श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इससे सभीके हृदयमें आश्चर्यका भाव भर गया। वे लोग | प्राप्त हुई-यह हमसे बतलाइये ॥ ४८ ॥ कहने लगे कि इन (तीनों)-को [न जाने किस] | हम सब भी अपने अनुष्ठानका त्याग करके शीघ्र पूर्वपुण्यसे इस प्रकारकी गति प्राप्त हुई ॥ ४६ ॥ | ही उसका आचरण करेंगे; क्योंकि असंख्य कालावधि तब कुछ योगीश्वर ध्यानका त्यागकर गणोंके पास | बीत जानेपर भी हमें उन देवाधिदेवका दर्शन नहीं गये और उनसे पूछा कि इन तीनोंकी ऐसी पुण्यमयी ध्रुव | हुआ ॥ ४९ ॥ सद्गति कैसे हुई-यह बतलाइये ॥ ४७ ॥ | केवल वायुका भक्षणकर अनुष्ठानमें लगे रहनेवाले हे निष्पाप गणो! इन अत्यन्त पापियोंका लेशमात्र | हम विरक्तजनोंको गणेशजीके धामकी प्राप्ति कब भी पुण्य नहीं था, फिर यह अत्यन्त दुर्लभ गति इन्हें कैसे | होगी ?-यह हमें बतलाइये ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वोपाख्यान' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥
तिरसठवाँ अध्याय गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन
गणेशजीके गण बोले-हे योगिजनो! आप | मुनि बोले-[हे देवेन्द्र !] उत्तम दूर्वा-माहात्म्य सभी अपने चंचल मनको स्थिरकर श्रवण करें। | जैसा मुझे ज्ञात है, वह मैं कहता हूँ। पूर्वकालमें स्थावर [गणेशजीकी] जिस महिमाका कथन करनेमें [सहस्रमुख] | नामक नगरमें कौण्डिन्य नामवाले एक महामुनि हुए थे। वे शेष तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, उसका | गणेशजीके उपासक और तपोबलसे सम्पन्न थे। नगरके वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है, फिर भी हम | दक्षिण भागमें उन मुनिका अत्यन्त रमणीय महान् आश्रम शक्तिके अनुसार उसका वर्णन करते हैं ॥ १ १/२ ॥ | था, जो लताओं और वृक्षोंसे समन्वित था ॥ ८-१० ॥ ब्रह्मा और शिव आदि जिनका सर्वदा स्तवन करते | उसमें अत्यन्त विशाल सरोवर थे, जो पुष्पित हैं, उन गणनांथ गणेशजीकी महिमाका स्पष्ट वर्णन कौन | कमलोंसे युक्त थे, उनपर भ्रमर बैठे रहते थे तथा [उन कर सकता है ? तथापि हे निष्पाप [योगिजन !] उनकी | सरोवरोंमें] हंस, बत्तख, चकवा, बगुला, कच्छप और इस प्रकारकी लीलाका श्रवण करो ॥ २-३॥ | जलमुर्गे क्रीडा करते थे। वहाँ उन कौण्डिन्यमुनिने उत्कट दूर्वांकुरोंकी महिमा मुनियों और देवताओंको भी | तप करना प्रारम्भ किया ॥ ११-१२ ॥ ज्ञात नहीं है। [देवाधिदेव गणेशजीको दूर्वादिसे अर्चनका | वे अपने सम्मुख गणेशजीकी चतुर्भुज स्वरूपवाली, जो पुण्य प्राप्त होता है;] वह यज्ञ, दान, तप, व्रत और | अत्यन्त प्रसन्न मुखमुद्रावाली, सुन्दर, वरद मुद्रावाली, हवनसे भी नहीं प्राप्त होता। इस विषयमें यहाँ एक | दूर्वासे युक्त और सुपूजित महामूर्तिकी स्थापनाकर भगवान् प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें इन्द्र | गणेशजीको प्रसन्नता प्रदान करनेवाले षडक्षर परम और महात्मा नारदके संवादका वर्णन है ॥ ४-५ ॥ | मन्त्रका जप करने लगे। तब उनकी आश्रया नामवाली एक बार नारदजी इन्द्रको देखनेकी इच्छासे | पत्नीने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा- ॥ १३-१४॥ [स्वर्गलोकमें] आये। वहाँ [उनके द्वारा] परम भक्तिसे | आश्रया बोली-हे स्वामिन् ! आप भगवान् पूजित होकर आसन ग्रहण कर लेनेपर बलसूदन इन्द्रने | गजाननको दूर्वाका भार क्यों चढ़ाते हो ? क्योंकि घासके आदरपूर्वक मुनिसे दूर्वाका माहात्म्य पूछा ॥ ६ १/२ ॥ | तिनकोंसे तो कोई प्रसन्न होता नहीं। यदि इससे कोई इन्द्र बोले-हे ब्रह्मन् ! हे मुने ! यह बतलाइये कि | पुण्य होता हो तो आप कृपया मुझसे कहिये ॥ १५ १/२ ॥ देवाधिदेव महात्मा गणेशजीको दूर्वांकुर विशेष रूपसे | कौण्डिन्य बोले-हे प्रिये ! सुनो, मैं दूर्वाके उत्तम क्यों प्रिय हैं ? ॥ ७ १/२ ॥ | माहात्म्यको कहता हूँ ॥ १६ ॥