श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके नैवेद्योंसे भी पूजन करे ॥ २६-२७ ॥ [नैवेद्यके रूपमें] पूड़ी, मोदक, पुआ, लड्डू, बड़ा, खीर, विविध प्रकारके अन्नोंसे बने हुए अनेक प्रकारके लेह्य और चोष्य व्यंजनोंसे भोग लगाये ॥ २८ ॥ [तत्पश्चात्] अनेक प्रकारके फलों, ताम्बूल, पूगीफल (सुपारी), दक्षिणा, इक्कीस दूर्वाओं, दीपकों और पुष्पोंसे उनका अर्चन करे ॥ २९ ॥ चन्द्रमाके उदय होनेके समय पहले मन्त्रपूर्वक चतुर्थी तिथिको अर्घ्य दे, फिर गजानन गणेशजीको तत्पश्चात् चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान करे ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् [किये गये] पूजनको गणेशजीको निवेदितकर उन्हें प्रणाम और क्षमायाचना करके भक्तिपूर्वक इक्कीस ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन कराये। आर्थिक रूपसे अशक्त होनेकी स्थितिमें दस या बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणाएँ देकर भली-भाँति सन्तुष्ट करे। तदनन्तर सम्यक् रूपसे गणेशजीकी कथाका श्रवणकर स्वयं मौन होकर भोजन करे ॥ ३१-३२ ॥ तत्पश्चात् शेष रात्रिको गायन-वादन एवं जयघोष कर [जागरण करते हुए] व्यतीत करे। हे राजन् ! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक एक वर्षतक यह व्रत करनेपर [तुम्हारे पुत्रके] सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेसे उसे उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होगी। इस व्रतके करनेवाले मनुष्यकी अन्य भी जो-जो कामनाएँ होंगी, वे पूर्ण होंगी। इसके करनेसे सम्पूर्ण संकटोंका नाश होता है और शत्रुओंकी सेनासे कोई भय नहीं रहता ॥ ३३-३४ १/२ ॥ शमीवृक्षके मूल भागमें बैठकर उपवास करते हुए चन्द्रमाके उदय होनेतक गणेशजीके मन्त्रका जप करते हुए इस व्रतको भलीभाँति करे। इस व्रतको करनेसे अन्धा, गूँगा, मूर्ख, लँगड़ा भी अपने अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। इस व्रतको करनेवाला स्त्री, पुत्र, धन और राज्यको प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है। व्रतीको श्रावण आदि पृथक्-पृथक् मासोंमें घृत, लड्डू आदि पृथक्-पृथक् भोज्य पदार्थोंका भोजन करना चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेवालेको अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७ १/२ ॥ [व्रतीको व्रतके दिन] श्रावणमासमें सात लड्डू, भाद्रपदमासमें दहीका भोजन करना चाहिये। आश्विनमासमें उपवास और कार्तिकमासमें दुग्धपान करना चाहिये। मार्गशीर्षमासमें उसे निराहार रहना चाहिये और पौषमासमें गोमूत्रका पान करना चाहिये। माघमासमें उसे तिलोंका भक्षण करना चाहिये तथा फाल्गुनमासमें शर्करायुक्त घृत खाना चाहिये। चैत्रमासमें उसे पंचगव्यका पान करना चाहिये और वैशाखमासमें शतपत्रिकाका भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमासमें उसे घृतका भोजन तथा आषाढ़मासमें मधुका भक्षण करना चाहिये ॥ ३८-४० १/२ ॥ कृतवीर्यके पिता बोले- हे ब्रह्मन्! अंगारक चतुर्थीका विशेष विधान क्यों कहा गया है? आपके प्रति आदरका भाव रखनेवाले मुझ विनम्र शरणागतसे यह सब कृपापूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी कथाको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकटचतुर्थीव्रतकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ साठवाँ अध्याय भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा, उसकी उग्र तपस्यासे गणेशजीका प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रतकी महिमा ब्रह्माजी बोले- हे राजन् ! मैं अंगारक चतुर्थीकी महिमाको संक्षेपमें कहता हूँ, तुम इसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ १ ॥ हे राजन्! अवन्तीनगरमें भारद्वाज नामके एक महान् मुनि थे। वे वेद-वेदांगके विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान्, सर्वशास्त्रविशारद, अग्निहोत्रपरायण और नित्य शिष्योंके अध्यापनमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ १/२ ॥ एक समय वे मुनि नदीके किनारे बैठकर अनुष्ठानमें रत थे, तभी उन्होंने एक सुन्दर अप्सराको देखा। उसे देखकर उन्होंने उसके साथ रमण करनेका मन बनाया ॥ ३-४ ॥