श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ * पुराणे हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तृप्तिकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ ३६-३७ ॥ तत्पश्चात् दूतोंने राजासे कहा कि [ हे राजन् !] धान्य भी कहीं नहीं प्राप्त हो रहा है। दूतोंके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा जनकके मुखके नीचे कर लेनेपर वे ब्राह्मणदेवता 'स्वस्ति' कहकर वहाँसे चले गये। वे तृप्त नहीं हुए थे, अतः घर-घर जाकर 'अन्न दीजिये'—ऐसा लोगोंसे कहने लगे। इसपर लोगोंने उनसे कहा— 'हे ब्रह्मन् ! हम सबके घरका सारा धान्य राजाने मँगवा लिया और उस सम्पूर्ण धान्यका आपने भक्षण कर लिया, इसलिये अब आपकी जहाँ रुचि हो, वहाँ आप जायें' ॥ ३८-४० ॥ ब्राह्मण बोले—मैंने लोगोंसे इस राजाकी इस प्रकारकी कीर्ति सुनी थी कि 'राजा जनकसे श्रेष्ठ दानी कोई नहीं है।' अतः तृप्तिकी कामनासे मैं यहाँ आया हूँ, बिना तृप्त हुए कैसे चला जाऊँ ? ॥ ४१ ॥ [ कौण्डिन्य बोले— हे प्रिये ! ]— लोगोंके मौन हो जानेपर भ्रमण करते हुए उन द्विजश्रेष्ठने विरोचना और त्रिशिरा नामक ब्राह्मण-दम्पतीके सुन्दर भवनको देखा ॥ ४२ ॥ [ गणेशजीके गणोंने कहा— ] हे श्रेष्ठ [योगिजनो!] [तदनन्तर] वे [द्विजरूपधारी भगवान् गजानन] सभी प्रकारके गृहोपकरणोंसे रहित और धातुपात्रोंसे हीन उस भवनमें गृहस्वामीकी भाँति प्रविष्ट हुए ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'जनकके सत्त्वका हरण' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ छाछठवाँ अध्याय कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रदत्त दूर्वाङ्कुरमात्रसे तृप्त होना कौण्डिन्य बोले— [हे प्रिये !] उन दोनों (द्विजदम्पती)-के लिये पृथ्वी ही आसन (बिछावन) और आकाश ही ओढ़ना था। सभी प्रकारकी धातुओंके स्पर्शतकसे रहित उन दोनोंके लिये दिशाएँ ही वस्त्र थीं। द्विजरूपधारी [गजानन]-ने देखा कि वे दोनों अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये बिना याचनाके जो मिल जाय, वही खानेवाले और जलमात्रसे ही सभी धार्मिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेवाले थे ॥ १-२ ॥ उनका घर चारों ओरसे मच्छर और मक्खियोंके समूहोंसे भरा हुआ था। उन्होंने देखा कि उन दोनों (द्विजदम्पती)-के द्वारा अनन्य भक्तिभावसे गणेशजीकी मूर्तिकी पुष्पों और पल्लवोंसे पूजा की गयी है तथा वे दोनों उनकी भक्तिमें निरत हैं। तब उन्होंने उन दोनोंसे कहा— 'हे निष्पाप [द्विज-दम्पती !] जो बात मैं कह रहा हूँ, उसे सुनो ॥ ३-४ ॥ मिथिलाधिपति [महाराज जनक]-की [दान- विषयक] कीर्ति सुनकर मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण तृप्तिकी कामनासे यहाँ आया था, किंतु उन्होंने मुझे तृप्त नहीं किया। दम्भपूर्ण कार्योंसे सत्त्व (धर्म)- की रक्षा नहीं होती। तुम्हारे घरमें मेरे लिये कुछ तृप्तिकर हो तो दो' ॥ ५-६ ॥ [ द्विज-] दम्पती बोले— [राजा जनक] जो चक्रवर्ती सम्राट् थे, जब वे आपकी तृप्ति न कर सके तो हम दोनों दरिद्र आपको तृप्तिकारक क्या दे सकेंगे ? ॥ ७ ॥ जो समुद्र असंख्य नदियों और नदोंके जलसे भी पूर्ण नहीं होता, भला बताओ कि वह बिन्दुमात्र जलसे कैसे पूर्ण होगा ? ॥ ८ ॥ द्विज [-रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक दिया हुआ अत्यन्त अल्प पदार्थ भी मुझे बहुत तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है, जबकि बिना भक्तिके अथवा दिखावेके लिये बहुत अधिक मात्रामें दिया हुआ भी व्यर्थ होता है ॥ ९ ॥ उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे द्विज- श्रेष्ठ ! हम शपथपूर्वक कहते हैं कि हमारे घरमें कुछ भी नहीं है। गणेशजीकी पूजाके लिये हम लोग प्रातःकाल दूर्वांकुर लाये थे। हमने उनसे गणेशजीकी पूजा की थी। उन्हींमेंसे एक दूर्वा बची हुई है ॥ १० १/२ ॥ द्विज [ रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Back