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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 656 में से

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पृष्ठ 191

उ०ख०-अ०५९] * कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा * १८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अतिथियोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला तथा मान्यजनोंका अतिशय सम्मान करनेवाला है। उसने पुत्र-प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके प्रयत्न भी किये हैं॥ ३-४॥ हे सुरेश्वर! फिर भी उसके पुत्र क्यों नहीं हुआ? अपना राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर [इस समय] वह मात्र वायुका आहार करते हुए वनमें स्थित है॥ ५॥ उसके शरीरमें मात्र हड्डियाँ ही रह गयी हैं और वह आज या कल ही मर सकता है। हे प्रभो! जिससे उसके जन्मान्तरीय पापका नाश हो जाय—उस उपायको आप मुझसे दयाकर कहिये। हे कमलासन! अपने वंशकी वृद्धिके लिये मैं उस उपायको अपने पुत्रको प्राप्त करा दूँगा। तब उनकी इस प्रकारकी मधुर वाणीको सुनकर ब्रह्माजीने भी वैसी ही मधुर वाणीमें कहा कि मेरे द्वारा कथित अपने पुत्रके पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सुनो॥ ६-८॥ [कृतवीर्य जिस नगरका राजा है,] उसी नगरमें पूर्वकालमें साम नामका एक अन्त्यज रहता था। वह इतना अधिक पापी था कि उसको देख लेनेमात्रसे पुण्योंका नाश हो जाता था। एक बार उस [पापी]-ने लोभवश रास्तेमें [जाते हुए] सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रति तटस्थ भाव रखनेवाले बारह ब्राह्मणोंको मार डाला और उन्हें एक गुफाके अन्दर फेंक दिया॥ ९-१०॥ हे राजन्! तदनन्तर उनका सब कुछ लेकर वह माघ कृष्ण चतुर्थीकी रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर अपने घर आ गया। [वहाँ आकर] उसने 'गणेश! गणेश!' कहकर शीघ्रतापूर्वक अपने पुत्रको बुलाया। उस दिन पूरे दिन उसे अन्न-जल नहीं प्राप्त हुआ था, अतः उसने उसीके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया। हे राजन्! बहुत-सा समय बीत जानेके बाद कृष्णपक्षकी चतुर्थीको ही रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेके बाद उसकी मृत्यु हो गयी॥ ११-१३॥ अज्ञानपूर्वक किये गये संकष्टचतुर्थीव्रतजनित पुण्यके प्रभावसे वह श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर भगवान् गणेशके सुखदायी धाममें चला गया। उस समय अप्सराओंके समूह उसपर पंखा डुला रहे थे तथा विमानस्थित [चारण और गन्धर्व आदि] दिव्य पुष्पोंसे अर्चनाकर उसकी स्तुति कर रहे थे॥ १४-१५॥

[दायाँ स्तम्भ] उसी पुण्यके शेष रह जानेके कारण वह पृथ्वीपर तुम्हारे पुत्र राजा कृतवीर्यके नामसे उत्पन्न हुआ, जो [पूर्वजन्मकृत ब्रह्महत्याके पापके कारण] अभीतक पुत्रहीनताको प्राप्त है। हे अनघ! उस महापापका क्षय हो जानेपर ही उसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है॥ १६ १/२॥ हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके इस प्रकारके वचन सुनकर वे काँपने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः पापनाशका उपाय पूछा— ॥ १७ १/२॥ कृतवीर्यके पिता बोले—हे विधाता! उसके द्वारा किया गया ब्रह्महत्याजनित पाप कैसे नष्ट होगा? हे करुणासिन्धु! यद्यपि वह उपाय अत्यन्त दुष्कर होगा, फिर भी उसे बताइये॥ १८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—यदि तुम्हारा पुत्र संकष्टचतुर्थी नामक व्रतको सम्यक् रूपसे करेगा, तो वह पापसे मुक्त हो जायगा॥ १९ १/२॥ राजा (कृतवीर्यके पिता) बोले—हे ब्रह्मन्! उस व्रतको कैसे और किस शुभ मासमें किया जाता है? हे स्वामिन्! वह सब मुझसे कहिये, जिससे वह पाप नष्ट हो सके॥ २० १/२॥ ब्रह्माजी बोले—माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी यदि मंगलवारको पड़े तो चन्द्रमाके अनुकूल होनेपर शुभ मुहूर्तमें इस व्रतका प्रारम्भ करे। पहले दातून करे, फिर इक्कीस बार [किसी पवित्र नदी या सरोवरमें डुबकी लगाकर] स्नान करे॥ २१-२२॥ तत्पश्चात् नित्य कर्मोंका सम्पादनकर [गणेशजीके] श्रेष्ठ मन्त्रका जप करे। निराहार और मौन रहते हुए परनिन्दासे दूर रहे। नियमोंका पालन करे, दुष्कर्म न करे। ताम्बूल-सेवन, जलपान, परद्रोह तथा चुगली न करे। दिनके अन्तमें अर्थात् सायंकाल तिल और आँवलेके चूर्णको शरीरमें लगाकर स्नान करे [गणेशजीके] एकाक्षर, षडक्षर अथवा वैदिक मन्त्रका जप करे॥ २३-२५॥ गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये उनके नाम-मन्त्रका यथाविधि जप करे तथा स्थिरचित्त होकर देवाधिदेव गजानन गणेशजीका ध्यान करे। तदनन्तर एक मुहूर्तके पश्चात् गणपति गणेशजीका षोडश उपचारों और अनेक