श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०६६ ] * कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना * २०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
दिया हुआ एक दूर्वांकुर भी मेरे लिये तृप्तिकारक होगा, अतः उसे ही दे दीजिये ॥ ११ ॥ कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] तब [द्विजपत्नी] विरोचनाने उनके इस कथनको सुनकर उस एक दूर्वांकुरको उनको भक्तिपूर्वक प्रदान कर दिया, जिससे वे द्विज तृप्त हो गये ॥ १२ ॥ विरोचनाने उस दूर्वांकुरमें शालि चावल और गोदुग्धसे निर्मित खीर, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, व्यंजनों तथा चाटकर एवं चूसकर खाये जानेवाले विभिन्न भोज्य पदार्थोंकी भावना करके उन्हें उसे दिया था, उसे ग्रहण करके उन ब्राह्मण [-श्रेष्ठ]-ने उसका परम प्रसन्नतासे भक्षण किया ॥ १३-१४॥ [विरोचनाके द्वारा] भक्तिपूर्वक दिये हुए उस एक दूर्वांकुरसे उन द्विज [श्रेष्ठ]-की जठराग्नि तत्क्षण शान्त हो गयी। उन्हें तत्काल परम शान्तिकी प्राप्ति हो गयी। तदनन्तर तृप्त हुए उन द्विजने हर्षपूर्वक त्रिशिराको गले लगा लिया ॥ १५-१६॥ [तत्पश्चात्] उन द्विजने अपना वह कुत्सित रूप त्याग दिया और गजानन गणेशजीके रूपमें प्रकट हो गये। उनका वह स्वरूप चार भुजाओंसे युक्त, कमलके समान नेत्रवाला और दण्डसदृश सूँड़से सुशोभित था ॥ १७ ॥ उन्होंने अपने हाथोंमें कमल, परशु, माला और दाँत धारण कर रखा था। उनके सिरपर महामूल्यवान् मुकुट सुशोभित हो रहा था और उनके कान स्वर्ण-कुण्डलोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनका श्रीविग्रह दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त था। प्रसन्न मनवाले उन गजानन गणेशजीने उन दोनों द्विजदम्पतीसे कहा कि 'जो-जो तुम्हारे मनमें इच्छित कामनाएँ हों, उनके लिये शीघ्र वर माँग लो' ॥ १८-१९ १/२ ॥ उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे देव! हम दोनोंका जहाँ भी जन्म हो, वहाँ [हमारी] आपमें दृढ़ भक्ति बनी रहे अथवा हमें इस अत्यन्त दुस्तर संसार- सागरसे मुक्ति प्रदान कर दीजिये। हे गजानन ! हम दोनोंके
[दायाँ स्तम्भ]
मनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है ॥ २०-२१॥ कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] उन द्विज- दम्पतीके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने 'तथास्तु' कहा और प्रसन्नतापूर्वक [अपने] भक्त त्रिशिराका पुनः आलिंगन करके अन्तर्धान हो गये ॥ २२ ॥ हे आश्रये ! असंख्य व्यंजनोंका भक्षण करनेपर भी जो परमात्मा तृप्त नहीं हुए, उन्हें एक दूर्वांकुरमात्रसे परम तृप्तिकी प्राप्ति हो गयी। इसी कारणसे मेरे द्वारा गणेशजीको दूर्वाका भार (इक्कीस दूर्वांकुर) अर्पित किया जाता है। इस प्रकार मैंने दूर्वांकुरसमर्पण-सम्बन्धी मंगलमयी महिमाका तुमसे सम्यक् रूपसे वर्णन कर दिया, जिसका श्रवण सम्पूर्ण मनोभिलषितोंको प्रदान करनेवाला है। जो इस आख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह इहलोकमें पुत्र, धन एवं मनोभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति करता है और परलोकमें भी आनन्दित रहता है तथा गणेशजीकी भक्ति प्राप्त करता है। निष्काम भक्त मुक्तिकी प्राप्ति करता है ॥ २३-२६ ॥ [गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो !] इस आख्यानका श्रवण करनेपर भी आश्रयाके हृदयमें पुनः सन्देह उत्पन्न हुआ, जिसे जानकर [मुनिवर] कौण्डिन्यने पुनः कहा—हे आश्रये ! अपने सन्देहका निवारण करनेहेतु मेरे कथनका श्रवण करो। हे निष्पाप [प्रिये !] तुम्हारे हृदयमें जो [संशय] स्थित है, वह मुझे ज्ञात है, उसीके [निराकरणके] विषयमें कहता हूँ—एक दूर्वांकुर लेकर तुम शीघ्र इन्द्रके पास चली जाओ। पहले तुम उन्हें आशीर्वाद दो, तत्पश्चात् उनसे सुवर्णकी याचना करो ॥ २७-२९ ॥ दूर्वांकुरसे तौलकर उस स्वर्णको ग्रहणकर यहाँ ले आओ। हे शुभानने ! उस (दूर्वांकुर)-के भारसे न तो कम और न ही अधिक सुवर्ण ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥ [गणेशजीके] गणोंने कहा—[हे योगीश्वरो !] तदनन्तर मुनिवर कौण्डिन्यके इस कथनका श्रवणकर पतिके वचनका पालन करनेवाली आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर शतक्रतु इन्द्रके पास गयी ॥ ३१ ॥
[पाद-टिप्पणी / समापन]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वाके माहात्म्यका वर्णन' नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥
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