श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६५ ] * गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन * २०३ [मुनि] कौण्डिन्य बोले- [हे प्रिये !] नारद मुनिके इस प्रकारके वचन सुनकर उन परमात्मा गणेशजीने अर्घ्य, अलंकार और चन्दनसहित दिव्य पुष्पोंसे उनका पूजन किया। मुनि भी उनसे आज्ञा लेकर वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके पास चले आये ॥ १७-१८ ॥ [उधर] गजानन गणेशजी सर्वज्ञ होते हुए भी राजा जनककी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये निन्दनीय वेश धारणकर मिथिला गये। उनका अमांगलिक शरीर अनेक प्रकारके घावोंसे संयुक्त था और उनमेंसे रक्तस्राव हो रहा था। वे मक्खियोंके समूहसे आक्रान्त, दन्तहीन और अत्यन्त आतुर प्रतीत हो रहे थे ॥ १९-२० ॥ उन्हें मार्गमें जाते देखकर कुछ लोग नाक दबा लेते थे, कुछ लोग कपड़ेसे मुख ढक लेते थे और कुछ लोग इधर-उधर थूकने लगते थे ॥ २१ ॥ [इस प्रकार] लड़खड़ाते, गिरते-पड़ते, मूर्च्छित होते तथा पुनः उठकर चलते हुए वे [कुत्सित वेशधारी गणेशजी] बालकोंकी टोलियोंके साथ राजभवनके द्वारपर पहुँचकर द्वारपालोंसे बोले- हे दूतो ! राजासे जाकर निवेदन करो कि मैं वृद्ध भूखा ब्राह्मण अतिथि इच्छानुकूल भोजनकी आकांक्षासे आया हूँ ॥ २२-२३ ॥ तब उन दूतोंने उनके इस तरहके वचनको सुनकर राजा जनकके पास जाकर उन वचनोंको वैसे ही कह सुनाया। तब वे राजा जनक [दूतोंसे] बोले- 'हे दूतो ! उन्हें ले आओ, मैं उन कौतुकी ब्राह्मणको देखना चाहता हूँ।' तब उन दूतोंने उस मलिन वस्त्रधारी और मलिन शरीरवाले ब्राह्मणको राजा जनकके पास पहुँचा दिया। राजाने दूरसे ही देखा कि वह मक्खियोंसे घिरा हुआ काँप रहा है ॥ २४-२५ ॥ पसीनेसे भीगे और घावोंसे रक्त स्रवित होते वृद्ध ब्राह्मणको देखकर राजा जनकने मनमें विचार किया कि क्या ये स्वयं परमात्मा ही हैं, जो मुझे छलनेके लिये ऐसा रूप धारण करके आये हैं। यदि मेरा पुण्य होगा तो मैं इनका मनोवांछित समाधान करूँगा, नहीं तो जो कुछ भविष्यमें होनेवाला है, वह अन्यथा नहीं होता ॥ २६-२७ ॥ नृपश्रेष्ठ जनकजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने द्वारपालोंके साथ उस ब्राह्मणको अपने सम्मुख [कक्षमें] प्रवेश करते देखा ॥ २८ ॥ ब्राह्मण बोला- हे राजन् ! चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश तुम्हारी उज्ज्वल कीर्ति सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। मुझे भोजन प्रदान कीजिये, मैं चिरकालसे अत्यन्त क्षुधित हूँ। हे नरेश्वर ! जबतक मेरी तृप्ति न हो जाय, तबतक अन्न प्रदान करते रहिये, इससे तुम्हें सौ यज्ञ करनेका पुण्यफल प्राप्त होगा ॥ २९-३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले- उन ब्राह्मणदेवताके इस प्रकारके वचन सुनकर राजाने उन्हें अपने राजभवनके भीतर ले जाकर उनका सम्यक् प्रकारसे विधिवत् पूजनकर [उनके लिये] स्वादिष्ट अन्नका परिवेषण किया ॥ ३१ ॥ उनके द्वारा दिया गया [वह अन्न] वे तत्काल उनके सम्मुख ही भक्षण कर गये। [तब] असंख्य पात्रोंमें [उन ब्राह्मणरूपी गजाननके भोजनार्थ] पकनेके लिये उत्तम प्रकारके चावल डाले गये ॥ ३२ ॥ [इस प्रकार] जो भी पका हुआ चावल उनके सामने परिवेषित किया गया, उस सबका वे [ब्राह्मण देवता] भक्षण कर जाते। तब प्रजाजनोंने राजासे कहा- [हे राजन्!] यह तो राक्षस प्रतीत होता है। इसे इतना अधिक [अन्न] क्यों दिया जा रहा है? [क्योंकि] राक्षसोंको [अन्नादि] प्रदान करनेसे किंचिन्मात्रकी भी पुण्यप्राप्ति नहीं होती ॥ ३३-३४ ॥ कुछ लोगोंने कहा- हे राजन्! त्रैलोक्यका भक्षण कर लेनेपर भी इसकी परम तृप्ति नहीं हो सकती। इसलिये इसे अब धान्य* (अनाज) प्रदान करें ॥ ३५ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण ग्रामों और नगरोंसे, घरों तथा भूमिके नीचे दबाकर रखे गये समस्त धान्यको उस सर्वभक्षी द्विजरूपधारी अतिथि-पुरुषके सम्मुख लाकर डाल दिया गया, परंतु उन धान्योंको खा लेनेपर भी उसे
- शस्यं क्षेत्रगतं प्राहुः सतुषं धान्यमुच्यते । आमान्नं वितुषं प्रोक्तं सिद्धमन्नं प्रकीर्तितम् ॥ अर्थात् खेतमें जो भी तैयार फसल खड़ी है, उसे शस्य कहते हैं। तुष (छिलका)-युक्त अनाजको धान्य कहते हैं। छिलकारहित अनाजको आमान्न (कच्चा अन्न) तथा आगमें पके हुए अनाजको सिद्ध अन्न कहते हैं। Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Front