श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] जीवित रह सकेगा या मरनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त करेगा-इस प्रकार कहकर नारदजी [वहाँसे] चल दिये, तभी उन्होंने पृथ्वीलोकमें [भृशुण्डीमुनिके गणेशजीसे सारूप्य-सम्बन्धी] अद्भुत घटना देखी ॥ १९-२२॥ [उधर] भृशुण्डीके माता-पिता, उनके दोनों पुत्र और पुत्रीसहित पत्नी-ये सभी अग्निकी ज्वालाओंसे परिपूर्ण कुम्भीपाक नामक भयंकर नरकमें नीचेकी ओर मुख करके लटक रहे थे। यमदूतोंके द्वारा पीटे जानेपर वे अनेक प्रकारसे चीख-पुकार करते हुए क्रन्दन कर रहे थे। उनके क्रन्दनको सुनकर दयानिधान नारदजीने आकर भृशुण्डीसे उनके दुःखको कहा ॥ २३-२४१/२॥ नारदजीने कहा-हे महामुने! गणेशजीके सारूप्यको प्राप्त हुए जिन आपका दर्शन करनेके लिये इन्द्र आदि देवगण तथा कपिल आदि मुनिगण आते हैं, उन आपके माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री और सेवक आपके दोषसे यमलोकस्थ कुम्भीपाक नरकमें क्यों पकाये जा रहे हैं? आप स्वयं भी ज्ञानसम्पन्न हैं, फिर इस बातको क्यों नहीं जानते? आप अपने पूर्वजोंके उद्धारका प्रयत्न कीजिये ॥ २५-२७१/२॥ इन्द्र बोले- [हे राजा शूरसेन!] मुनिके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर भृशुण्डी अत्यन्त दुखित हो गये। अपने पितरोंके दुःखसे दुखी होकर वे प्रज्वलित अग्निकी भाँति सन्तप्त हो उठे। तब उन्होंने उनके उद्धारका उपाय सोचा ॥ २८-२९॥ तदनन्तर परोक्ष तत्त्वके ज्ञाता भृशुण्डीने ध्यानद्वारा
[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] [अपने पितरोंकी स्थिति] देखकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए हाथमें पवित्र जल लेकर संकष्टचतुर्थीव्रत- जनित पुण्यफल अपने पितरोंको प्रदान किया। तदनन्तर पितरोंके उद्देश्यसे भगवान् गणेशसे प्रार्थना करते हुए कहा- ॥ ३०-३१॥ भृशुण्डी बोले-हे गणपति गणेशजी ! यदि मैंने भक्तिपूर्वक आपका व्रत किया हो, तो उसके प्रभावसे आप शीघ्र ही मेरे पूर्वजोंका उद्धार कीजिये ॥ ३२॥ ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको गजानन गणेशजीके हाथमें डाल दिया। तब उस जलके डालते ही गणेशजीकी कृपासे उनके सभी पितर देवताओंके-से स्वरूपवाले होकर विमानोंमें आरूढ़ हो भगवान् गणेशजीके धामको चले गये। उस समय अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं, चारण उनकी स्तुति कर रहे थे और गन्धर्व उनका यशोगान कर रहे थे ॥ ३३-३४१/२॥ कुम्भीपाक नरकमें जो दूसरे भी पापी मनुष्य थे, वे भी विमानोंमें आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे इस व्रतकी महिमाका वर्णन कर दिया ॥ ३५-३६ ॥ जबकि उस व्रतका मात्र एक दिनका पुण्य प्रदान करनेसे वे सब सद्गतिको प्राप्त हो गये तो जिसने जन्मभर आदरपूर्वक संकष्टचतुर्थीका व्रत किया है, उसके पुण्यकी गणना करनेमें शेषजी भी सक्षम नहीं हैं। इसलिये उस व्यक्तिद्वारा दिये गये पुण्यके प्रभावसे मेरा विमान गतिमान् हो जायगा ॥ ३७-३८ ॥
[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रत-माहात्म्य-कथन' नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥
उनसठवाँ अध्याय कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा
[बायाँ स्तम्भ - नीचे] राजा बोले-[हे देवेन्द्र !] भृशुण्डीमुनिके उन पितरोंके कुम्भीपाक नरकसे निकलकर दिव्य लोक (गणेशजीके धाम)-में चले जानेपर कृतवीर्यके पिताने [अपनी वंश-परम्पराको बचाये रखनेके लिये] कौन- सा उपाय किया? ॥ १ ॥ इन्द्र बोले- [हे राजन् !] अपने वंश-विच्छेदकी
[दायाँ स्तम्भ - नीचे] सम्भावना सुनकर दुखी हुए कृतवीर्यके पिता शीघ्र ही ब्रह्मलोकको गये और वहाँ कमलपर आसीन ब्रह्माजीका दर्शन किया ॥ २ ॥ उन्होंने उन्हें प्रणाम करके उनसे अपने वंशके विच्छेदका कारण पूछते हुए कहा-'हे विधाता! मेरा पुत्र अत्यन्त धर्मात्मा, दानी, यज्ञकर्ता, देवताओं और