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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 656 में से

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पृष्ठ 204

२०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

स्नान, दान, तप और अनुष्ठानसे अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ॥ २९ ॥ वहाँपर गणेशजीने [कालानलपर] विजय प्राप्त की थी, इसलिये वह नगर विजयनगर नामसे प्रसिद्ध हुआ और वहाँपर [गणेशजीने] सभीके विघ्नोंका नाश किया था, इसलिये वे [स्वयं] 'विघ्नहर्ता' नामसे विख्यात हुए ॥ ३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे प्रिये ! दूर्वाके उत्तम माहात्म्यसे सम्बन्धित यह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह दिया; इसके श्रवण और पठनसे सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जाता है। अब मैं एक अन्य पुरातन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, उसका श्रवण करो ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वामाहात्म्यवर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥

पैंसठवाँ अध्याय गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन

[मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे देवि ! किसी समय गजानन गणेशजी सुखासनमें बैठे हुए थे। [उसी समय] नारदमुनि उनका दर्शन करनेके लिये आये। वे बहुत दिनोंके पश्चात् उनके पास आये थे ॥ १ ॥ उन्होंने [उन्हें] साष्टांग प्रणामकर कहा—'हे गजानन ! हमारा जन्म सफल हो गया, जो पुण्य-समूहों [-के उदय] -के फलस्वरूप आपका दर्शन हुआ है ॥ २ ॥ ऐसा कहकर मुनि हाथ जोड़कर उनके सम्मुख स्थित हो गये, तब महाभाग गजाननने उन महान् भाग्यशाली महामुनि नारदजीका हाथ पकड़कर आसनपर बैठाया। गणेशजीद्वारा किये हुए उस सत्कारसे मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी प्रसन्न हो गये ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर नारदजीने उन गणाधिपति गणेशजीसे कहा कि 'मेरे हृदयमें जो आश्चर्य व्याप्त है, उसे निवेदन करनेके लिये मैं आया हूँ, तत्पश्चात् आपको प्रणामकर मैं पुनः चला जाऊँगा ॥ ५ ॥ गजानन बोले— [हे मुनिवर !] तुमने कौन-सा आश्चर्य देखा है ? तुम्हारे हृदयमें क्या है ? उसे तुम विशेष रूपसे बतलाओ; तदनन्तर अपने आश्रमको चले जाना ॥ ६ ॥ नारदजी बोले—हे देव ! मिथिलापुरीमें जनक नामके एक श्रेष्ठ राजा हैं; वे अत्यन्त प्रतिष्ठासम्पन्न, दानी तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् हैं ॥ ७ ॥ वे नित्य अन्नदानमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंका अनेक प्रकारके अलंकारों, वस्त्रों और दक्षिणाओंसे पूजन करते हैं। वे दीन-दुखियों, अन्धों और दरिद्रोंको बहुत- सा धन प्रदान करते हैं। याचक उनसे जो-जो माँगते हैं, वे वह सब कुछ उनको प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥ फिर भी उन महान् आत्मावाले [राजा]-का धन समाप्त नहीं होता ! क्या गजानन गणेशजीकी कृपासे ही उनका धन बढ़ रहा है ? इस महान् आश्चर्यको देखनेके लिये मैं उनके राजभवन गया, [परंतु] उन्होंने ब्रह्मज्ञानके अभिमानसे मेरा अपमान किया ॥ १०-११ ॥ मैंने उनसे इस प्रकार कहा कि हे नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, [तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर] भगवान् गजानन तुम्हारे द्वारा चिन्तित वस्तुको तुम्हें प्रदान करते हैं। तब उन्होंने गर्वसे कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं ही त्रिलोकीका ईश्वर हूँ। मैं ही दान देनेवाला और मैं ही दान दिलानेवाला हूँ; मैं ही भोक्ता तथा मैं ही पालनकर्ता हूँ। मेरे स्वरूपसे [मुझसे] अतिरिक्त त्रिभुवनमें दूसरा कुछ है ही नहीं। कर्ता, कारण और कार्यका साधनस्वरूप- सब कुछ मैं ही हूँ' ॥ १२-१४ ॥ नारदजी बोले—[हे गजानन !] मैंने उनके इस प्रकारके वचन सुनकर क्रोधपूर्वक कहा—'ईश्वरके अतिरिक्त जगत्‌का कर्ता अन्य कोई नहीं है ॥ १५ ॥ हे राजन् ! तुम यह धर्मका दम्भपूर्ण आचरण क्यों कर रहे हो? हे पुण्यात्मन् ! थोड़े ही समयमें मैं तुम्हें इसका प्रमाण दिखला दूँगा।' हे गजानन ! उनसे इस प्रकार कहकर मैं आपके पास चला आया ॥ १६१/२ ॥