भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 656 में से

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पृष्ठ 198

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१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बासठवाँ अध्याय भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] कृतवीर्यके पिताने पूछा—[हे ब्रह्मन्!] 'भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको चन्द्रमाके उदय होनेपर ही गणेशजीकी पूजा क्यों की जाती है'—यह मैंने आपसे पूछा था, जिसे आपने निरूपित किया। अब मैं उन गणेशजीको दूर्वांकुरके अर्पणका कारण सुनना चाहता हूँ, बताइये कि गणेशजीको दूर्वांकुर क्यों प्रिय हैं?॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजीको दूर्वांकुर- समर्पणका जो फल होता है, उसे कहता हूँ, सुनो॥ ३॥ दक्षिण देशमें जाम्ब नामकी एक नगरी थी, वहाँ सुलभ नामका क्षत्रिय रहता था, जो अत्यन्त गुणवान्, दानशील, धनवान्, बलशाली, विवेकसमपन्न, सम्मान्य जनोंका सम्मान करनेवाला, शान्त, इन्द्रियजित्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थको जाननेवाला और सभी वेदोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता था॥ ४-५॥ वह विकट नामवाले गणेशजीके प्रति नित्य भक्तिमान् और स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिमें रत रहता था। उसकी पत्नी सुमुद्रा नामसे अत्यन्त विख्यात थी॥ ६॥ वह अत्यन्त सुन्दरी और पतिव्रता थी। उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे अप्सराओंको भी पराभूत कर दिया था। वह देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियोंकी सेवामें रत रहनेवाली और पतिके मनोभावोंके अनुकूल आचरण करनेवाली थी॥ ७॥ हे नृप! वह सम्पूर्ण पतिव्रताओंमें सर्वमान्य और श्रेष्ठतम थी। एक दिन वे दोनों दम्पती स्नानसे निर्मल हो जब पुराणार्थकी विवेचनामें मन लगाये बैठे थे, तभी मधूसूदन नामक एक ब्राह्मण वहाँ आया॥ ८-९॥ निरन्तर परमेश्वरका चिन्तन करते रहनेवाला वह भिक्षाका अभिलाषी था। दारिद्र्यके कारण उसने मलिन वस्त्र धारण कर रखे थे। वस्त्र धारण किये होनेपर भी वह प्रायः दिगम्बर ही था॥ १०॥ सुलभने उसे देखकर प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार किया,

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] तत्पश्चात् उन [मलिन वस्त्रधारी] श्रेष्ठ द्विजको देखकर वह सहसा अज्ञानवश हँस पड़ा॥ ११॥ [यह देखकर] उन मुनिके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे, ऐसा लगता था, मानो वे तीनों लोकोंको जला डालेंगे। उन्होंने अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसे शाप देते हुए कहा—'हे दुर्बुद्धि! तुम दाँत निकालकर मुझपर हँस रहे थे, अतः प्रतिदिन हलमें जोते-जानेवाले बैल हो जाओ और नित्य दुखी रहो'॥ १२-१३॥ पतिके प्रति दिये गये शापको सुनकर सुमुद्रा क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी। पदाघातसे घायल सर्पिणीकी भाँति क्रुद्ध होकर उसने उस ब्राह्मणको शाप दिया—हे दुष्ट ब्राह्मण! तुमने जो अविवेकपूर्ण ढंगसे मेरे पतिको शाप दिया है, अतः तुम भी विष्ठाको भोजनरूपमें ग्रहण करनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले गधे बनोगे॥ १४-१५॥ इस प्रकार दिये गये क्रूर शापको सुनकर उस ब्राह्मणने भी उसे शाप दिया कि स्त्री होनेपर भी तुमने मुझे शाप दिया, अतः तुम चाण्डाली होओगी; साथ ही तुम दरिद्र, अनेक दोषोंसे युक्त, मल-मूत्रका भोजन करनेवाली और अशुभ कार्य करनेवाली होगी। इस प्रकार परस्पर शाप देकर उन्होंने अपने अतिदुर्लभ शरीरोंका त्याग कर दिया॥ १६-१७॥ [तदनन्तर] सुलभ वृषभके रूपमें उत्पन्न हुआ और हल खींचनेका दुःख भोगता रहा। ब्राह्मणके शापके कारण उसे एक क्षणके लिये भी विश्राम नहीं मिलता था। वह ब्राह्मण मधूसूदन भी गर्दभयोनिमें उत्पन्न हुआ और सुमुद्रा प्राणियोंकी हिंसा करनेवाली दुष्ट चाण्डाली हुई॥ १८-१९॥ [वह] पिशाचवृत्तिवाली, दरिद्र, विष्ठा और मूत्रका भक्षण करनेवाली, अत्यन्त शुष्क शरीरवाली, बाहर निकले दाँतोंसे युक्त विकराल मुखवाली थी। किसी समय भ्रमण करते हुए उसने नगरके दक्षिण भागमें स्थित गणेशजीके परम अद्भुत मन्दिरको देखा॥ २०-२१॥