भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 656 में से

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पृष्ठ 199

उ०ख०-अ०६२ ] * भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन * १९७

वह अनेक प्रकारके वृक्षों और लताजालोंसे आच्छादित | श्रवणकर निद्रामें लीन लोग भी जग गये। सावधान तथा अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे युक्त था। वहाँपर कुछ | होकर उन्होंने दण्ड, मुष्टिका और कुहनीका प्रहारकर योगीश्वर सदा अनुष्ठानमें रत रहते थे॥ २२॥ | उन्हें बाहर भगा दिया॥ ३३-३४॥ वहाँ गणेशजीकी उपासना करनेवाले लोग [शास्त्रोक्त] | भागनेके लिये तत्पर उस चाण्डालीपर भी लोगोंने नियमोंका पालन करते हुए निवास कर रहे थे। [उनमेंसे] | कंकड़-पत्थरोंसे प्रहार किया। चाण्डाली और गधेद्वारा कुछ मनोरथपूर्तिकी इच्छावाले और कुछ पुत्र, कुछ मोक्ष | [गणेशप्रतिमाके] स्पर्शकी शंकासे आकुल लोगोंने और कुछ धनप्राप्तिकी इच्छावाले थे। किसी समय | अभिमन्त्रित तीर्थजलसे गजानन गणेशजीको स्नान कराया भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको उस नगरके प्रत्येक घरमें | तथा अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका अनेक बार पूजन गणेश-महोत्सवका आयोजन हो रहा था॥ २३-२४॥ | किया॥ ३५-३६॥ उसी समय महाप्रलयकी-सी सूचना देनेवाली | उस अत्यन्त दुष्टा चाण्डाली और गर्दभ एवं अतिवृष्टि प्रारम्भ हो गयी, वह चाण्डाली भी उस वृष्टिसे | वृषभको लोगोंने पुनः लाठी, कुहनी और थप्पड़ोंसे भयभीत होकर जिस-जिस घरमें जाती, वहीं-से लोगोंद्वारा | पीटा। मन्दिरका द्वार बन्द होनेसे वे भागकर बाहर भी मार-पीटकर भगा दी जाती, तब वह हाथमें अग्नि लेकर | नहीं जा सकते थे। दौड़ते और दारुण स्वरमें क्रन्दन करते मन्दिरके अन्दर चली गयी॥ २५-२६॥ | उन तीनोंके स्वरसे देवाधिदेव गणेशजीका मन उनकी तब वहाँ भी कुछ लोग उसे मारने-पीटने लगे, परंतु | ओर आकृष्ट हो गया॥ ३७-३८ १/२॥ योगियोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। तब वह | [गणेशजी सोचा कि अहो!] इन्हीं (चाण्डाली, चाण्डाली [दूबके] तिनकोंको अग्निमें जलाकर उससे | वृषभ और गर्दभ)-के कारण मेरी पुनः पूजा हुई है। अपने शरीरको सेंकने लगी॥ २७॥ | इन्होंने दूर्वांकुरोंद्वारा मेरी एक बार पूजा भी कर दी। अकस्मात् वायुके वेगसे उड़ा हुआ एक दूर्वांकुर | यद्यपि ये तीनों दुष्ट हैं, फिर भी इन्होंने मेरी बहुत-सी दैवयोगसे गणनायक गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़ा॥ २८॥ | प्रदक्षिणा भी कर ली। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी उसी समय वह गर्दभ भी शीतसे भयातुर होकर | तिथिको जो मुझे एक भी दूर्वा समर्पित करता है और उस देवालयमें चला आया। तत्पश्चात् वह वृषभ भी | मेरी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे लिये मान्य और पूज्य हलसे मुक्त होकर दैवयोगसे वहीं गणेशजीके मन्दिरमें | होता है॥ ३९-४१॥ भावीवश चला आया और उन दोनोंने उस चाण्डालीके | इसलिये मैं इन सबको विमानसे अपने धामको भेज तृणोंका भक्षण कर लिया॥ २९-३०॥ | देता हूँ, ऐसा सोचकर उन्होंने एक विमान भेजा, जो वहाँ लोगोंके सो जानेपर गजानन गणेशजीके | उनके गणोंसे युक्त था। वे गण गणेशजीके जैसे समीप ही उन दोनों (वृषभ और रासभ)-में सींग और | स्वरूपवाले थे और गन्धर्वों एवं अप्सराओंके समूहसे पाद-प्रहारसे युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ३१॥ | घिरे हुए थे। वह विमान विविध वाद्ययन्त्रों एवं उस समय उन दोनोंके मुखसे निकलकर दूर्वाके | परागसमन्वित पुष्पोंसे युक्त था॥ ४२-४३॥ अंकुर गणेशजीकी सूँड़ तथा उनके पैरपर गिर गये, | वह विमान दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण और ध्वज- जिससे गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ३२॥ | पताकाओंसे शोभायमान था। गणेशजीके स्वरूपवाले वे तदनन्तर वह चाण्डाली लाठी लेकर गणेशजीकी | गण दिव्य देहसम्पन्न और प्रसन्न मनवाले उन (तीनों)- प्रतिमाके समीप आयी और उसने गर्दभ एवं वृषभको | को उस विमानमें बैठाकर गजानन गणेशजीकी आज्ञासे खूब पीटा तथा पूजामें अर्पित नैवेद्यको स्वयं खा गयी। | उनके धामको शीघ्रतापूर्वक ले गये॥ ४४-४५॥ उन दोनों [गर्दभ और वृषभ]-के खुरोंके शब्दोंको | यह घटना सब लोगोंके देखते-देखते घटित हुई,

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