श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६० ] * भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा * १९१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] अकस्मात् उस कामिनीको देखकर मुनि कामासक्त हो गये। कामदेवके बाणोंसे अभिभूत होकर वे भूतलपर गिर पड़े। उनका शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया, जिसके कारण उनका तेज स्खलित हो गया। उनका वह तेज एक बिलके मार्गसे पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर उससे एक कुमारका जन्म हुआ, जिसकी कान्ति जपाकुसुमके समान [अरुणवर्णकी] थी। पृथ्वीने स्नेहवश उसका आदरपूर्वक पालन किया ॥ ७ ॥ ऐसा करते हुए पृथ्वीने अपने जन्म, माता-पिता और कुलको धन्य माना। तदनन्तर वह (बालक) जब सात वर्षका हो गया, तब उसने अपनी मातासे पूछा कि मनुष्यदेहधारी होनेपर भी मेरे शरीरका वर्ण रक्तिम क्यों है? हे माता! सम्प्रति यह बतलाओ कि मेरे पिता कौन हैं ? ॥ ८-९ ॥ पृथ्वी बोली- हे पुत्र! भरद्वाजमुनिका शुभ तेज स्खलित होकर मुझमें प्रविष्ट हो गया, उसीसे तुम्हारा जन्म हुआ और मैंने तुम्हारा पालन-पोषणकर तुम्हें बड़ा किया ॥ १० ॥ वह (बालक) बोला- हे माता! तब तुम मुझे तपस्याके निधिरूप उन मुनिका दर्शन कराओ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब वे पृथ्वीदेवी उसे लेकर भारद्वाजमुनिके पास गयीं ॥ ११ ॥ उन्हें प्रणामकर कहा कि [हे मुनिवर !] यह पुत्र आपके तेजसे उत्पन्न है। इसे मैंने पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। हे मुने! अब यह आपके समक्ष है, इसे स्वीकार करें। भारद्वाजमुनि उस पुत्रको प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आलिंगन किया। तदनन्तर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी देवी भी अपने सुन्दर धामको चली गयीं ॥ १२-१३ ॥ मुनिने प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका सिर सूँघा, उसे गोदमें बैठाया और शुभ मुहूर्त एवं शुभ लग्नमें उसका उपनयन-संस्कार किया। उन्होंने उसे वेद, शास्त्र और मंगलमय गणेशमन्त्रका उपदेश देकर कहा- [हे पुत्र !] तुम चिरकालतक गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये अनुष्ठान करो, वे सन्तुष्ट होकर तुम्हारी सभी मनोकामनाओंको
[दायाँ स्तम्भ] प्रदान करेंगे ॥ १४-१५१/२ ॥ तदनन्तर वह मुनिकुमार नर्मदा नदीके किनारे पद्मासन लगाकर बैठ गया। वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियोंपर नियन्त्रणकर भगवान् गणेशका अन्तःकरणमें ध्यान करते हुए उनके श्रेष्ठ मन्त्रका जप करने लगा। उस समय वह मात्र वायुका ही भक्षण कर रहा था, अतः अत्यन्त कृश हो गया था ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार उसने सहस्र वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया, तब माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको जब स्वच्छ चन्द्रमाका उदय हुआ तो उस समय गणेशजीने उसे अपने दसभुजाओंवाले स्वरूपका दर्शन कराया। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभायमान था, उनके हाथ अनेक प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित हो रहे थे। उनकी सूँड सुन्दर थी तथा [मुखमें] एक दाँत शोभायमान हो रहा था। शूर्पसदृश उनके [बड़े-बड़े] कान कुण्डलोंसे युक्त थे। उनका श्रीविग्रह करोड़ों सूर्योंकी आभावाला और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत था ॥ १८-२० ॥ अपने इष्टदेव भगवान् गणेशके सुन्दर स्वरूपको सामने विद्यमान देखकर वह बालक उठकर उनके चरणोंमें गिर पड़ा और उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगा ॥ २१ ॥ भौम (भूमिपुत्र) बोला- आप विघ्ननाशकको नमस्कार है, आप विघ्नकर्ताको नमस्कार है, देवताओं एवं असुरोंके स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियोंका उपबृंहण करनेवाले, निरामय, नित्य, निर्गुण, गुणोंका उच्छेद करनेवाले, ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [इस जगत्की रचना] पालन और संहार करनेवालेको नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है, हे त्रैलोक्यके पालक! आपको नमस्कार है। ब्रह्माके आदि कर्तारूप, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मरूप, ब्रह्मरूप, लक्ष्यालक्ष्य- स्वरूप, दुर्लक्षणोंके नाशकके लिये नमस्कार है। परमेश्वर श्रीगणेशजीको बारम्बार नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकारकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए परमात्मा गजानन गणेशजीने बालकको हर्षित करते हुए मधुर वाणीसे कहा- ॥ २६ ॥