श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] गजानन (गणेशजी) बोले—तुम्हारी उग्र तपस्या, भक्ति और इस स्तुतिसे भी मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बाल्यावस्था होते हुए भी तुममें [बहुत] धैर्य है। मैं तुम्हें वांछित वर देता हूँ। [गणेशजीद्वारा] ऐसा कहे जानेपर भूमिपुत्र (मंगल)-ने गजाननसे यह वचन कहा— ॥ २७ ॥ भूमिपुत्र बोला—हे विभो! हे [इन्द्रादि] देवताओंके स्वामी ! आपके दर्शनसे मेरी दृष्टि धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना भी धन्य हो गया; मेरा ज्ञान, मेरा कुल और पर्वतोंसहित यह [मेरी माता] पृथ्वी भी धन्य हो गयी। मेरी यह सम्पूर्ण तपस्या भी धन्य हो गयी, जो मैंने आप अखिलेशका दर्शन प्राप्त किया। मेरी यह निवास-स्थली और यह वाणी भी धन्य हो गयी, जिसके द्वारा मैंने मूढ़भावसे आपकी स्तुति की। हे देवेश ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो स्वर्गमें मेरा निवास हो जाय। हे गजानन ! मैं देवताओंके साथ अमृत पीना चाहता हूँ ॥ २८-२९ ॥ त्रैलोक्यमें मेरा नाम कल्याणकारकके रूपमें विख्यात हो जाय। हे विभो ! चतुर्थी तिथिको मुझे आपका पुण्यप्रद दर्शन प्राप्त हुआ है, अतः वह पुण्यदात्री तिथि सदा सम्पूर्ण संकटोंका हरण करनेवाली हो तथा आपके कृपाप्रसादसे यह तिथि व्रत करनेवालोंकी समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाली हो जाय ॥ ३०-३१ ॥ गणेशजी बोले—हे पृथ्वीपुत्र ! तुम देवताओंके साथ सम्यक् रूपसे अमृतका पान करोगे और 'मंगल'— इस नामसे लोकमें तुम्हारी ख्याति होगी ॥ ३२ ॥ [अंगारके सदृश] रक्तवर्णका होनेके कारण तुम अंगारक नामसे प्रसिद्ध होओगे। [भौम, कुज, धरापुत्र आदि भी तुम्हारे नाम होंगे] क्योंकि तुम पृथिवीके पुत्र हो। जो मनुष्य अंगारक चतुर्थीका व्रत करेंगे, उन्हें वर्षभर संकष्टचतुर्थीव्रत करनेसे होनेवाले पुण्यके समतुल्य पुण्य प्राप्त होगा। उनके सम्पूर्ण कार्योंमें निर्विघ्नता होगी, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ हे शत्रुओंको सन्तप्त करनेवाले! क्योंकि तुमने व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ [संकष्टचतुर्थी] व्रतका अनुष्ठान किया है, अतः तुम [उसके प्रभावसे] अवन्ती नगरीके राजा
[दायाँ स्तम्भ] होओगे। तुम्हारे नामके संकीर्तनमात्रसे मनुष्य अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त करेगा ॥ ३५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] इस प्रकार वर देकर गजानन भगवान् गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर मंगलने भगवान् गणेशकी सम्पूर्ण सुन्दर अंगोंवाली, शुण्डसे युक्त मुख और दश भुजाओंवाली प्रतिमाकी भक्तिपूर्वक स्थापना की। उसने भगवान् गजाननको आनन्द देनेवाले [सुन्दर] मन्दिरका निर्माण कराया और उन देवाधिदेवका 'मंगलमूर्ति' नाम रखा ॥ ३७-३८ ॥ तबसे वह क्षेत्र सभी मनुष्योंके लिये कामनाओंको पूर्ण करनेवाला हो गया। वह अनुष्ठान, पूजन एवं दर्शन करनेसे भोग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ३९ ॥ तदनन्तर भगवान् विनायकने उस भूमिपुत्र मंगलको अपने पास लानेके लिये अपने गणोंके साथ एक सुन्दर और श्रेष्ठ विमान भेजा। हे राजन् ! वे गणेशजीके दूत उस भूमिपुत्र मंगलके पास जाकर आग्रहपूर्वक उसे उसी देहसे गणेशजीके निकट ले आये। यह एक अद्भुत- सी घटना घटित हुई ! ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् वह भूमिपुत्र स्थावर-जंगमात्मक इस जगत्- सहित तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया; उस भूमिपुत्रने मंगलवारसे युक्त संकष्टचतुर्थीका व्रत किया था, इसलिये उसे स्वर्गकी प्राप्ति हुई और उसने देवताओंके साथ अमृतपान किया। तभीसे मंगलवारसे युक्त चतुर्थी तिथि भी पृथ्वीपर अंगारकचतुर्थीके नामसे प्रसिद्ध हो गयी ॥ ४२-४३ ॥ मनमें चिन्तित वस्तु (मनोकामना)-को प्रदान करनेके कारण सबपर अनुग्रह करनेवाले मंगलमूर्ति गणेशजी 'चिन्तामणि'—इस नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ४४ ॥ पारिनेर नगरसे पश्चिममें स्थित सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाले गणेशजी चिन्तामणि [विनायक] नामसे प्रसिद्ध हुए। आज भी [कृष्णपक्षकी चतुर्थीको] चन्द्रमाके उदय होनेके समय सिद्धों और गन्धर्वोंद्वारा उनकी पूजा की जाती है। वे [चिन्तामणि विनायक] पुत्र-पौत्र, धन-सम्पत्ति आदि सभी मनोकामनाओंको पूर्ण करते हैं ॥ ४५-४६ ॥
[पाद-टिप्पणी / अध्याय समाप्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'अंगारकचतुर्थीव्रतोपाख्यान' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥