भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९५ कम्पायमान हो उठे ॥ ३८ ॥ तदनन्तर वे अत्यन्त धैर्य धारण करके उनके सम्मुख हाथ जोड़कर मनमें यह विचार करने लगे कि ये गजानन गणेशजी ही हैं, जो मुझे वर देनेके लिये यहाँ आये हैं—ऐसा मानकर उन्होंने उन्हें नमन किया और अपनी परमभक्तिसे उन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको प्रसन्न किया ॥ ३९-४० ॥ चन्द्रमा बोले—मैं उन भगवान् गजानन गणेशजीको प्रणाम करता हूँ, जो लोगोंके सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करते हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और कामकी उपलब्धि कराते हैं, उन विघ्नविनाशकको नमस्कार है ॥ ४१ ॥ हे कृपानिधान ! हे विश्वका विधान करनेमें दक्ष ! आप ब्रह्ममय, विश्वात्मा, विश्वके बीजरूप, जगन्मय, त्रैलोक्यका संहार करनेवाले हैं; हे देव ! आपको नमस्कार है। वेदत्रयीस्वरूप, अखिल बुद्धिदाता, बुद्धिप्रदीप, सुरेश्वर, नित्य, सत्य, नित्यबुद्ध, नित्य निष्काम आपको नित्य नमस्कार है ॥ ४२-४३ ॥ हे महात्मन् ! मैंने अज्ञानदोषके कारण जो अपराध किया है, दया करनेवाले आप उसे क्षमा करें। मुझपर दया कीजिये; क्योंकि शरणागतके त्यागसे आपको भी दोष होगा ॥ ४४ ॥ ब्रह्माजी बोले—चन्द्रमाके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन देवाधिदेवने चन्द्रमाके स्तवन और नमस्कारसे सन्तुष्ट होकर उन्हें अनेक वरदान दिये ॥ ४५ ॥ गजानन बोले—[हे चन्द्र !] तुम्हारा स्वरूप जैसे पहले था, वैसा ही हो जायगा; परंतु भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको जो मनुष्य तुम्हें देखेगा, उसे निश्चय ही अभिशाप और पाप लगेगा। उसे हानि और मूर्खताकी प्राप्ति होगी। जैसा कि मैंने देवताओंके साथ वार्तालापमें पहले ही कह दिया है, तुम उस [चतुर्थी तिथि]-को अदर्शनीय होओगे ॥ ४६-४७ ॥ [भाद्रपदमासके] कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको मनुष्योंद्वारा जो व्रत किया जायगा, उसमें तुम्हारे उदय होनेपर ही मेरी पूजा होगी और तुम भी प्रयत्नपूर्वक पूजे जाओगे। उस तिथिपर तुम प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय होओगे, इसके विपरीत होनेपर व्रत (संकष्टचतुर्थी) व्यर्थ हो जायगा। हे शशि! तुम मुझे प्रसन्न करनेवाले हो, अतः तुम अपनी एक कलासे मेरे ललाटपर स्थित रहो। तुम प्रतिमासकी [शुक्लपक्षकी] द्वितीया तिथिको सबके लिये प्रणम्य होओगे ॥ ४८-४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर इस प्रकार वर प्राप्त करके चन्द्रदेव पहलेकी ही भाँति [स्वरूपवान्] हो गये। उन्होंने देवताओं और ऋषियोंके साथ वरद विनायक नामक मूर्तिकी स्थापना की। देवताओं और मुनियोंने उस मूर्तिका 'भालचन्द्र' यह नाम रखा ॥ ५०-५१ ॥ चन्द्रमाने उस मूर्तिके लिये रत्नजटित स्वर्णमन्दिरका निर्माण कराया और आदरपूर्वक उसका षोडश उपचारोंसे पूजन किया ॥ ५२ ॥ सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंने भी उस मूर्तिका पूजन किया और यह वरदान दिया कि संसारमें यह स्थान सिद्धक्षेत्रके रूपमें विख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवालोंके लिये यह स्थान सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला होगा ॥ ५३१/२ ॥ तदनन्तर उन देवताओं और मुनियोंने गजानन गणेशजीको नमस्कार किया और प्रसन्न मनसे अपने- अपने स्थानको हर्षपूर्वक चले गये। उन देवताओं और मुनियोंके चले जानेपर देवाधिदेव गणेशजीने भी अपने शरीरको अन्तर्धान कर लिया ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर उन भालचन्द्र गणेशजीके अन्तर्धान हो जानेपर चन्द्रमा भी अपने तेजको प्राप्तकर प्रसन्न मनसे अपने धामको चले गये ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चन्द्रशापानुग्रहवर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥