभिमन्त्रित जलसे उसके
१८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सम्पूर्ण शरीरका सिंचन किया। तदुपरान्त जपके प्रभावसे दिव्य शरीर तथा गणपति के सारूप्यको पा लेनेवाले उस कैवर्तकको मुनिने सम्बोधित किया ॥ ३७-३८ ॥ उसके दो [दिव्य] हाथ थे और वह भगवान् विनायकके शुभ नामका जप कर रहा था। मुनिके द्वारा उद्बोधित किये जानेपर उसने अपने नेत्र खोले ॥ ३९ ॥ उसके नेत्रोंसे उत्पन्न अग्नि विद्युत्की भाँति आकाशको चली गयी और वह त्रिलोकीको दग्ध करनेके लिये उद्यत हो गयी, तब मुनिके द्वारा उसका निवारण किया गया। वह मछुआरा भी अपने करुणामय गुरु उन मुद्गलमुनिको नमनकर और उनका आलिंगनकर वैसे ही प्रसन्न हुआ, जैसे पुत्र अपने पिताका आलिंगनकर प्रसन्न होता है ॥ ४०-४१ ॥ तब उस 'नाम' नामक मछुआरेको, जिसे उपदेश दिया था, पुनः वल्मीकसे उत्पन्न होनेके कारण उन्होंने अपना पुत्र मान लिया। हे राजन् ! मुद्गलमुनिने उसका आदरपूर्वक नामकरण किया; उसके भ्रूमध्यसे शुण्डा (सूँड़) निकल आयी थी, इसलिये उन्होंने उसका 'भृशुण्डी' नाम रखा ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर उन मुद्गलमुनिने उसे एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और वरदान देते हुए कहा कि तुम मेरे वचनके प्रभावसे इस एकाक्षरमन्त्रके ऋषि बनो और मुनियोंमें श्रेष्ठ हो जाओ। इन्द्रादि देवताओं, गन्धर्वों और सिद्धोंके लिये भी पूज्य हो जाओ। जैसे भगवान् गणेशका ध्यान और दर्शन पापोंका नाश करनेवाला होता है, वैसे ही [प्रभावसे सम्पन्न हुए] हे मुनि ! तुम भृशुण्डीके रूपमें विख्यात हो जाओ। जिसको तुम्हारा दर्शन हो जाय, वह मनुष्य कृतकृत्य हो जायेगा ॥ ४४-४६ ॥ मेरे कथनानुसार (आशीर्वादसे) तुम्हारी आयु एक लाख कल्पोंकी होगी। इस प्रकार मुद्गलजी जब उसे बहुत-से वरदान दे रहे थे, तो उसी समय इन्द्रादि देवता और नारदादि मुनि भी उसका दर्शन करनेके लिये आये और उसे प्रणिपात करते हुए बोले- 'हे भृशुण्डी ! आपके दर्शनसे हमारा जन्म, हमारी विद्या, हमारे माता- पिता, हमारी तपस्या और हमारा यश सार्थक हो गया ॥ ४७-४८ ॥ हे मुने! आप ही गणनाथ हैं, आप ही हमारे पूजनीय हैं। तब उन भृशुण्डीमुनिने भी उन सबका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर, उन्हें प्रणामकर विदा कर दिया ॥ ४९ ॥ तत्पश्चात् वे पुनः पद्मासनमें स्थित होकर एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे। वे अपने सम्मुख गणेशजीकी सुन्दर मूर्तिकी प्रतिष्ठाकर प्रतिदिन उसका षोडश उपचारोंसे पूजन करने लगे। उनका आश्रम वापी, सरोवर, वृक्ष और लताओंसे सुशोभित हो रहा था। वहाँ सिंह और मृग तथा नेवले एवं विषधर सर्प भी वैरका त्यागकर रहते थे ॥ ५०-५१ १/२ ॥ तदनन्तर सौ वर्ष बीत जानेपर गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए और बोले- 'तुम तो मेरा सारूप्य प्राप्त कर लिये हो, फिर अब क्यों तपस्या कर रहे हो ? तुम तो कृतकृत्य हो चुके हो अर्थात् तुम्हारे सारे कार्य पूर्ण हो गये हैं; अब तुम अपनी आयु पूर्णकर अन्तमें मेरे सायुज्यको प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३ ॥ यह क्षेत्र 'नामल'* नामसे सुविख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंको अनेक प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होंगी ॥ ५४ ॥ यहाँ स्थित मेरी मूर्तिके दर्शनसे मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होगा। [इसके दर्शनसे] पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्रलाभकी और विद्यार्थीको ज्ञानकी प्राप्ति होगी ॥ ५५ ॥ इन्द्र बोले- हे नृपश्रेष्ठ शूरसेन! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कुछ मैंने वर्णन कर दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भृशुण्डी-उपाख्यान' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥
- यह प्राचीन 'अमलाश्मक्षेत्र' है। धर्मराज यमने माताके शापसे छूटनेके लिये यहाँ गणेशजीकी आराधना की थी। यमराजद्वारा स्थापित आशापूरक गणेशजीकी मूर्ति भी यहाँ है। यहाँपर 'सुबुद्धिप्रदतीर्थ' नामक कुण्ड भी है। भृशुण्डि योगेन्द्रकी भी यहाँ मूर्ति है।
अट्ठावनवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०५८ ] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा * १८७ अट्ठावनवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! मरुत्वान् इन्द्रके इस प्रकारके उत्तम वचन सुनकर और उस [भृशुण्डि मुनिकी] अमृतोपम कथाका श्रवणकर प्रसन्न हुए राजा शूरसेनने उनसे पुनः पूछा—॥ १॥ शूरसेन बोले— हे देवेन्द्र! किस उपायसे आपका विमान आकाशमें जा सकेगा? हे विभो! उस उपायको कीजिये अथवा बताइये कि मैं आपके लिये क्या करूँ? ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! इस प्रकारसे पुनः प्रश्न करनेवाले राजा शूरसेनसे सभी लोगोंके सुनते हुए देवशत्रुओंका वध करनेवाले इन्द्रने हँसते हुए-से यह वचन कहा— ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—हे नृपश्रेष्ठ! यदि आपके नगरमें कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय भी संकष्टचतुर्थीका व्रत करनेवाला हो तो उसके द्वारा एक वर्षतक किये गये उस व्रतके पुण्यका सम्यक् प्रकारसे दान दिये जानेपर ही यह गमन कर सकेगा; अन्यथा हे राजन्! यह अयुत (दस हजार) पुरुषोंके प्रयत्न करनेपर भी नहीं चल सकता ॥ ४-५ ॥ राजा बोले—[हे विभो!] मुझे बताइये कि वह मंगलकर संकष्टचतुर्थीव्रत कैसा है? उसका क्या पुण्य है? उसका क्या फल है? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है? ॥ ६ ॥ यहाँ प्राचीनकालमें किसने इस व्रतको किया था, जिसे करनेसे सिद्धि प्राप्त हुई हो। हे इन्द्र! कृपया यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजन्!] इस सन्दर्भमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें कृतवीर्य[के पिता] और नारदजीका संवाद है ॥ ८ ॥ इस पृथ्वीतलपर कृतवीर्य नामक एक बलवान् राजा हुआ था। जो सत्यवादी, शीलसम्पन्न, दानी, यज्ञकर्ता, मानी, महारथी, जितेन्द्रिय, अल्पाहारी और देव-ब्राह्मण-पूजक था। उसके अश्वारोही, गजारोही योद्धाओं, रथियों और धनुर्धारियोंकी संख्याकी गणना नहीं हो सकती थी। हे राजन्! वे सभी सह्याद्रिक्षेत्रके निवासी थे॥ ९-१०१/२ ॥ उसके राजभवनमें सभी पलँग और पात्र सोनेके ही थे। उनके यहाँ भोजन पकानेके लिये भी कभी ताम्रपात्रका प्रयोग नहीं होता था। उसके यहाँ बारह हजार ब्राह्मण पंक्तिबद्ध होकर भोजन करते थे ॥ ११-१२ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरी सुगन्धा उसकी पत्नी थी, जो धार्मिक स्वभाववाली, पतिव्रता और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थी। वह अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत, सौभाग्यवती और ब्राह्मणों, देवताओं एवं अतिथियोंके पूजनमें रुचि रखनेवाली थी। हे राजन्! वे दम्पती (राजा-रानी) इस प्रकारके अर्थात् सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी पुत्रहीन थे ॥ १३-१४ ॥ पुत्रप्राप्तिहेतु उन दोनोंने सभी प्रकारके दान, व्रत और तप किये तथा अन्य नियमोंका पालन किया एवं प्रभूत दक्षिणावाले यज्ञ किये। पुत्र-प्राप्तिकी लालसासे उन्होंने अनेक तीर्थों एवं [पुण्य] क्षेत्रोंकी यात्रा की, फिर भी जन्मान्तरमें किये हुए पापोंके कारण उन्हें पुत्र नहीं हुआ ॥ १५-१६ ॥ [तब] दुखी होकर राजाने एक बार मन्त्रियोंको बुलाकर राज्य, राजमुद्रा, कोश, प्रजा और जनपद—सब कुछ उन्हें दे दिया और रानीसहित [किसी] श्रेष्ठ वनको चले गये। [वहाँ पहुँचकर] वे दम्पती वल्कल और मृगचर्म धारणकर तपमें स्थित हो गये ॥ १७-१८ ॥ केवल सूखे पत्तों तथा वायुमात्रका आहार करते हुए उन दोनोंने इन्द्रियों एवं आहारपर नियन्त्रण कर लिया था। [समस्त शरीरके वल्मीक और लताजालोंसे आवृत हो जानेके कारण] उन दोनोंके मात्र नेत्र ही परिलक्षित होते थे। उन्हें इस अवस्थामें देखकर नारद मुनिने पितृलोकमें स्थित कृतवीर्यके पितासे कहा— 'मृत्युलोक (पृथ्वी)-में तुम्हारा पुत्र कृतवीर्य पुत्रहीन होनेके कारण प्रायोपवेशन (अनशन)-पर बैठा है, वह कल या परसों मर सकता है। यदि उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुत्र प्राप्त हो जाय, तभी वह कृतवीर्य
१८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] जीवित रह सकेगा या मरनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त करेगा-इस प्रकार कहकर नारदजी [वहाँसे] चल दिये, तभी उन्होंने पृथ्वीलोकमें [भृशुण्डीमुनिके गणेशजीसे सारूप्य-सम्बन्धी] अद्भुत घटना देखी ॥ १९-२२॥ [उधर] भृशुण्डीके माता-पिता, उनके दोनों पुत्र और पुत्रीसहित पत्नी-ये सभी अग्निकी ज्वालाओंसे परिपूर्ण कुम्भीपाक नामक भयंकर नरकमें नीचेकी ओर मुख करके लटक रहे थे। यमदूतोंके द्वारा पीटे जानेपर वे अनेक प्रकारसे चीख-पुकार करते हुए क्रन्दन कर रहे थे। उनके क्रन्दनको सुनकर दयानिधान नारदजीने आकर भृशुण्डीसे उनके दुःखको कहा ॥ २३-२४१/२॥ नारदजीने कहा-हे महामुने! गणेशजीके सारूप्यको प्राप्त हुए जिन आपका दर्शन करनेके लिये इन्द्र आदि देवगण तथा कपिल आदि मुनिगण आते हैं, उन आपके माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री और सेवक आपके दोषसे यमलोकस्थ कुम्भीपाक नरकमें क्यों पकाये जा रहे हैं? आप स्वयं भी ज्ञानसम्पन्न हैं, फिर इस बातको क्यों नहीं जानते? आप अपने पूर्वजोंके उद्धारका प्रयत्न कीजिये ॥ २५-२७१/२॥ इन्द्र बोले- [हे राजा शूरसेन!] मुनिके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर भृशुण्डी अत्यन्त दुखित हो गये। अपने पितरोंके दुःखसे दुखी होकर वे प्रज्वलित अग्निकी भाँति सन्तप्त हो उठे। तब उन्होंने उनके उद्धारका उपाय सोचा ॥ २८-२९॥ तदनन्तर परोक्ष तत्त्वके ज्ञाता भृशुण्डीने ध्यानद्वारा
[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] [अपने पितरोंकी स्थिति] देखकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए हाथमें पवित्र जल लेकर संकष्टचतुर्थीव्रत- जनित पुण्यफल अपने पितरोंको प्रदान किया। तदनन्तर पितरोंके उद्देश्यसे भगवान् गणेशसे प्रार्थना करते हुए कहा- ॥ ३०-३१॥ भृशुण्डी बोले-हे गणपति गणेशजी ! यदि मैंने भक्तिपूर्वक आपका व्रत किया हो, तो उसके प्रभावसे आप शीघ्र ही मेरे पूर्वजोंका उद्धार कीजिये ॥ ३२॥ ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको गजानन गणेशजीके हाथमें डाल दिया। तब उस जलके डालते ही गणेशजीकी कृपासे उनके सभी पितर देवताओंके-से स्वरूपवाले होकर विमानोंमें आरूढ़ हो भगवान् गणेशजीके धामको चले गये। उस समय अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं, चारण उनकी स्तुति कर रहे थे और गन्धर्व उनका यशोगान कर रहे थे ॥ ३३-३४१/२॥ कुम्भीपाक नरकमें जो दूसरे भी पापी मनुष्य थे, वे भी विमानोंमें आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे इस व्रतकी महिमाका वर्णन कर दिया ॥ ३५-३६ ॥ जबकि उस व्रतका मात्र एक दिनका पुण्य प्रदान करनेसे वे सब सद्गतिको प्राप्त हो गये तो जिसने जन्मभर आदरपूर्वक संकष्टचतुर्थीका व्रत किया है, उसके पुण्यकी गणना करनेमें शेषजी भी सक्षम नहीं हैं। इसलिये उस व्यक्तिद्वारा दिये गये पुण्यके प्रभावसे मेरा विमान गतिमान् हो जायगा ॥ ३७-३८ ॥
[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रत-माहात्म्य-कथन' नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥
उनसठवाँ अध्याय कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा
[बायाँ स्तम्भ - नीचे] राजा बोले-[हे देवेन्द्र !] भृशुण्डीमुनिके उन पितरोंके कुम्भीपाक नरकसे निकलकर दिव्य लोक (गणेशजीके धाम)-में चले जानेपर कृतवीर्यके पिताने [अपनी वंश-परम्पराको बचाये रखनेके लिये] कौन- सा उपाय किया? ॥ १ ॥ इन्द्र बोले- [हे राजन् !] अपने वंश-विच्छेदकी
[दायाँ स्तम्भ - नीचे] सम्भावना सुनकर दुखी हुए कृतवीर्यके पिता शीघ्र ही ब्रह्मलोकको गये और वहाँ कमलपर आसीन ब्रह्माजीका दर्शन किया ॥ २ ॥ उन्होंने उन्हें प्रणाम करके उनसे अपने वंशके विच्छेदका कारण पूछते हुए कहा-'हे विधाता! मेरा पुत्र अत्यन्त धर्मात्मा, दानी, यज्ञकर्ता, देवताओं और
उ०ख०-अ०५९] * कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा * १८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] अतिथियोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला तथा मान्यजनोंका अतिशय सम्मान करनेवाला है। उसने पुत्र-प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके प्रयत्न भी किये हैं॥ ३-४॥ हे सुरेश्वर! फिर भी उसके पुत्र क्यों नहीं हुआ? अपना राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर [इस समय] वह मात्र वायुका आहार करते हुए वनमें स्थित है॥ ५॥ उसके शरीरमें मात्र हड्डियाँ ही रह गयी हैं और वह आज या कल ही मर सकता है। हे प्रभो! जिससे उसके जन्मान्तरीय पापका नाश हो जाय—उस उपायको आप मुझसे दयाकर कहिये। हे कमलासन! अपने वंशकी वृद्धिके लिये मैं उस उपायको अपने पुत्रको प्राप्त करा दूँगा। तब उनकी इस प्रकारकी मधुर वाणीको सुनकर ब्रह्माजीने भी वैसी ही मधुर वाणीमें कहा कि मेरे द्वारा कथित अपने पुत्रके पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सुनो॥ ६-८॥ [कृतवीर्य जिस नगरका राजा है,] उसी नगरमें पूर्वकालमें साम नामका एक अन्त्यज रहता था। वह इतना अधिक पापी था कि उसको देख लेनेमात्रसे पुण्योंका नाश हो जाता था। एक बार उस [पापी]-ने लोभवश रास्तेमें [जाते हुए] सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रति तटस्थ भाव रखनेवाले बारह ब्राह्मणोंको मार डाला और उन्हें एक गुफाके अन्दर फेंक दिया॥ ९-१०॥ हे राजन्! तदनन्तर उनका सब कुछ लेकर वह माघ कृष्ण चतुर्थीकी रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर अपने घर आ गया। [वहाँ आकर] उसने 'गणेश! गणेश!' कहकर शीघ्रतापूर्वक अपने पुत्रको बुलाया। उस दिन पूरे दिन उसे अन्न-जल नहीं प्राप्त हुआ था, अतः उसने उसीके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया। हे राजन्! बहुत-सा समय बीत जानेके बाद कृष्णपक्षकी चतुर्थीको ही रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेके बाद उसकी मृत्यु हो गयी॥ ११-१३॥ अज्ञानपूर्वक किये गये संकष्टचतुर्थीव्रतजनित पुण्यके प्रभावसे वह श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर भगवान् गणेशके सुखदायी धाममें चला गया। उस समय अप्सराओंके समूह उसपर पंखा डुला रहे थे तथा विमानस्थित [चारण और गन्धर्व आदि] दिव्य पुष्पोंसे अर्चनाकर उसकी स्तुति कर रहे थे॥ १४-१५॥
[दायाँ स्तम्भ] उसी पुण्यके शेष रह जानेके कारण वह पृथ्वीपर तुम्हारे पुत्र राजा कृतवीर्यके नामसे उत्पन्न हुआ, जो [पूर्वजन्मकृत ब्रह्महत्याके पापके कारण] अभीतक पुत्रहीनताको प्राप्त है। हे अनघ! उस महापापका क्षय हो जानेपर ही उसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है॥ १६ १/२॥ हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके इस प्रकारके वचन सुनकर वे काँपने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः पापनाशका उपाय पूछा— ॥ १७ १/२॥ कृतवीर्यके पिता बोले—हे विधाता! उसके द्वारा किया गया ब्रह्महत्याजनित पाप कैसे नष्ट होगा? हे करुणासिन्धु! यद्यपि वह उपाय अत्यन्त दुष्कर होगा, फिर भी उसे बताइये॥ १८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—यदि तुम्हारा पुत्र संकष्टचतुर्थी नामक व्रतको सम्यक् रूपसे करेगा, तो वह पापसे मुक्त हो जायगा॥ १९ १/२॥ राजा (कृतवीर्यके पिता) बोले—हे ब्रह्मन्! उस व्रतको कैसे और किस शुभ मासमें किया जाता है? हे स्वामिन्! वह सब मुझसे कहिये, जिससे वह पाप नष्ट हो सके॥ २० १/२॥ ब्रह्माजी बोले—माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी यदि मंगलवारको पड़े तो चन्द्रमाके अनुकूल होनेपर शुभ मुहूर्तमें इस व्रतका प्रारम्भ करे। पहले दातून करे, फिर इक्कीस बार [किसी पवित्र नदी या सरोवरमें डुबकी लगाकर] स्नान करे॥ २१-२२॥ तत्पश्चात् नित्य कर्मोंका सम्पादनकर [गणेशजीके] श्रेष्ठ मन्त्रका जप करे। निराहार और मौन रहते हुए परनिन्दासे दूर रहे। नियमोंका पालन करे, दुष्कर्म न करे। ताम्बूल-सेवन, जलपान, परद्रोह तथा चुगली न करे। दिनके अन्तमें अर्थात् सायंकाल तिल और आँवलेके चूर्णको शरीरमें लगाकर स्नान करे [गणेशजीके] एकाक्षर, षडक्षर अथवा वैदिक मन्त्रका जप करे॥ २३-२५॥ गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये उनके नाम-मन्त्रका यथाविधि जप करे तथा स्थिरचित्त होकर देवाधिदेव गजानन गणेशजीका ध्यान करे। तदनन्तर एक मुहूर्तके पश्चात् गणपति गणेशजीका षोडश उपचारों और अनेक
१९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके नैवेद्योंसे भी पूजन करे ॥ २६-२७ ॥ [नैवेद्यके रूपमें] पूड़ी, मोदक, पुआ, लड्डू, बड़ा, खीर, विविध प्रकारके अन्नोंसे बने हुए अनेक प्रकारके लेह्य और चोष्य व्यंजनोंसे भोग लगाये ॥ २८ ॥ [तत्पश्चात्] अनेक प्रकारके फलों, ताम्बूल, पूगीफल (सुपारी), दक्षिणा, इक्कीस दूर्वाओं, दीपकों और पुष्पोंसे उनका अर्चन करे ॥ २९ ॥ चन्द्रमाके उदय होनेके समय पहले मन्त्रपूर्वक चतुर्थी तिथिको अर्घ्य दे, फिर गजानन गणेशजीको तत्पश्चात् चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान करे ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् [किये गये] पूजनको गणेशजीको निवेदितकर उन्हें प्रणाम और क्षमायाचना करके भक्तिपूर्वक इक्कीस ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन कराये। आर्थिक रूपसे अशक्त होनेकी स्थितिमें दस या बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणाएँ देकर भली-भाँति सन्तुष्ट करे। तदनन्तर सम्यक् रूपसे गणेशजीकी कथाका श्रवणकर स्वयं मौन होकर भोजन करे ॥ ३१-३२ ॥ तत्पश्चात् शेष रात्रिको गायन-वादन एवं जयघोष कर [जागरण करते हुए] व्यतीत करे। हे राजन् ! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक एक वर्षतक यह व्रत करनेपर [तुम्हारे पुत्रके] सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेसे उसे उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होगी। इस व्रतके करनेवाले मनुष्यकी अन्य भी जो-जो कामनाएँ होंगी, वे पूर्ण होंगी। इसके करनेसे सम्पूर्ण संकटोंका नाश होता है और शत्रुओंकी सेनासे कोई भय नहीं रहता ॥ ३३-३४ १/२ ॥ शमीवृक्षके मूल भागमें बैठकर उपवास करते हुए चन्द्रमाके उदय होनेतक गणेशजीके मन्त्रका जप करते हुए इस व्रतको भलीभाँति करे। इस व्रतको करनेसे अन्धा, गूँगा, मूर्ख, लँगड़ा भी अपने अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। इस व्रतको करनेवाला स्त्री, पुत्र, धन और राज्यको प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है। व्रतीको श्रावण आदि पृथक्-पृथक् मासोंमें घृत, लड्डू आदि पृथक्-पृथक् भोज्य पदार्थोंका भोजन करना चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेवालेको अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७ १/२ ॥ [व्रतीको व्रतके दिन] श्रावणमासमें सात लड्डू, भाद्रपदमासमें दहीका भोजन करना चाहिये। आश्विनमासमें उपवास और कार्तिकमासमें दुग्धपान करना चाहिये। मार्गशीर्षमासमें उसे निराहार रहना चाहिये और पौषमासमें गोमूत्रका पान करना चाहिये। माघमासमें उसे तिलोंका भक्षण करना चाहिये तथा फाल्गुनमासमें शर्करायुक्त घृत खाना चाहिये। चैत्रमासमें उसे पंचगव्यका पान करना चाहिये और वैशाखमासमें शतपत्रिकाका भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमासमें उसे घृतका भोजन तथा आषाढ़मासमें मधुका भक्षण करना चाहिये ॥ ३८-४० १/२ ॥ कृतवीर्यके पिता बोले- हे ब्रह्मन्! अंगारक चतुर्थीका विशेष विधान क्यों कहा गया है? आपके प्रति आदरका भाव रखनेवाले मुझ विनम्र शरणागतसे यह सब कृपापूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी कथाको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकटचतुर्थीव्रतकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ साठवाँ अध्याय भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा, उसकी उग्र तपस्यासे गणेशजीका प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रतकी महिमा ब्रह्माजी बोले- हे राजन् ! मैं अंगारक चतुर्थीकी महिमाको संक्षेपमें कहता हूँ, तुम इसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ १ ॥ हे राजन्! अवन्तीनगरमें भारद्वाज नामके एक महान् मुनि थे। वे वेद-वेदांगके विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान्, सर्वशास्त्रविशारद, अग्निहोत्रपरायण और नित्य शिष्योंके अध्यापनमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ १/२ ॥ एक समय वे मुनि नदीके किनारे बैठकर अनुष्ठानमें रत थे, तभी उन्होंने एक सुन्दर अप्सराको देखा। उसे देखकर उन्होंने उसके साथ रमण करनेका मन बनाया ॥ ३-४ ॥
उ०ख०-अ०६० ] भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा १९१
उ०ख०-अ०६० ] * भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा * १९१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] अकस्मात् उस कामिनीको देखकर मुनि कामासक्त हो गये। कामदेवके बाणोंसे अभिभूत होकर वे भूतलपर गिर पड़े। उनका शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया, जिसके कारण उनका तेज स्खलित हो गया। उनका वह तेज एक बिलके मार्गसे पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर उससे एक कुमारका जन्म हुआ, जिसकी कान्ति जपाकुसुमके समान [अरुणवर्णकी] थी। पृथ्वीने स्नेहवश उसका आदरपूर्वक पालन किया ॥ ७ ॥ ऐसा करते हुए पृथ्वीने अपने जन्म, माता-पिता और कुलको धन्य माना। तदनन्तर वह (बालक) जब सात वर्षका हो गया, तब उसने अपनी मातासे पूछा कि मनुष्यदेहधारी होनेपर भी मेरे शरीरका वर्ण रक्तिम क्यों है? हे माता! सम्प्रति यह बतलाओ कि मेरे पिता कौन हैं ? ॥ ८-९ ॥ पृथ्वी बोली- हे पुत्र! भरद्वाजमुनिका शुभ तेज स्खलित होकर मुझमें प्रविष्ट हो गया, उसीसे तुम्हारा जन्म हुआ और मैंने तुम्हारा पालन-पोषणकर तुम्हें बड़ा किया ॥ १० ॥ वह (बालक) बोला- हे माता! तब तुम मुझे तपस्याके निधिरूप उन मुनिका दर्शन कराओ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब वे पृथ्वीदेवी उसे लेकर भारद्वाजमुनिके पास गयीं ॥ ११ ॥ उन्हें प्रणामकर कहा कि [हे मुनिवर !] यह पुत्र आपके तेजसे उत्पन्न है। इसे मैंने पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। हे मुने! अब यह आपके समक्ष है, इसे स्वीकार करें। भारद्वाजमुनि उस पुत्रको प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आलिंगन किया। तदनन्तर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी देवी भी अपने सुन्दर धामको चली गयीं ॥ १२-१३ ॥ मुनिने प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका सिर सूँघा, उसे गोदमें बैठाया और शुभ मुहूर्त एवं शुभ लग्नमें उसका उपनयन-संस्कार किया। उन्होंने उसे वेद, शास्त्र और मंगलमय गणेशमन्त्रका उपदेश देकर कहा- [हे पुत्र !] तुम चिरकालतक गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये अनुष्ठान करो, वे सन्तुष्ट होकर तुम्हारी सभी मनोकामनाओंको
[दायाँ स्तम्भ] प्रदान करेंगे ॥ १४-१५१/२ ॥ तदनन्तर वह मुनिकुमार नर्मदा नदीके किनारे पद्मासन लगाकर बैठ गया। वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियोंपर नियन्त्रणकर भगवान् गणेशका अन्तःकरणमें ध्यान करते हुए उनके श्रेष्ठ मन्त्रका जप करने लगा। उस समय वह मात्र वायुका ही भक्षण कर रहा था, अतः अत्यन्त कृश हो गया था ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार उसने सहस्र वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया, तब माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको जब स्वच्छ चन्द्रमाका उदय हुआ तो उस समय गणेशजीने उसे अपने दसभुजाओंवाले स्वरूपका दर्शन कराया। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभायमान था, उनके हाथ अनेक प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित हो रहे थे। उनकी सूँड सुन्दर थी तथा [मुखमें] एक दाँत शोभायमान हो रहा था। शूर्पसदृश उनके [बड़े-बड़े] कान कुण्डलोंसे युक्त थे। उनका श्रीविग्रह करोड़ों सूर्योंकी आभावाला और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत था ॥ १८-२० ॥ अपने इष्टदेव भगवान् गणेशके सुन्दर स्वरूपको सामने विद्यमान देखकर वह बालक उठकर उनके चरणोंमें गिर पड़ा और उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगा ॥ २१ ॥ भौम (भूमिपुत्र) बोला- आप विघ्ननाशकको नमस्कार है, आप विघ्नकर्ताको नमस्कार है, देवताओं एवं असुरोंके स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियोंका उपबृंहण करनेवाले, निरामय, नित्य, निर्गुण, गुणोंका उच्छेद करनेवाले, ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [इस जगत्की रचना] पालन और संहार करनेवालेको नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है, हे त्रैलोक्यके पालक! आपको नमस्कार है। ब्रह्माके आदि कर्तारूप, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मरूप, ब्रह्मरूप, लक्ष्यालक्ष्य- स्वरूप, दुर्लक्षणोंके नाशकके लिये नमस्कार है। परमेश्वर श्रीगणेशजीको बारम्बार नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकारकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए परमात्मा गजानन गणेशजीने बालकको हर्षित करते हुए मधुर वाणीसे कहा- ॥ २६ ॥
१९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] गजानन (गणेशजी) बोले—तुम्हारी उग्र तपस्या, भक्ति और इस स्तुतिसे भी मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बाल्यावस्था होते हुए भी तुममें [बहुत] धैर्य है। मैं तुम्हें वांछित वर देता हूँ। [गणेशजीद्वारा] ऐसा कहे जानेपर भूमिपुत्र (मंगल)-ने गजाननसे यह वचन कहा— ॥ २७ ॥ भूमिपुत्र बोला—हे विभो! हे [इन्द्रादि] देवताओंके स्वामी ! आपके दर्शनसे मेरी दृष्टि धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना भी धन्य हो गया; मेरा ज्ञान, मेरा कुल और पर्वतोंसहित यह [मेरी माता] पृथ्वी भी धन्य हो गयी। मेरी यह सम्पूर्ण तपस्या भी धन्य हो गयी, जो मैंने आप अखिलेशका दर्शन प्राप्त किया। मेरी यह निवास-स्थली और यह वाणी भी धन्य हो गयी, जिसके द्वारा मैंने मूढ़भावसे आपकी स्तुति की। हे देवेश ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो स्वर्गमें मेरा निवास हो जाय। हे गजानन ! मैं देवताओंके साथ अमृत पीना चाहता हूँ ॥ २८-२९ ॥ त्रैलोक्यमें मेरा नाम कल्याणकारकके रूपमें विख्यात हो जाय। हे विभो ! चतुर्थी तिथिको मुझे आपका पुण्यप्रद दर्शन प्राप्त हुआ है, अतः वह पुण्यदात्री तिथि सदा सम्पूर्ण संकटोंका हरण करनेवाली हो तथा आपके कृपाप्रसादसे यह तिथि व्रत करनेवालोंकी समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाली हो जाय ॥ ३०-३१ ॥ गणेशजी बोले—हे पृथ्वीपुत्र ! तुम देवताओंके साथ सम्यक् रूपसे अमृतका पान करोगे और 'मंगल'— इस नामसे लोकमें तुम्हारी ख्याति होगी ॥ ३२ ॥ [अंगारके सदृश] रक्तवर्णका होनेके कारण तुम अंगारक नामसे प्रसिद्ध होओगे। [भौम, कुज, धरापुत्र आदि भी तुम्हारे नाम होंगे] क्योंकि तुम पृथिवीके पुत्र हो। जो मनुष्य अंगारक चतुर्थीका व्रत करेंगे, उन्हें वर्षभर संकष्टचतुर्थीव्रत करनेसे होनेवाले पुण्यके समतुल्य पुण्य प्राप्त होगा। उनके सम्पूर्ण कार्योंमें निर्विघ्नता होगी, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ हे शत्रुओंको सन्तप्त करनेवाले! क्योंकि तुमने व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ [संकष्टचतुर्थी] व्रतका अनुष्ठान किया है, अतः तुम [उसके प्रभावसे] अवन्ती नगरीके राजा
[दायाँ स्तम्भ] होओगे। तुम्हारे नामके संकीर्तनमात्रसे मनुष्य अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त करेगा ॥ ३५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] इस प्रकार वर देकर गजानन भगवान् गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर मंगलने भगवान् गणेशकी सम्पूर्ण सुन्दर अंगोंवाली, शुण्डसे युक्त मुख और दश भुजाओंवाली प्रतिमाकी भक्तिपूर्वक स्थापना की। उसने भगवान् गजाननको आनन्द देनेवाले [सुन्दर] मन्दिरका निर्माण कराया और उन देवाधिदेवका 'मंगलमूर्ति' नाम रखा ॥ ३७-३८ ॥ तबसे वह क्षेत्र सभी मनुष्योंके लिये कामनाओंको पूर्ण करनेवाला हो गया। वह अनुष्ठान, पूजन एवं दर्शन करनेसे भोग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ३९ ॥ तदनन्तर भगवान् विनायकने उस भूमिपुत्र मंगलको अपने पास लानेके लिये अपने गणोंके साथ एक सुन्दर और श्रेष्ठ विमान भेजा। हे राजन् ! वे गणेशजीके दूत उस भूमिपुत्र मंगलके पास जाकर आग्रहपूर्वक उसे उसी देहसे गणेशजीके निकट ले आये। यह एक अद्भुत- सी घटना घटित हुई ! ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् वह भूमिपुत्र स्थावर-जंगमात्मक इस जगत्- सहित तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया; उस भूमिपुत्रने मंगलवारसे युक्त संकष्टचतुर्थीका व्रत किया था, इसलिये उसे स्वर्गकी प्राप्ति हुई और उसने देवताओंके साथ अमृतपान किया। तभीसे मंगलवारसे युक्त चतुर्थी तिथि भी पृथ्वीपर अंगारकचतुर्थीके नामसे प्रसिद्ध हो गयी ॥ ४२-४३ ॥ मनमें चिन्तित वस्तु (मनोकामना)-को प्रदान करनेके कारण सबपर अनुग्रह करनेवाले मंगलमूर्ति गणेशजी 'चिन्तामणि'—इस नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ४४ ॥ पारिनेर नगरसे पश्चिममें स्थित सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाले गणेशजी चिन्तामणि [विनायक] नामसे प्रसिद्ध हुए। आज भी [कृष्णपक्षकी चतुर्थीको] चन्द्रमाके उदय होनेके समय सिद्धों और गन्धर्वोंद्वारा उनकी पूजा की जाती है। वे [चिन्तामणि विनायक] पुत्र-पौत्र, धन-सम्पत्ति आदि सभी मनोकामनाओंको पूर्ण करते हैं ॥ ४५-४६ ॥
[पाद-टिप्पणी / अध्याय समाप्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'अंगारकचतुर्थीव्रतोपाख्यान' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥
इकसठवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
इकसठवाँ अध्याय गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना तथा देवताओंकी प्रार्थनापर पुनः अनुग्रह करना, चन्द्रमाद्वारा वरद विनायककी स्थापना
ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! एक बार मैं गिरिशायी भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलासपर्वतपर गया हुआ था। वहाँ सभाके मध्यमें बैठे हुए मैंने नारदजीको आते हुए देखा। उन्होंने शंकरजीको एक अद्वितीय फल निवेदित किया, तब उस (फल)-के विषयमें गणेश और कुमार कार्तिकेय—दोनोंने शम्भुसे याचना की ॥ १-२ ॥ उस समय भगवान् शंकरने 'यह फल मुझे किसे देना चाहिये'—ऐसा मुझसे भी पूछा। तब मैंने उनसे कहा कि कुमार बालक हैं, अतः उन्हें यह फल दे दीजिये ॥ ३ ॥ तब शिवजीने उस फलको कुमारको दे दिया, [इसपर] गणेशजी क्रुद्ध हो गये। तदनन्तर जब मैंने अपने निवास ब्रह्मलोकमें जाकर सृष्टि करनेकी इच्छा की तो विघ्नकर्ता [उन] गणेशजीने एक अत्यन्त अद्भुत विघ्नकी सृष्टि कर दी, और वे उग्ररूप धारणकर मुझे भयभीत करने लगे ॥ ४-५ ॥ [उस रूपको देखकर] मेरे भ्रमित हो जानेपर चन्द्रमा गजानन गणेशजीके क्रूरतर रूपको देखकर अपने गणोंसहित हँस पड़े। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने चन्द्रमाको शाप दे दिया कि मेरे वचनानुसार [अब] तुम तीनों लोकोंमें अदर्शनीय हो जाओगे ॥ ६-७ ॥ कदाचित् यदि कोई तुम्हें देख लेगा तो वह महापातकी हो जायगा। इस प्रकार शाप देकर वे देवाधिदेव अपने गणोंके साथ अपने धामको चले गये। चन्द्रमा भी मलिन, दीन और चिन्ता-समुद्रमें लीन हो गये कि अणिमादि सिद्धियोंसे समन्वित, जगत्के कारणके भी कारण उन भगवान् गणेशके प्रति अज्ञानवश बालककी भाँति मैंने दुष्टता क्यों की; जिसके कारण मैं सभीके लिये अदर्शनीय, विवर्ण और मलिन हो गया हूँ!॥ ८-१०॥ अब मैं [पुनः] कैसे स्वरूपवान्, वन्दनीय और अपनी कलाओंसे देवताओंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला बनूँगा ? इसी बीचमें देवताओंने चन्द्रमाको प्राप्त महान् शापके विषयमें सुना। तब अग्नि, इन्द्र आदि [देवता] वहाँ गये, जहाँ गजानन गणेशजी थे। उन देवगणोंने सम्पूर्ण विघ्नोंका प्रवर्तन एवं हरण करनेवाले गणेशजीसे प्रार्थना की— ॥ ११-१२ ॥ देवताओंने कहा—हे देवाधिदेव ! आप सम्पूर्ण संसारके लिये वन्दनीय हैं। हे ईश! आप अपनी इच्छासे इस संसारका सृजन, पालन और संहार करते हैं। हे त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश)-के स्वामी! आप निर्गुण [स्वरूप] होते हुए भी गुणवानोंके गुणोंके कर्ता हैं। हे देव ! आज हम आपकी ही शरणमें आये हैं ॥ १३ ॥ हे ईश ! सम्पूर्ण जगत् आपके शापसे भयभीत है, आप हमारी रक्षा करें। चन्द्रमाके अपराधके कारण हम सबपर यह महान् कष्ट कैसे आ गया है? हे जगदीश ! हे भुवनेश ! अतः आप ऐसा विधान करें, जिससे हम सब, यह सम्पूर्ण संसार और चन्द्रमा भी शान्ति प्राप्त कर सकें ॥ १४ ॥ हे प्रभो ! चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेसे यह संसार कष्टमें पड़ गया है, इसलिये आप इन चन्द्रमापर अनुग्रह करके तीनों लोकोंपर कृपा करें ॥ १५ ॥ [हे प्रभो!] आपके जिस स्वरूप और महिमाको वेदत्रयी भी नहीं जान सकती, उसका स्तवन कोई कैसे कर सकता है, तथापि हम सभी आपकी स्तुति कर रहे हैं। आपका दर्शन करके और आपसे सम्भाषण करके हम सब कृतकृत्य हो गये। हे शरणागतोंके कष्टका हरण करनेवाले अविनाशी [प्रभु!] हम सब आपकी शरणमें आये हैं ॥ १६-१७ ॥ [तब] उनके इस प्रकारके वचन सुनकर और उनके द्वारा किये हुए स्तवनसे अत्यन्त प्रसन्न हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाले गजानन गणेशजी बोले— ॥ १८ ॥
१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विकट* (गणेशजी) बोले—हे देवताओ! मैं आप सबकी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ; आप लोग अपना मनोऽभिलषित वर माँगें। यदि वह तीनों लोकोंमें महान् असाध्य होगा, तो भी उसे आप लोगोंको प्रदान करूँगा॥ १९॥ देवताओंने कहा—[हे प्रभो!] हम सब लोग अमृतमयी किरणोंवाले चन्द्रमापर आपका अनुग्रह चाहते हैं, आपके द्वारा उसे अनुगृहीत किये जानेपर हम सबपर आपका अनुग्रह हो जायगा॥ २०॥ गणेशजी बोले—एक वर्ष या उसका आधा यानी छः मास या उस आधेका आधा तीन मासतक चन्द्रमा अदर्शनीय हो जाय। हे देवताओ! अब आप लोग कोई दूसरा वर भी माँगें॥ २१॥ तदनन्तर उन सबने गजानन गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया [शापनिवारणकी प्रार्थना की]। तब उन प्रणतजनोंसे गणेशजीने भावपूर्वक कहा—अहो! आश्चर्य है कि मैं अपने ही वचनको अप्रमाणित करनेके लिये कैसे उद्यत हो गया हूँ? शरणमें आये हुए प्रपन्नजनोंका त्याग करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं हो रही है, जबकि चाहे सुमेरुपर्वत चलायमान हो जाय (अपना स्थान छोड़ दे), सूर्य [आकाशसे पृथ्वीपर] गिर पड़े, अग्नि शीतल हो जाय, समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे, परंतु मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता, फिर भी हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरे द्वारा कही जा रही बातोंको सुनो। [मैं अपने शापको सीमित कर रहा हूँ, मात्र] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको ज्ञानमें अथवा अज्ञानमें भी जो अभिशप्त चन्द्रको देख लेगा, वह महान् दुःखका भाजन होगा। उनके इस प्रकारके वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये। उन सब देवताओंने [स्वीकारसूचक] 'ओम्' शब्दका उच्चारणकर उनके चरणोंमें प्रणिपात किया और उनपर पुष्पवृष्टि की तथा उनसे अनुज्ञा लेकर चन्द्रमाके पास चले गये॥ २२—२७॥ [वहाँ जाकर] उन सबने [चन्द्रमाको उलाहना देते हुए] उनसे कहा कि तुम बड़े मूर्ख हो, जो तुम गजानन गणेशजीपर हँसे। श्रेष्ठोंके प्रति अपराध करनेवाले तुमने तीनों लोकोंको संकटमें डाल दिया॥ २८॥ तुमने तीनों लोकोंके स्वामी, तीनों लोकोंके विधाता, अविनाशी, निर्गुण, नित्य, परम ब्रह्मस्वरूप, अखिलगुरु भगवान् गजानन गणेशजीके प्रति अपराध किया है, अतः सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले गणेशजीने तुम्हें दण्डित किया था॥ २९-३०॥ हम लोगोंके द्वारा अत्यन्त कष्टपूर्वक वे परमात्मा प्रसन्न किये गये। [तदनन्तर उन्होंने कहा—] भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको तुम कभी दर्शनीय नहीं होगे। [अतः हे चन्द्र!] तुम भी उन देवाधिदेव गजाननकी शरणमें जाओ। उनकी कृपासे तुम शुद्ध शरीरवाले होकर परम ख्यातिको प्राप्त करोगे॥ ३१-३२॥ देवताओंके इस प्रकारके हितकारी वचनको सुनकर चन्द्रमा शिव आदि देवताओंद्वारा वन्दित शरणागतवत्सल देवेश्वर भगवान् गजानन गणेशजीकी शरणमें गये और पापोंका नाश करनेवाले श्रेष्ठ एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे॥ ३३-३४॥ इन्द्रद्वारा उपदिष्ट [मन्त्रका जप करते हुए] चन्द्रमाने परम समाधिमें स्थित होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली गंगाजीके दक्षिणी किनारेपर बाईस वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया। तब [उनकी तपस्यासे] प्रसन्न होकर भगवान् गजानन उनके सम्मुख आये॥ ३५-३६॥ [वे भगवान् गणेश] लाल रंगके पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे। उनके शरीरमें लाल चन्दनका आलेप लगा हुआ था। चार भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले उनका श्रीविग्रह सिन्दूरसे लिप्त होनेके कारण अरुण वर्णका था॥ ३७॥ करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रभाववाले वे अपनी आभासे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे। उस तेजःपुंजको देखकर चन्द्रमा अत्यन्त [भयभीत होकर]
- मुद्गलपुराणके अनुसार कामासुरका पराभव करनेके लिये गणेशजीने 'विकट' नामका अवतार लिया था।
उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९५ कम्पायमान हो उठे ॥ ३८ ॥ तदनन्तर वे अत्यन्त धैर्य धारण करके उनके सम्मुख हाथ जोड़कर मनमें यह विचार करने लगे कि ये गजानन गणेशजी ही हैं, जो मुझे वर देनेके लिये यहाँ आये हैं—ऐसा मानकर उन्होंने उन्हें नमन किया और अपनी परमभक्तिसे उन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको प्रसन्न किया ॥ ३९-४० ॥ चन्द्रमा बोले—मैं उन भगवान् गजानन गणेशजीको प्रणाम करता हूँ, जो लोगोंके सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करते हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और कामकी उपलब्धि कराते हैं, उन विघ्नविनाशकको नमस्कार है ॥ ४१ ॥ हे कृपानिधान ! हे विश्वका विधान करनेमें दक्ष ! आप ब्रह्ममय, विश्वात्मा, विश्वके बीजरूप, जगन्मय, त्रैलोक्यका संहार करनेवाले हैं; हे देव ! आपको नमस्कार है। वेदत्रयीस्वरूप, अखिल बुद्धिदाता, बुद्धिप्रदीप, सुरेश्वर, नित्य, सत्य, नित्यबुद्ध, नित्य निष्काम आपको नित्य नमस्कार है ॥ ४२-४३ ॥ हे महात्मन् ! मैंने अज्ञानदोषके कारण जो अपराध किया है, दया करनेवाले आप उसे क्षमा करें। मुझपर दया कीजिये; क्योंकि शरणागतके त्यागसे आपको भी दोष होगा ॥ ४४ ॥ ब्रह्माजी बोले—चन्द्रमाके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन देवाधिदेवने चन्द्रमाके स्तवन और नमस्कारसे सन्तुष्ट होकर उन्हें अनेक वरदान दिये ॥ ४५ ॥ गजानन बोले—[हे चन्द्र !] तुम्हारा स्वरूप जैसे पहले था, वैसा ही हो जायगा; परंतु भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको जो मनुष्य तुम्हें देखेगा, उसे निश्चय ही अभिशाप और पाप लगेगा। उसे हानि और मूर्खताकी प्राप्ति होगी। जैसा कि मैंने देवताओंके साथ वार्तालापमें पहले ही कह दिया है, तुम उस [चतुर्थी तिथि]-को अदर्शनीय होओगे ॥ ४६-४७ ॥ [भाद्रपदमासके] कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको मनुष्योंद्वारा जो व्रत किया जायगा, उसमें तुम्हारे उदय होनेपर ही मेरी पूजा होगी और तुम भी प्रयत्नपूर्वक पूजे जाओगे। उस तिथिपर तुम प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय होओगे, इसके विपरीत होनेपर व्रत (संकष्टचतुर्थी) व्यर्थ हो जायगा। हे शशि! तुम मुझे प्रसन्न करनेवाले हो, अतः तुम अपनी एक कलासे मेरे ललाटपर स्थित रहो। तुम प्रतिमासकी [शुक्लपक्षकी] द्वितीया तिथिको सबके लिये प्रणम्य होओगे ॥ ४८-४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर इस प्रकार वर प्राप्त करके चन्द्रदेव पहलेकी ही भाँति [स्वरूपवान्] हो गये। उन्होंने देवताओं और ऋषियोंके साथ वरद विनायक नामक मूर्तिकी स्थापना की। देवताओं और मुनियोंने उस मूर्तिका 'भालचन्द्र' यह नाम रखा ॥ ५०-५१ ॥ चन्द्रमाने उस मूर्तिके लिये रत्नजटित स्वर्णमन्दिरका निर्माण कराया और आदरपूर्वक उसका षोडश उपचारोंसे पूजन किया ॥ ५२ ॥ सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंने भी उस मूर्तिका पूजन किया और यह वरदान दिया कि संसारमें यह स्थान सिद्धक्षेत्रके रूपमें विख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवालोंके लिये यह स्थान सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला होगा ॥ ५३१/२ ॥ तदनन्तर उन देवताओं और मुनियोंने गजानन गणेशजीको नमस्कार किया और प्रसन्न मनसे अपने- अपने स्थानको हर्षपूर्वक चले गये। उन देवताओं और मुनियोंके चले जानेपर देवाधिदेव गणेशजीने भी अपने शरीरको अन्तर्धान कर लिया ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर उन भालचन्द्र गणेशजीके अन्तर्धान हो जानेपर चन्द्रमा भी अपने तेजको प्राप्तकर प्रसन्न मनसे अपने धामको चले गये ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चन्द्रशापानुग्रहवर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥
बासठवाँ अध्याय
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१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बासठवाँ अध्याय भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] कृतवीर्यके पिताने पूछा—[हे ब्रह्मन्!] 'भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको चन्द्रमाके उदय होनेपर ही गणेशजीकी पूजा क्यों की जाती है'—यह मैंने आपसे पूछा था, जिसे आपने निरूपित किया। अब मैं उन गणेशजीको दूर्वांकुरके अर्पणका कारण सुनना चाहता हूँ, बताइये कि गणेशजीको दूर्वांकुर क्यों प्रिय हैं?॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजीको दूर्वांकुर- समर्पणका जो फल होता है, उसे कहता हूँ, सुनो॥ ३॥ दक्षिण देशमें जाम्ब नामकी एक नगरी थी, वहाँ सुलभ नामका क्षत्रिय रहता था, जो अत्यन्त गुणवान्, दानशील, धनवान्, बलशाली, विवेकसमपन्न, सम्मान्य जनोंका सम्मान करनेवाला, शान्त, इन्द्रियजित्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थको जाननेवाला और सभी वेदोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता था॥ ४-५॥ वह विकट नामवाले गणेशजीके प्रति नित्य भक्तिमान् और स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिमें रत रहता था। उसकी पत्नी सुमुद्रा नामसे अत्यन्त विख्यात थी॥ ६॥ वह अत्यन्त सुन्दरी और पतिव्रता थी। उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे अप्सराओंको भी पराभूत कर दिया था। वह देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियोंकी सेवामें रत रहनेवाली और पतिके मनोभावोंके अनुकूल आचरण करनेवाली थी॥ ७॥ हे नृप! वह सम्पूर्ण पतिव्रताओंमें सर्वमान्य और श्रेष्ठतम थी। एक दिन वे दोनों दम्पती स्नानसे निर्मल हो जब पुराणार्थकी विवेचनामें मन लगाये बैठे थे, तभी मधूसूदन नामक एक ब्राह्मण वहाँ आया॥ ८-९॥ निरन्तर परमेश्वरका चिन्तन करते रहनेवाला वह भिक्षाका अभिलाषी था। दारिद्र्यके कारण उसने मलिन वस्त्र धारण कर रखे थे। वस्त्र धारण किये होनेपर भी वह प्रायः दिगम्बर ही था॥ १०॥ सुलभने उसे देखकर प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार किया,
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] तत्पश्चात् उन [मलिन वस्त्रधारी] श्रेष्ठ द्विजको देखकर वह सहसा अज्ञानवश हँस पड़ा॥ ११॥ [यह देखकर] उन मुनिके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे, ऐसा लगता था, मानो वे तीनों लोकोंको जला डालेंगे। उन्होंने अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसे शाप देते हुए कहा—'हे दुर्बुद्धि! तुम दाँत निकालकर मुझपर हँस रहे थे, अतः प्रतिदिन हलमें जोते-जानेवाले बैल हो जाओ और नित्य दुखी रहो'॥ १२-१३॥ पतिके प्रति दिये गये शापको सुनकर सुमुद्रा क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी। पदाघातसे घायल सर्पिणीकी भाँति क्रुद्ध होकर उसने उस ब्राह्मणको शाप दिया—हे दुष्ट ब्राह्मण! तुमने जो अविवेकपूर्ण ढंगसे मेरे पतिको शाप दिया है, अतः तुम भी विष्ठाको भोजनरूपमें ग्रहण करनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले गधे बनोगे॥ १४-१५॥ इस प्रकार दिये गये क्रूर शापको सुनकर उस ब्राह्मणने भी उसे शाप दिया कि स्त्री होनेपर भी तुमने मुझे शाप दिया, अतः तुम चाण्डाली होओगी; साथ ही तुम दरिद्र, अनेक दोषोंसे युक्त, मल-मूत्रका भोजन करनेवाली और अशुभ कार्य करनेवाली होगी। इस प्रकार परस्पर शाप देकर उन्होंने अपने अतिदुर्लभ शरीरोंका त्याग कर दिया॥ १६-१७॥ [तदनन्तर] सुलभ वृषभके रूपमें उत्पन्न हुआ और हल खींचनेका दुःख भोगता रहा। ब्राह्मणके शापके कारण उसे एक क्षणके लिये भी विश्राम नहीं मिलता था। वह ब्राह्मण मधूसूदन भी गर्दभयोनिमें उत्पन्न हुआ और सुमुद्रा प्राणियोंकी हिंसा करनेवाली दुष्ट चाण्डाली हुई॥ १८-१९॥ [वह] पिशाचवृत्तिवाली, दरिद्र, विष्ठा और मूत्रका भक्षण करनेवाली, अत्यन्त शुष्क शरीरवाली, बाहर निकले दाँतोंसे युक्त विकराल मुखवाली थी। किसी समय भ्रमण करते हुए उसने नगरके दक्षिण भागमें स्थित गणेशजीके परम अद्भुत मन्दिरको देखा॥ २०-२१॥
उ०ख०-अ०६२ ] * भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन * १९७
वह अनेक प्रकारके वृक्षों और लताजालोंसे आच्छादित | श्रवणकर निद्रामें लीन लोग भी जग गये। सावधान तथा अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे युक्त था। वहाँपर कुछ | होकर उन्होंने दण्ड, मुष्टिका और कुहनीका प्रहारकर योगीश्वर सदा अनुष्ठानमें रत रहते थे॥ २२॥ | उन्हें बाहर भगा दिया॥ ३३-३४॥ वहाँ गणेशजीकी उपासना करनेवाले लोग [शास्त्रोक्त] | भागनेके लिये तत्पर उस चाण्डालीपर भी लोगोंने नियमोंका पालन करते हुए निवास कर रहे थे। [उनमेंसे] | कंकड़-पत्थरोंसे प्रहार किया। चाण्डाली और गधेद्वारा कुछ मनोरथपूर्तिकी इच्छावाले और कुछ पुत्र, कुछ मोक्ष | [गणेशप्रतिमाके] स्पर्शकी शंकासे आकुल लोगोंने और कुछ धनप्राप्तिकी इच्छावाले थे। किसी समय | अभिमन्त्रित तीर्थजलसे गजानन गणेशजीको स्नान कराया भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको उस नगरके प्रत्येक घरमें | तथा अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका अनेक बार पूजन गणेश-महोत्सवका आयोजन हो रहा था॥ २३-२४॥ | किया॥ ३५-३६॥ उसी समय महाप्रलयकी-सी सूचना देनेवाली | उस अत्यन्त दुष्टा चाण्डाली और गर्दभ एवं अतिवृष्टि प्रारम्भ हो गयी, वह चाण्डाली भी उस वृष्टिसे | वृषभको लोगोंने पुनः लाठी, कुहनी और थप्पड़ोंसे भयभीत होकर जिस-जिस घरमें जाती, वहीं-से लोगोंद्वारा | पीटा। मन्दिरका द्वार बन्द होनेसे वे भागकर बाहर भी मार-पीटकर भगा दी जाती, तब वह हाथमें अग्नि लेकर | नहीं जा सकते थे। दौड़ते और दारुण स्वरमें क्रन्दन करते मन्दिरके अन्दर चली गयी॥ २५-२६॥ | उन तीनोंके स्वरसे देवाधिदेव गणेशजीका मन उनकी तब वहाँ भी कुछ लोग उसे मारने-पीटने लगे, परंतु | ओर आकृष्ट हो गया॥ ३७-३८ १/२॥ योगियोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। तब वह | [गणेशजी सोचा कि अहो!] इन्हीं (चाण्डाली, चाण्डाली [दूबके] तिनकोंको अग्निमें जलाकर उससे | वृषभ और गर्दभ)-के कारण मेरी पुनः पूजा हुई है। अपने शरीरको सेंकने लगी॥ २७॥ | इन्होंने दूर्वांकुरोंद्वारा मेरी एक बार पूजा भी कर दी। अकस्मात् वायुके वेगसे उड़ा हुआ एक दूर्वांकुर | यद्यपि ये तीनों दुष्ट हैं, फिर भी इन्होंने मेरी बहुत-सी दैवयोगसे गणनायक गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़ा॥ २८॥ | प्रदक्षिणा भी कर ली। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी उसी समय वह गर्दभ भी शीतसे भयातुर होकर | तिथिको जो मुझे एक भी दूर्वा समर्पित करता है और उस देवालयमें चला आया। तत्पश्चात् वह वृषभ भी | मेरी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे लिये मान्य और पूज्य हलसे मुक्त होकर दैवयोगसे वहीं गणेशजीके मन्दिरमें | होता है॥ ३९-४१॥ भावीवश चला आया और उन दोनोंने उस चाण्डालीके | इसलिये मैं इन सबको विमानसे अपने धामको भेज तृणोंका भक्षण कर लिया॥ २९-३०॥ | देता हूँ, ऐसा सोचकर उन्होंने एक विमान भेजा, जो वहाँ लोगोंके सो जानेपर गजानन गणेशजीके | उनके गणोंसे युक्त था। वे गण गणेशजीके जैसे समीप ही उन दोनों (वृषभ और रासभ)-में सींग और | स्वरूपवाले थे और गन्धर्वों एवं अप्सराओंके समूहसे पाद-प्रहारसे युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ३१॥ | घिरे हुए थे। वह विमान विविध वाद्ययन्त्रों एवं उस समय उन दोनोंके मुखसे निकलकर दूर्वाके | परागसमन्वित पुष्पोंसे युक्त था॥ ४२-४३॥ अंकुर गणेशजीकी सूँड़ तथा उनके पैरपर गिर गये, | वह विमान दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण और ध्वज- जिससे गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ३२॥ | पताकाओंसे शोभायमान था। गणेशजीके स्वरूपवाले वे तदनन्तर वह चाण्डाली लाठी लेकर गणेशजीकी | गण दिव्य देहसम्पन्न और प्रसन्न मनवाले उन (तीनों)- प्रतिमाके समीप आयी और उसने गर्दभ एवं वृषभको | को उस विमानमें बैठाकर गजानन गणेशजीकी आज्ञासे खूब पीटा तथा पूजामें अर्पित नैवेद्यको स्वयं खा गयी। | उनके धामको शीघ्रतापूर्वक ले गये॥ ४४-४५॥ उन दोनों [गर्दभ और वृषभ]-के खुरोंके शब्दोंको | यह घटना सब लोगोंके देखते-देखते घटित हुई,
१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इससे सभीके हृदयमें आश्चर्यका भाव भर गया। वे लोग | प्राप्त हुई-यह हमसे बतलाइये ॥ ४८ ॥ कहने लगे कि इन (तीनों)-को [न जाने किस] | हम सब भी अपने अनुष्ठानका त्याग करके शीघ्र पूर्वपुण्यसे इस प्रकारकी गति प्राप्त हुई ॥ ४६ ॥ | ही उसका आचरण करेंगे; क्योंकि असंख्य कालावधि तब कुछ योगीश्वर ध्यानका त्यागकर गणोंके पास | बीत जानेपर भी हमें उन देवाधिदेवका दर्शन नहीं गये और उनसे पूछा कि इन तीनोंकी ऐसी पुण्यमयी ध्रुव | हुआ ॥ ४९ ॥ सद्गति कैसे हुई-यह बतलाइये ॥ ४७ ॥ | केवल वायुका भक्षणकर अनुष्ठानमें लगे रहनेवाले हे निष्पाप गणो! इन अत्यन्त पापियोंका लेशमात्र | हम विरक्तजनोंको गणेशजीके धामकी प्राप्ति कब भी पुण्य नहीं था, फिर यह अत्यन्त दुर्लभ गति इन्हें कैसे | होगी ?-यह हमें बतलाइये ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वोपाख्यान' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥
तिरसठवाँ अध्याय गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन
गणेशजीके गण बोले-हे योगिजनो! आप | मुनि बोले-[हे देवेन्द्र !] उत्तम दूर्वा-माहात्म्य सभी अपने चंचल मनको स्थिरकर श्रवण करें। | जैसा मुझे ज्ञात है, वह मैं कहता हूँ। पूर्वकालमें स्थावर [गणेशजीकी] जिस महिमाका कथन करनेमें [सहस्रमुख] | नामक नगरमें कौण्डिन्य नामवाले एक महामुनि हुए थे। वे शेष तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, उसका | गणेशजीके उपासक और तपोबलसे सम्पन्न थे। नगरके वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है, फिर भी हम | दक्षिण भागमें उन मुनिका अत्यन्त रमणीय महान् आश्रम शक्तिके अनुसार उसका वर्णन करते हैं ॥ १ १/२ ॥ | था, जो लताओं और वृक्षोंसे समन्वित था ॥ ८-१० ॥ ब्रह्मा और शिव आदि जिनका सर्वदा स्तवन करते | उसमें अत्यन्त विशाल सरोवर थे, जो पुष्पित हैं, उन गणनांथ गणेशजीकी महिमाका स्पष्ट वर्णन कौन | कमलोंसे युक्त थे, उनपर भ्रमर बैठे रहते थे तथा [उन कर सकता है ? तथापि हे निष्पाप [योगिजन !] उनकी | सरोवरोंमें] हंस, बत्तख, चकवा, बगुला, कच्छप और इस प्रकारकी लीलाका श्रवण करो ॥ २-३॥ | जलमुर्गे क्रीडा करते थे। वहाँ उन कौण्डिन्यमुनिने उत्कट दूर्वांकुरोंकी महिमा मुनियों और देवताओंको भी | तप करना प्रारम्भ किया ॥ ११-१२ ॥ ज्ञात नहीं है। [देवाधिदेव गणेशजीको दूर्वादिसे अर्चनका | वे अपने सम्मुख गणेशजीकी चतुर्भुज स्वरूपवाली, जो पुण्य प्राप्त होता है;] वह यज्ञ, दान, तप, व्रत और | अत्यन्त प्रसन्न मुखमुद्रावाली, सुन्दर, वरद मुद्रावाली, हवनसे भी नहीं प्राप्त होता। इस विषयमें यहाँ एक | दूर्वासे युक्त और सुपूजित महामूर्तिकी स्थापनाकर भगवान् प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें इन्द्र | गणेशजीको प्रसन्नता प्रदान करनेवाले षडक्षर परम और महात्मा नारदके संवादका वर्णन है ॥ ४-५ ॥ | मन्त्रका जप करने लगे। तब उनकी आश्रया नामवाली एक बार नारदजी इन्द्रको देखनेकी इच्छासे | पत्नीने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा- ॥ १३-१४॥ [स्वर्गलोकमें] आये। वहाँ [उनके द्वारा] परम भक्तिसे | आश्रया बोली-हे स्वामिन् ! आप भगवान् पूजित होकर आसन ग्रहण कर लेनेपर बलसूदन इन्द्रने | गजाननको दूर्वाका भार क्यों चढ़ाते हो ? क्योंकि घासके आदरपूर्वक मुनिसे दूर्वाका माहात्म्य पूछा ॥ ६ १/२ ॥ | तिनकोंसे तो कोई प्रसन्न होता नहीं। यदि इससे कोई इन्द्र बोले-हे ब्रह्मन् ! हे मुने ! यह बतलाइये कि | पुण्य होता हो तो आप कृपया मुझसे कहिये ॥ १५ १/२ ॥ देवाधिदेव महात्मा गणेशजीको दूर्वांकुर विशेष रूपसे | कौण्डिन्य बोले-हे प्रिये ! सुनो, मैं दूर्वाके उत्तम क्यों प्रिय हैं ? ॥ ७ १/२ ॥ | माहात्म्यको कहता हूँ ॥ १६ ॥