भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 656 में से

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पृष्ठ 202

२०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हैं ? कहाँसे आये हैं ? क्या कार्य है ? हमसे कहिये। हम पराक्रमको नहीं जानते हैं ॥ ४४-४५ ॥ लोग तो यही जान रहे हैं कि बालकका रूप धारण किये क्या ईश्वरने ही इसका वध करनेके लिये और आप दुष्टसंहारक परम ब्रह्म परमात्मा हैं, जो अनलासुरके पीड़ित तीनों लोकोंकी रक्षा करनेके लिये बालकके रूपमें सन्त्राससे अपने कर्मोंका त्यागकर बैठे हुए हम लोगोंको अवतार लिया है ? ऐसा कहकर उन सबने उन्हें सादर त्राण देनेके निमित्त प्रकट हुए हैं ॥ ३९-४० ॥ प्रणाम किया। उसी समय कालानलका स्वरूप धारण उनके इस प्रकारके वचन सुनकर शिशुरूपधारी किये वह अनलासुर दसों दिशाओंको जलाता हुआ, गजानन गणेशजीने प्रसन्नमुख होकर हँसते हुए उन मनुष्य-लोकका भक्षण करता हुआ वहाँ आया। उस देवताओं और मुनियोंसे इस प्रकार कहा - ॥ ४१ ॥ समय वहाँ क्रन्दन करते हुए मनुष्योंका महान् कोलाहल बालक [ -रूपधारी गणेशजी ]-ने कहा- हे व्याप्त हो गया ॥ ४६-४८ ॥ देवताओ एवं ऋषियो! आप लोग ज्ञानसम्पन्न हैं। आप उसे देखते ही सभी मुनिगण भागनेको उद्यत हो लोगोंने जो कहा, वह सत्य ही है। मैं उस परपीडाकारी गये। उन सबने बालरूपधारी उन गणेशजीसे भी कहा (दूसरोंको कष्ट देनेवाले) दुष्टके वधके लिये अपनी कि 'शीघ्र पलायन करो, नहीं तो यह अत्यन्त प्रचण्ड इच्छासे बालकका रूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक आया अनलासुर निश्चित ही आज वैसे ही तुम्हारी हिंसा कर हूँ। हे पुण्यात्माओ ! मैं उसके वधका जो उपाय बताता देगा, जैसे तिमिंगल नामक मत्स्य छोटी मछलियोंकी हूँ, तुम लोग उसे करो ॥ ४२-४३ ॥ और गरुड़ सर्पोंकी [हिंसा कर देते हैं] ॥ ४९-५० ॥ उसे देखकर आप सब मुझे प्रयत्नपूर्वक प्रेरित उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालकरूपधारी करना, तब उसके और मेरे महान् आचरणको कौतुकपूर्वक परमात्मा गजानन गणेशजी हिमालयपर्वतकी भाँति अचल देखियेगा। उनके इस प्रकारके कृपापूर्ण वाक्य सुनकर वे होकर वहाँ खड़े हो गये। देवता और ऋषि उन सब हर्षमें भरकर आपसमें कहने लगे कि हम सब इनके बालरूपधारी गणेशजीको वहीं छोड़कर दूर चले गये ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वांकुरमाहात्म्यके अन्तर्गत अनलासुरोत्पत्ति' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ चौंसठवाँ अध्याय गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा आश्रया बोली- हे महामुनि! देवताओं और सहित चलायमान हो गयी ॥ ३-४ ॥ ऋषियोंके पलायन कर जानेपर जब बालकरूपधारी आकाशमें बादलोंके गरजनेके समान ध्वनि होने गणेशजी पर्वतके समान स्थित रहे, तब उस बालक और लगी। वृक्षोंकी शाखाओंसे पक्षियोंके समूह भूतलपर गिर अनलासुरके मध्य कौन-सी आश्चर्यजनक घटना घटित पड़े। समुद्र जलहीन हो गये, वृक्ष जड़से उखड़ गये। हुई; उसे मुझसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये ? ॥ १ १/२ ॥ कम्पनकी प्रबलताके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा नारदजी बोले- हे शचीपति ! उसके इस प्रकार रहा था ॥ ५-६ ॥ प्रश्न करनेपर मुनिश्रेष्ठ कौण्डिन्यने जो कहा, वह मैं उसी क्षण बालकरूपधारी भगवान् गजाननने उस बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २१/२॥ अनलरूप धारण किये दैत्यको मायाबलसे पकड़ लिया बालरूपधारी गजाननके पृथ्वीपर पर्वतकी भाँति और सबके देखते-देखते उसे वैसे ही निगल गये, जैसे स्थिर हो जानेपर वह अनलासुर दुर्दमनीय कालाग्निकी अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया था। तदनन्तर उन भाँति वहाँ आया; उस समय अचला पृथ्वी भी पर्वतों परमात्मा गणेशजीने विचार किया कि यदि यह दैत्य मेरे