श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विकट* (गणेशजी) बोले—हे देवताओ! मैं आप सबकी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ; आप लोग अपना मनोऽभिलषित वर माँगें। यदि वह तीनों लोकोंमें महान् असाध्य होगा, तो भी उसे आप लोगोंको प्रदान करूँगा॥ १९॥ देवताओंने कहा—[हे प्रभो!] हम सब लोग अमृतमयी किरणोंवाले चन्द्रमापर आपका अनुग्रह चाहते हैं, आपके द्वारा उसे अनुगृहीत किये जानेपर हम सबपर आपका अनुग्रह हो जायगा॥ २०॥ गणेशजी बोले—एक वर्ष या उसका आधा यानी छः मास या उस आधेका आधा तीन मासतक चन्द्रमा अदर्शनीय हो जाय। हे देवताओ! अब आप लोग कोई दूसरा वर भी माँगें॥ २१॥ तदनन्तर उन सबने गजानन गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया [शापनिवारणकी प्रार्थना की]। तब उन प्रणतजनोंसे गणेशजीने भावपूर्वक कहा—अहो! आश्चर्य है कि मैं अपने ही वचनको अप्रमाणित करनेके लिये कैसे उद्यत हो गया हूँ? शरणमें आये हुए प्रपन्नजनोंका त्याग करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं हो रही है, जबकि चाहे सुमेरुपर्वत चलायमान हो जाय (अपना स्थान छोड़ दे), सूर्य [आकाशसे पृथ्वीपर] गिर पड़े, अग्नि शीतल हो जाय, समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे, परंतु मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता, फिर भी हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरे द्वारा कही जा रही बातोंको सुनो। [मैं अपने शापको सीमित कर रहा हूँ, मात्र] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको ज्ञानमें अथवा अज्ञानमें भी जो अभिशप्त चन्द्रको देख लेगा, वह महान् दुःखका भाजन होगा। उनके इस प्रकारके वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये। उन सब देवताओंने [स्वीकारसूचक] 'ओम्' शब्दका उच्चारणकर उनके चरणोंमें प्रणिपात किया और उनपर पुष्पवृष्टि की तथा उनसे अनुज्ञा लेकर चन्द्रमाके पास चले गये॥ २२—२७॥ [वहाँ जाकर] उन सबने [चन्द्रमाको उलाहना देते हुए] उनसे कहा कि तुम बड़े मूर्ख हो, जो तुम गजानन गणेशजीपर हँसे। श्रेष्ठोंके प्रति अपराध करनेवाले तुमने तीनों लोकोंको संकटमें डाल दिया॥ २८॥ तुमने तीनों लोकोंके स्वामी, तीनों लोकोंके विधाता, अविनाशी, निर्गुण, नित्य, परम ब्रह्मस्वरूप, अखिलगुरु भगवान् गजानन गणेशजीके प्रति अपराध किया है, अतः सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले गणेशजीने तुम्हें दण्डित किया था॥ २९-३०॥ हम लोगोंके द्वारा अत्यन्त कष्टपूर्वक वे परमात्मा प्रसन्न किये गये। [तदनन्तर उन्होंने कहा—] भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको तुम कभी दर्शनीय नहीं होगे। [अतः हे चन्द्र!] तुम भी उन देवाधिदेव गजाननकी शरणमें जाओ। उनकी कृपासे तुम शुद्ध शरीरवाले होकर परम ख्यातिको प्राप्त करोगे॥ ३१-३२॥ देवताओंके इस प्रकारके हितकारी वचनको सुनकर चन्द्रमा शिव आदि देवताओंद्वारा वन्दित शरणागतवत्सल देवेश्वर भगवान् गजानन गणेशजीकी शरणमें गये और पापोंका नाश करनेवाले श्रेष्ठ एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे॥ ३३-३४॥ इन्द्रद्वारा उपदिष्ट [मन्त्रका जप करते हुए] चन्द्रमाने परम समाधिमें स्थित होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली गंगाजीके दक्षिणी किनारेपर बाईस वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया। तब [उनकी तपस्यासे] प्रसन्न होकर भगवान् गजानन उनके सम्मुख आये॥ ३५-३६॥ [वे भगवान् गणेश] लाल रंगके पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे। उनके शरीरमें लाल चन्दनका आलेप लगा हुआ था। चार भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले उनका श्रीविग्रह सिन्दूरसे लिप्त होनेके कारण अरुण वर्णका था॥ ३७॥ करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रभाववाले वे अपनी आभासे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे। उस तेजःपुंजको देखकर चन्द्रमा अत्यन्त [भयभीत होकर]
- मुद्गलपुराणके अनुसार कामासुरका पराभव करनेके लिये गणेशजीने 'विकट' नामका अवतार लिया था।