श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६४ ] * गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा * २०९ उदरमें चला गया तो मेरे उदरमें स्थित तीनों भुवनोंको जला डालेगा, जिनका कि मैंने रक्षण किया है। [इसके कारण] सभी ब्रह्माण्डोंका नाश हो जायगा, इसलिये मैं इसको कण्ठमें ही रख लेता हूँ। इसी बीचमें देवाधिदेव गणपति की परमाश्चर्यमयी लीलाको देखनेके लिये अग्नि, इन्द्र आदि देवगण वहाँ आ पहुँचे। तब इन्द्रने उस अग्नि (-रूप असुरके दाह)-को शान्त करनेके लिये चन्द्रमाको उन्हें प्रदान किया॥ ७-१०॥ तब उस चन्द्रमाको मस्तकपर धारण किये हुए भगवान् गणेशका देवताओं और मुनियोंने भी 'भालचन्द्र' इस नामसे स्तवन किया, परंतु फिर भी कण्ठके मध्य भागमें स्थित वह अग्नि शान्त नहीं हुई॥ ११॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने उनको सिद्धि-बुद्धि नामवाली दो मानस कन्याएँ प्रदान कीं। वे केलेके सदृश जंघावाली, कमलनयनी, शैवलसदृश सघन केशोंवाली, चन्द्रमुखी, अमृतसदृश मधुरभाषिणी, कूपसदृश गम्भीर नाभिवाली, सरिताओंसदृश त्रिवलीसे युक्त, कमलनालसदृश मध्यभागवाली (कटिप्रदेशवाली), प्रवालके सदृश अरुणम आभासे युक्त हाथोंवाली और [उत्तापको] शीतल करनेमें समर्थ थीं ॥ १२-१३॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने [गणेशजीसे] कहा कि इन दोनोंका सम्यक् रूपसे आलिंगन करनेसे तुम्हारे कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो जायगी। परंतु उन दोनोंका आलिंगन करनेपर भी गणेशजीकी कण्ठस्थित अग्नि कुछ ही शान्त हुई। तत्पश्चात् कमलापति भगवान् विष्णुने उन्हें एक अत्यन्त कोमल कमल पुष्प प्रदान किया। तबसे वे [भगवान् गजानन] देवताओं और मनुष्योंद्वारा 'पद्मपाणि' कहे जाने लगे॥ १४-१५॥ तब भी अग्निके शान्त न होनेपर वरुणने शीतल जलसे उनको सिंचित किया और गिरिशायी भगवान् शंकरने उन्हें सहस्र फणवाला नाग प्रदान किया॥ १६॥ उससे उदरको बाँधनेके कारण वे 'व्यालबद्धोदर' नामवाले हुए, परंतु तब भी उनका अग्नियुक्त कण्ठ शीतल नहीं हुआ ॥ १७॥ तदनन्तर अठ्ठासी सहस्र मुनिजन उनके समीप आये और उनमेंसे प्रत्येकने इक्कीस-इक्कीस दूर्वाएँ उनके मस्तकपर रखीं, जो अमृतके तुल्य [गुणकारी] थीं। इससे उनके कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो गयी। तब दूर्वांकुरोंके भारसे अर्चित वे परमात्मा गणेशजी भी प्रसन्न हो गये॥ १८-१९॥ [गणेशजी दूर्वांकुरसे प्रसन्न होते हैं—] ऐसा जानकर उन सभी [देवताओं और मुनियों]-ने अनेक दूर्वांकुरोंसे उन गजानन गणेशजीका पूजन किया, जिससे वे गजानन हर्षित हुए ॥ २० ॥ उन्होंने देवताओं और मुनियोंसे कहा कि भक्तिपूर्वक की गयी मेरी पूजा चाहे अल्प हो या महान्, किंतु वह दूर्वांकुरोंके बिना व्यर्थ है ॥ २१ ॥ बिना दूर्वांकुरोंके की गयी पूजाका फल किसीको भी नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिये मेरे भक्तको उषाकालमें की गयी पूजामें एक या इक्कीस दूर्वा चढ़ानी चाहिये ॥ २२ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित की गयी दूर्वा जो महान् फल देती है, [वह फल] सैकड़ों यज्ञों, दानों, व्रतों और अनुष्ठानसमूहोंसे नहीं प्राप्त हो सकता॥ २३ ॥ हे देवताओ और मुनिगण! करोड़ों जन्मोंतक की गयी उग्र तपस्या और नियम-पालनसे भी उतना पुण्य फल नहीं उपार्जित होता, जितना कि दूर्वा समर्पित करनेसे प्राप्त होता है॥ २४॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले—[हे प्रिये!] गणेशजीके इस प्रकारके वचन सुनकर देवताओंने देवाधिदेव परमात्मा गजाननका पुनः दूर्वांकुरोंसे अर्चन किया॥ २५॥ तब उन गणेशजीने पृथ्वी और आकाशको निनादित करते हुए उच्च स्वरसे आनन्दयुक्त गर्जन किया। तदनन्तर हर्षित हुए सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों और मनुष्योंको भी अनेक वरदान देकर वे बालरूपधारी गणेशजी अन्तर्हित हो गये। तब उन सभीने उन गणेशजीका 'कालानल- प्रशमन'—यह नाम रखा। [तत्पश्चात्] उन सबने वहाँ मन्दिरका निर्माणकर उसमें गजानन गणेशजीकी मूर्तिकी स्थापना की और देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका 'विघ्नहर्ता'—यह नाम रखा ॥ २६-२८ ॥ इन विघ्नहर्ता गणेशजीकी कृपासे वहाँ किये हुए