भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 656 में से

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पृष्ठ 201

उ०ख०-अ०६३ ] * गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन * १९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पूर्वकालकी बात है, धर्मराजके नगरमें एक उत्तम उत्सव हो रहा था। उसमें सभी देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, यक्ष और राक्षस आमन्त्रित किये गये थे। वहाँ नृत्य करती हुई तिलोत्तमाका उत्तरीय भूमिपर गिर पड़ा, [जिससे] यमने उसके सुन्दर और विशाल स्तनयुगलको देख लिया। [इससे] वे काम- सन्तप्त, बेचैन और लज्जाहीन-से हो गये॥ १७-१९॥ उन्होंने उसके आलिंगन आदिकी इच्छा की। तदनन्तर [बोध होनेपर] वे धर्मराज लज्जासे मुख नीचे करके सभासे बाहर निकल गये। जाते समय उनका तेज स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा; उससे एक विकृत मुखवाला पुरुष उत्पन्न हुआ, जो ज्वालामालाओंसे युक्त था। वह अपने क्रूर दंष्ट्रारव (दाँत पीसनेकी आवाज)- से तीनों लोकोंको भयभीत कर रहा था, सम्पूर्ण पृथ्वीको जलाये डाल रहा था तथा अपनी जटाओंसे आकाशका स्पर्श कर रहा था॥ २०-२२॥ उसके [भयंकर] नादसे तीनों लोकोंके प्राणियोंके मन अत्यन्त कम्पित हो उठे, तब सभी सभासद् [भगवान्] विष्णुके पास गये। उन सबने अपनी-अपनी मतिके अनुसार अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनका स्तवन किया और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे उनकी प्रार्थना की॥ २३-२४॥ [तब] वे भगवान् विष्णु उन सबके साथ अनामय गणेशजीके पास गये। उस (यमपुत्र)-की मृत्यु उन्हींके हाथसे जानकर उन सबने उन्हें प्रसन्न किया॥ २५॥ देवता और मुनि बोले-आप विघ्नस्वरूपके लिये नमस्कार है, आप विघ्नहारीके लिये नमस्कार है, आप सर्वरूपके लिये नमस्कार है; हे सर्वसाक्षी! आपको नमस्कार है। महान् देवताके लिये नमस्कार है, जगत्के आदि कारण आपके लिये नमस्कार है; हे कृपानिधान! आप जगत्का पालन करनेवाले हैं, आपके लिये नमस्कार है॥ २६-२७॥ पूर्ण तमोगुणारूप आपको नमस्कार है, आप सर्वसंहारकारीको नमस्कार है, हे भक्तवरद! आपको नमस्कार है, सर्वदाताके लिये बारम्बार नमस्कार है॥ २८॥

[दायाँ स्तम्भ] हे अनन्यशरण! हे समस्त कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले! आपको नमस्कार है। वेदके ज्ञाता आपको नमस्कार है, वेदके कर्ता आपको नमस्कार है॥ २९॥ [आपको छोड़कर] हम किस दूसरेकी शरणमें जायें? कौन दूसरा हमारे भयको दूर कर सकता है? [आपकी] प्रजा [हम सब]-पर अकालमें ही प्रलय कैसे आ गयी ? हा देवेश्वर गजानन ! हा विघ्नहर ! हा अव्यय ! हम सब मृत्युको प्राप्त होने जा रहे हैं, आप हमारी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?॥ ३०-३१॥ उनका इस प्रकारका वचन सुनकर शत्रुभयका नाश करनेवाले करुणासागर भगवान् गजानन उन सबके सम्मुख शिशुरूपमें प्रकट हो गये॥ ३२॥ उनके नेत्र कमलके समान थे तथा उनके मुखकी आभा सैकड़ों चन्द्रमाओंकी आभाके समान थी। उनके श्रीविग्रहकी आभा करोड़ों सूर्योंके आभासमूहके समतुल्य थी तथा उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यको पराभूत करनेवाला था॥ ३३॥ उनके दाँत कुन्दकी कलीकी और अधर बिम्बाफलकी शोभाको जीतनेवाले थे। उनकी नासिका उन्नत, भृकुटी और नेत्र सुन्दर तथा कण्ठ शंखके समान था॥ ३४॥ उनका वक्षःस्थल विशाल था, दोनों भुजाएँ घुटनोंतक विस्तृत थीं, उदरप्रदेश गम्भीर नाभिसे सुशोभित था, उनका कटिप्रदेश अत्यन्त सुन्दर था तथा वे बलशाली थे। उनकी स्थूल जंघाएँ केलेके तनेकी शोभासे प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। सुन्दर घुटनों, जंघा और एड़ीसे उनके चरण-कमल सुशोभित हो रहे थे॥ ३५-३६॥ वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और महामूल्यवान् वस्त्र धारण किये हुए थे। इस प्रकारके [रूप-सौन्दर्यवाले] उन भगवान् गणेशको अपने सम्मुख उस नगरकी भूमिपर प्रकट हुआ देखकर देवता और मुनिगण जय-जयकार करते हुए उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर उन सबने उनको वैसे ही भूमिपर लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया, जैसे देवगण इन्द्रको प्रणाम करते हैं॥ ३७-३८॥ देवता और ऋषि बोले-हे विभो! आप कौन

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