श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पच्चीसवाँ अध्याय
३३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पच्चीसवाँ अध्याय कुमार सनक तथा सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति, उनके द्वारा काशीमें गणेशकुण्डका निर्माण तथा मन्दिर बनाकर उसमें वरदविनायक नामक विनायक-मूर्तिका प्रतिष्ठा, भक्तिकी महिमा
सनक-सनन्दन बोले-आप सभी कारणोंके कारण और कारणोंसे अतीत हैं। आप ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्माण्डके कारण, व्यापक और [परसे भी] परे हैं॥ १ ॥ हे अनघ! आप ही विश्वकी रचना करते हैं, इसका पालन-पोषण करते हैं और आप ही इसका संहरण करनेवाले हैं। आप विविध स्वरूपोंवाले हैं और रूपरहित भी हैं। आप विविध प्रकारके मायाबलसे समन्वित हैं। आप ही पृथ्वी आदि पंचमहाभूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस हैं। आप चराचरस्वरूप हैं, अतः आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? ॥ २-३ ॥ आपके यथार्थ स्वरूपको न जाननेके कारण वेद ‘नेति-नेति’ कहकर आपको पुकारते हैं। हम दोनों भी आपकी मायासे विमोहित होनेके कारण आपके श्रेष्ठ स्वरूपको जाननेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ ४ ॥ हे विभो ! अनेक रूप धारण करनेवाले आपकी महिमाको हम नहीं जानते हैं। हे प्रभो! इस समय हम आपके चरणोंका दर्शन करके कृतकृत्य हो गये हैं। आप अपनी अनन्त शक्तियोंके द्वारा नाना अवतारोंको धारणकर पृथ्वीके भारका हरण करते हैं॥ ५१/२॥ ब्रह्माजी बोले-उन दोनोंके द्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर मायावी और अत्यन्त कौतुकी बालरूपी वे विनायक प्रसन्न होकर उनसे बोले-आप दोनों मेरी कृपासे तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले और सर्वज्ञ हो जाओगे॥ ६-७॥ इस प्रकारका वर प्रदानकर वे विनायकदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनों कुमारों सनक तथा सनन्दनने भलीभाँति विनायककी अतुलनीय मूर्तिका निर्माणकर तथा रत्नों एवं सुवर्णसे निर्मित एक अद्वितीय मन्दिर बनाकर उसमें उस मूर्तिकी स्थापना की ॥ ८-९ ॥ उन्होंने उस मूर्तिका ‘वरदविनायक’ यह नाम
रखा। उन दोनोंने वहींपर ‘गणेशकुण्ड’ नामसे एक सरोवर भी बनवाया॥ १०॥ इस गणेशकुण्डमें स्नानकर जो वरदविनायककी पूजा करता है। वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है और अनेक भोगोंका भोग करता है॥ ११॥ वह पुत्र-पौत्रों, विद्या, आयु, महान् यश, धन, धान्य, कीर्ति और शाश्वत तत्त्वज्ञानको प्राप्त करता है। अन्तमें वह विनायकके धामको प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उसी समय गन्धर्वों, यक्षों तथा अप्सराओंके साथ सभी देवता वहाँ आये और उन देवेश वरदविनायकका दर्शन तथा पूजनकर वहीं क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। वे दोनों कुमार सनक तथा सनन्दन भी अत्यन्त आश्चर्यान्वित होते हुए उत्तम देवलोकको चले गये ॥ १३-१४॥ काशिराज भी अपने अमात्यों तथा प्रजाजनोंके साथ वहाँ आये और उन्होंने विविध द्रव्यों, अलंकारों, विविध उत्तरीयों तथा अधोवस्त्रों, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, नानाविध फलों, रत्नों, मोतियों, पुष्पों तथा बहुत प्रकारकी दक्षिणाओंके द्वारा ब्राह्मणोंके साथ मन्त्रोच्चारपूर्वक परम भक्तिसे उन वरदविनायकका पूजन किया। तदनन्तर उन्होंने वस्त्रों तथा स्वर्णाभूषणोंसे ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ १५-१७॥ आशीर्वाद ग्रहणकर वे पुनः अपने नगरको आये। राजाके समान ही उन मन्त्रियों आदिने भी उन वरदविनायकका पूजन किया। उन्होंने भी उसी प्रकार ब्राह्मणोंका भी पूजनकर उनसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया। तदनन्तर प्रजाजनोंने भी यथाशक्ति उन विनायकका पूजन किया ॥ १८-१९॥ सभीने प्रसन्नमन होकर नगरमें प्रवेश किया। [हे व्यासजी!] इस प्रकार मैंने विनायकद्वारा की गयी
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वृत्तिवाले शुक्ल नामक ब्राह्मणके चरित्रका श्रवण किया।
क्री०ख०-अ०२६ ] * व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीपर शमीपत्रका गिर जाना * ३३३ चेष्टाओंको पूर्णरूपसे आपको बतलाया, इसका श्रवण करनेसे सभी पापोंका विनाश तथा पुण्यकी प्राप्ति होती है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ २०१/२ ॥ मुनि व्यासजी बोले- [हे ब्रह्मन् !] मैंने न्यायोचित वृत्तिवाले शुक्ल नामक ब्राह्मणके चरित्रका श्रवण किया। वे अपने घरमें धातुके किसी भी पात्रके न होनेके कारण धातुके स्पर्शसे रहित थे। उनके घरमें देव विनायक गये। उन्होंने गीले भातको बहनेसे रोकनेके लिये अपने दसों हाथोंसे उसे उठाकर जलके साथ ग्रहण करके अपनी थकान दूर की और पूर्ण संतृप्त होकर उनकी दरिद्रता दूर कर दी ॥ २१-२२१/२ ॥ उन्होंने उन शुक्ल ब्राह्मणको इन्द्रके भवनसे भी श्रेष्ठ भवन प्रदान किया और जो सम्पदाएँ अलकाधिपति कुबेरके पास नहीं थीं, उन्हें उनको प्रदान किया। मकरध्वज कामदेवके पास भी जो सौन्दर्य नहीं था, वह उन्हें प्रदान किया। चतुर्मुख ब्रह्माजीके पास भी जो ज्ञान नहीं था, वह उन्हें दिया। हे ब्रह्मन् ! इसमें क्या कारण है, उसे मुझको आप बतानेकी कृपा करें ? ॥ २३-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे व्यासजी! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है; क्योंकि परमेश्वर विनायकदेवकी कथाको भक्तिपूर्वक सुननेसे वह प्रश्न करनेवाले, सुननेवाले तथा बतानेवाले कथावाचकको भी पवित्र कर देती है ॥ २६ ॥ हे मुने ! आपने जो कुछ पूछा है, उसे बतानेके लिये मेरा मन भी उत्सुक हो रहा है। भक्तिभावसे प्राप्त होनेवाले विनायकदेवके चरित्रको मैं सम्यक् रूपसे आपको बताऊँगा। वे विनायकदेव सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वत्र व्याप्त तथा सभीके चित्तकी वृत्तिको जाननेवाले हैं। वे देव भक्तिके द्वारा ही प्रसन्न होते हैं; क्योंकि भक्तिभाव ही उनकी सन्तुष्टिका कारण है ॥ २७-२८ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित किये गये पत्र, जल, मनोहर पुष्पसे भी वे परम प्रसन्न होकर स्वयं अपनेको ही भक्तको समर्पित कर देते हैं ॥ २९ ॥ दम्भपूर्वक, अवहेलनापूर्वक अथवा दूसरेको देखकर लज्जापूर्वक समर्पित की गयी महान् सम्पत्ति अथवा महान् वस्तु या विविध रत्न, स्वर्ण, चाँदी या मोती आदि सब व्यर्थ होता है, केवल शमीपत्रमात्र समर्पित करनेवाले व्याधको उन्होंने अपना सालोक्य प्रदान कर दिया। हृदयमें दृढ़ भक्तिभाव रखकर किसी प्रसंगवश अनायास उपलब्ध पत्र-पुष्पादि अर्पित करनेसे भी वे प्रसन्न हो जाते हैं, अतः भक्ति श्रेष्ठ है ॥ ३०-३२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत सनक-सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति एवं भक्तिकी प्रशंसाका वर्णन' नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥ छब्बीसवाँ अध्याय व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीके ऊपर शमीपत्रके गिर जानेसे प्रसन्न विनायकद्वारा उन दोनोंको अपने लोककी प्राप्ति कराना मुनि व्यासजी बोले- [हे ब्रह्मन् !] व्याधने कौन-सा कर्म किया था? उसने कैसे शमीपत्र चढ़ाया ? उसका क्या नाम था और कैसे उसने विनायकके सालोक्यको प्राप्त किया? यह सब आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- विदर्भ नामक देशमें मदिष नामवाला एक नगर था। वह नगर तीनों लोकोंमें विख्यात था और कुबेरकी नगरी अलकापुरीके समान था ॥ २ ॥ उस नगरमें भीम नामका एक व्याध था, जो मांसका विक्रय करता था। यद्यपि दूसरेके दोषोंका कथन करनेमें दोष होता है, तथापि पूछे जानेपर यथार्थरूपसे उसका वर्णन करना चाहिये, ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं ॥ ३१/२ ॥ बहुत-से दोषोंसे व्याप्त वह भीम नामक व्याध बाण, धनुष, बाणोंसे भरा तरकश, खड्ग, चाप तथा छूरी लेकर नित्य वनमें जाता था और प्राणियोंका वधकर अपने कुटुम्बके भरणमें परायण रहता था ॥ ४-५ ॥ वह निर्दयी व्याध निर्जन वनमें पथिकों तथा ब्राह्मणोंका भी वध कर डालता था। किसी समयकी बात है, उस मदिष नामक नगरमें एक महोत्सव प्रारम्भ हुआ। Kalyana Visheshank 2021_Section_12_2_Front
३३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वह व्याध बहुत अधिक मांसकी प्राप्तिकी इच्छासे प्रातःकाल ही वनमें चला गया। वह धनका लोभी व्याध उस मांसको बेचनेकी इच्छा रखनेवाला था और उसीसे अपने कुटुम्बका पोषण करना चाहता था॥ ६-७॥ उसने अनेक मृगसमूहोंका वध किया और उनके मांसके भारसे लदा हुआ ज्यों ही वह नगरमें प्रविष्ट होना चाहता था, उसी समय एक महान् राक्षस वहाँ आ पहुँचा। मनुष्यकी गन्ध पाकर वह राक्षस अत्यन्त प्रसन्न होकर क्षणभरमें ही उस व्याधके पास आ पहुँचा। उस राक्षसका नाम पिंगाक्ष था। उसके नेत्र पीले थे और वह सबके लिये महाभयंकर था॥ ८-९॥ मनुष्यों तथा हिंसक पशुओंका भी भक्षण करनेवाला वह व्याध कभी तृप्त न होनेवाली अग्निके समान सदा अतृप्त रहता था, किंतु उस राक्षसको देखकर वह व्याध काँप उठा और भूमिपर गिर पड़ा॥ १०॥ उस व्याधके सभी शस्त्र गिर पड़े और आँखें भी बन्द हो गयीं। जब बलपूर्वक उसने आँखोंको खोला तो उसे समीपमें एक शमीका वृक्ष दिखायी दिया॥ ११॥ वह भीम नामक व्याध उस वृक्षपर चढ़ गया। उसीके पीछे वह राक्षस भी वृक्षमें चढ़ गया। तभी उस व्याधने शमीवृक्षकी एक शाखाको राक्षसपर फेंका। उस शाखासे एक पत्र वायुद्वारा उड़कर गणनाथके मस्तकके ऊपर गिर पड़ा। उस गणनाथ-विग्रहको वामनने स्थापित किया था। पत्रके मस्तकपर गिरनेसे गणनाथ प्रसन्न हो गये; क्योंकि वे गणनाथ उन दोनों व्याध तथा राक्षसद्वारा स्पष्ट रूपसे पूजित हो गये थे॥ १२-१३॥ बलिपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छावाले महर्षि कश्यपके पुत्र वामनको वर प्रदान करनेके लिये जो गजानन स्पष्ट रूपसे प्रकट हुए थे, वे देव दूर्वा तथा शमीपत्रोंसे ही अत्यन्त सन्तुष्ट हो जाते हैं। मनुष्योंद्वारा अनेक प्रकारके रत्नों, सुवर्ण तथा दिव्य वस्त्रोंसे समन्वित की गयी पूजा भी यदि दूर्वांकुरोंसे रहित होती है, तो वह निष्फल हो जाती है। वह पूजा जब दूर्वांकुरों अथवा शमीपत्रके द्वारा की जाती है तो सफल, अन्यथा निष्फल ही रहती है॥ १४-१६॥ वे प्रभु विनायकदेव, यज्ञ, दान, व्रतोपवास, तप, नियम अथवा सुवर्ण तथा रत्नोंके समूहोंके समर्पित करनेसे वैसे प्रसन्न नहीं होते, जैसे कि दूर्वा और शमीपत्रके चढ़ानेसे प्रसन्न होते हैं। उन दोनों भीम नामक व्याध तथा राक्षसपर प्रसन्न देवाधिदेव विनायकने उन दोनोंको अपने धाम पहुँचानेके लिये अपने ही समान स्वरूप धारण करनेवाले पार्षदोंको उत्तम विमानके साथ अपने लोकसे भेजा। उन पार्षदोंका दर्शन करनेसे उन दोनोंकी पर्वतके समान पापराशि नष्ट हो गयी॥ १७-१९॥ भगवान् गणेशजीके कृपाप्रसादसे राक्षस तथा भीम नामक व्याध दोनोंकी पापराशियाँ उसी प्रकार नष्ट हो गयीं, जैसे अग्निकणोंके सम्पर्कसे तृणोंके पर्वत जलकर नष्ट हो जाते हैं। वे दोनों अपना शरीर त्यागकर दिव्य देह धारणकर उस विमानमें आरूढ़ हुए और गणेशजीके पार्षदोंद्वारा विविध प्रकारके वस्त्रों, आभूषणों तथा विलेपनोंद्वारा पूजित हुए॥ २०-२१॥ अप्सराओं तथा गन्धर्वोंसे समन्वित उस महान् यानमें हो रही नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ उन दोनोंको देव विनायकके समीप ले जाया गया और उन दोनोंने विनायकको प्रणाम किया। वे दोनों सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो गये और उन्होंने भगवान् गणपतिके सारूप्यको प्राप्त किया। उन गणपतिने उन्हें एक कल्पतकके लिये अपने धाममें प्रतिष्ठित कर दिया॥ २२-२३॥ इस प्रकार वे गणेश भावनाप्रिय हैं और भक्तिभावसे प्रसन्न होनेवाले हैं। इसी प्रकारके भक्तिभावसे सन्तुष्ट होनेवाले वे विनायक शुक्ल नामक ब्राह्मणके द्वारा प्रदत्त एक मुट्ठीभर अन्नसे उसपर अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन शुक्ल नामक ब्राह्मणको उन्होंने अलकापुरीके सदृश दिव्य भवन प्रदान किया॥ २४ १/२ ॥ अतः दूर्वा तथा शमीपत्रोंके बिना की गयी पूजा निष्फल हो जाती है। वे गजानन दम्भपूर्वक की गयी महान् पूजासे वैसे प्रसन्न नहीं होते, जैसे कि भक्तिभावपूर्वक की गयी स्वल्प पूजासे ही प्रसन्न हो जाते हैं॥ २५-२६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'भीम और राक्षसके मोक्षका वर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०२७] * भीम नामक व्याध और राक्षसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त * ३३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
सत्ताईसवाँ अध्याय भीम नामक व्याध और राक्षसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त
व्यासजी बोले—भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत हे ब्रह्मन्! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि पूर्वजन्ममें वह व्याध कौन था और वह पिंगाक्ष नामक राक्षस कौन था? उनका कैसा शील था और कैसा आचरण था? हे प्रभो! उन वामनभगवान्ने अनुष्ठान क्यों किया और गजाननरूपधारी भगवान्ने उन्हें कैसे वर प्रदान किया ? ॥ १-२ ॥
गणेशजीका गणेशलोक पृथक् रूपसे अन्यत्र कैसे प्रतिष्ठित है? और क्यों उन्हें शमी प्रिय है? यह सब आप मुझे शीघ्र ही बतायें ॥ ३ ॥
ब्रह्माजी बोले—मुने ! आपने जो कुछ पूछा है, वह सब मैं आपको बताता हूँ। वह व्याध (भीम) पूर्वजन्ममें [साम्ब नामक] एक राजा था। [उसे वह राजपद कैसे प्राप्त हुआ, इस इतिहासका श्रवण करो— प्राचीनकालकी बात है, ] सभी शुभ (राजोचित) लक्षणोंसे समन्वित एक राजा हुए। वे सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, यज्ञ करनेवाले, विनयी, लज्जाशील और देवताओं एवं अतिथियोंकी पूजा करनेवाले थे ॥ ४-५ ॥
उनके गजारोही, अश्वारोही, रथारोही तथा पैदल सैनिकोंकी गणना नहीं की जा सकती थी। वे बड़े ही दानी, शूरवीर, मेधावी एवं इन्द्रके समान वैभवसे समृद्ध थे। उनके ध्वज तथा शत्रुजित् नामक दो प्रधान अमात्य थे। जो बड़े ही बुद्धिमान् थे। उन्होंने अपनी प्रतिभासे शुक्राचार्य तथा वाणीके अधिपति बृहस्पतिको भी पराजित कर दिया था ॥ ६-७ ॥
वे दोनों अपने शस्त्रके तेजसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतनेमें समर्थ थे। उन राजाकी मदनावती नामकी सुलक्षणा पत्नी थी। वह मदनावती पतिव्रता, धर्मशीला, सुन्दर मुखवाली तथा सब कुछ जाननेवाली थी। तीनों लोकोंमें उसके समान अन्य कोई कामिनी नहीं थी ॥ ८-९ ॥
वह दीनों, अनाथों, वृद्धजनों तथा अतिथियोंपर दया करनेवाली थी। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी यज्ञ, दान एवं साधुजनोंकी पूजामें निरत रहते थे ॥ १० ॥
उनके सद्व्यवहारसे नगरमें निवास करनेवाले तथा जनपदोंमें रहनेवाले सभी नागरिक सन्तुष्ट रहते थे। जो उनके शत्रु थे, वे भी राजाके सज्जनोंद्वारा प्रशंसित सन्धि, यान आदि छः गुणोंका अनुकरण करते थे ॥ ११ ॥
इस प्रकार उन पुण्यकीर्ति राजाने इस पृथिवीपर बहुत वर्षोंतक भलीभाँति शासन किया। कालयोगसे एक दिन राजाकी मृत्यु हो गयी। उन्होंने मरणासन्न-अवस्थामें विधि- पूर्वक सहस्रों गौओंका दान किया। साथ ही दस महादान तथा अन्य अष्टदानोंको भी प्रदान किया ॥ १२-१३ ॥
राजाके मृत हो जानेपर सम्पूर्ण नगरी उनके लिये शोक करने लगी। पुत्र न होनेके कारण उनकी धर्मपत्नीने भी उन्हींके साथ सहगति प्राप्त की ॥ १४ ॥
मन्त्रियोंने ब्राह्मणोंके द्वारा उनके सभी और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न कराये और एकादशाहके दिन भक्तिपूर्वक विविध दान प्रदान किये ॥ १५ ॥
राजाकी मृत्युके एक मास बीत जानेपर उन दोनों मन्त्रियोंने राजाके उत्तराधिकारीके रूपमें किसी कुलीन, राज्य चलानेयोग्य, बुद्धिमान्, सत्त्वसम्पन्न, शूरवीर, सत्यशाली तथा पराक्रमी व्यक्तिके विषयमें आपसमें मन्त्रणा की। तब उन्होंने राजाके द्वारा पहलेसे निश्चित किये गये राजाके दायाद अर्थात् रक्तसम्बन्धसे उत्तराधिकारी बान्धव दुर्धर्षके महान् बलसम्पन्न साम्ब नामक क्षेत्रज पुत्रको राजगद्दीपर बैठानेका निश्चय करके सभी पुरवासियों तथा जनपदनिवासियों एवं ब्राह्मणोंसे पूछकर और उनकी आज्ञा प्राप्तकर शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्नमें नाना प्रकारकी सामग्रियोंद्वारा ब्राह्मणोंके साथ उसका राज्याभिषेक कर दिया ॥ १६-१९ ॥
व्यासमुनि बोले—हे पितामह ! हे कृपानिधे ! आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप बतलायें कि साम्ब क्षेत्रज पुत्रके रूपमें कैसे उत्पन्न हुआ और वह किस जातिका था ? ॥ २० ॥
३३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
ब्रह्माजी बोले— हे मुने ! पुत्रप्राप्तिके लिये दुर्धर्षने | कर दिया। उन दोनों अमात्योंने उसे नीतिकी शिक्षा दी, बहुत प्रकारके प्रयत्न किये, किंतु दुर्दैवके कारण उन्हें कोई | किंतु उसने उनके वचनोंको नहीं माना ॥ २६-२७ ॥ भी पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। एक धीवरमें आसक्त मनवाली | उन दोनों दयालु अमात्योंने बार-बार उसे समझाया उसकी पत्नी प्रमदाने शुभ मुहूर्तमें पुत्रको उत्पन्न किया, किंतु | तो उसने रुष्ट होकर उन दोनोंको जंजीरसे बाँध दिया। कोई जान नहीं सका कि वह जारज पुत्र है ॥ २१-२२ ॥ | माता-पिताने उस हृदयहीन पुत्रको समझाते हुए कहा— उन दोनों अमात्योंने जितने भी राजचिह्न थे, सभी | अरे दुष्ट ! जिनके कृपाप्रसादसे तुमने निष्कंटक राज्य प्राप्त उस साम्ब नामक पुत्रको प्रदान किये। राजकोषसहित | किया, उन दोनों सज्जन अमात्योंको तुमने बन्धनमें डाल सम्पूर्ण राष्ट्र और सारा राज्य उसे प्रदान कर दिया ॥ २३ ॥ | दिया? किंतु उस दुष्टने माता-पिताके भी अमृतमय वे दोनों अमात्य जिस प्रकार पहले स्थित थे, उसी | वचनोंका उल्लंघन करके उन दोनोंको बन्धनमें डालकर प्रकार अमात्य पदपर प्रतिष्ठित हुए। राज्य प्राप्तकर | उन्हें भी कारागारमें डाल दिया ॥ २८—२९१/२ ॥ दुर्धर्षका पुत्र वह साम्ब राजलक्ष्मीके कारण उन्मत्त हो | उसका दुष्टबुद्धि नामक अत्यन्त दुष्ट मित्र निरन्तर गया। स्त्री, मांस तथा मदिरामें आसक्त वह साम्ब | उसके साथ रहता था। साम्बने उसीको अपना सचिव हाथीकी भाँति आलसी हो गया। वह प्रतिदिन दुराचरणमें | बनाया और उसे अश्व, सुवर्ण, घोड़े, विविध रत्न, दिव्य परायण रहने लगा और नीतिके मार्गसे पराङ्मुख हो | वस्त्र, रंकु जातिके हिरणोंके बालोंसे बने ओढ़नेके वस्त्र, गया ॥ २४-२५ ॥ | असंख्य दासी-दास, वाहन, ग्राम, नारिक आदि खाद्य उसने धनिकोंका सारा धन लेकर उन्हें राज्यसे | प्रदान किया और यह भी घोषणा करवायी कि जो बाहर निकाल दिया और वह ब्राह्मणों तथा सत्पुरुषोंका | इसकी आज्ञाका पालन नहीं करेगा, उसका सिर बलपूर्वक अपमान करने लगा। उसने उनकी वंश-परम्परासे चली | काट दूँगा। सभी लोगोंसे ऐसा कहकर साम्ब अन्तःपुरमें आ रही आजीविकाका हरणकर उन्हें राज्यसे बाहर निर्वासित | चला गया ॥ ३०—३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'अमात्यनिग्रह' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय राजा साम्ब तथा दुष्टबुद्धिके जन्म-जन्मान्तरोंकी कथा, उनके द्वारा अनजानमें किये गये शमीपत्रके पूजनसे गजाननका प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य देह प्राप्त कराकर स्वर्गलोक प्राप्त कराना
ब्रह्माजी बोले— राजा साम्बका वह दुष्टबुद्धि | जो भी यौवनवती स्त्री उसके दृष्टिपथमें आती थी, नामक अमात्य राज्यका कार्य करता था और स्वयं साम्ब | वह कामी साम्ब उसके साथ विषयोपभोगमें निरत हो केवल सुन्दर स्त्रियोंका संग करता था। वह राज्यमें जिस | जाता था। वह पराये धन तथा परायी स्त्रीको बलपूर्वक स्त्रीके विषयमें सुनता था कि वह सुन्दर है, चाहे वह | ग्रहण कर लेता था। उसका वह मन्त्री दुष्टबुद्धि भी विवाहित हो या अविवाहित हो, सधवा हो अथवा | उसीके समान दुर्गुणोंवाला तथा कुमार्गमें परायण रहनेवाला विधवा हो, वह उसके परिजनोंके रोने-चिल्लानेपर भी | था ॥ ३-४ ॥ दुराचार करनेके लिये बलात् उसका अपहरण कर लेता | इस प्रकार दुराचारपरायण वे दोनों निर्दयी कन्या, था। वह विषयलम्पट जातिभेदका भी विचार नहीं करता | माता तथा बहिनका भी परित्याग नहीं करते थे ॥ ५ ॥ था॥ १-२॥ | वे दोनों न तो ब्रह्महत्या, न स्त्रीहत्या और न
क्री०ख०-अ०२८ ] * राजा साम्ब तथा दुष्टबुद्धिके जन्म-जन्मान्तरोंकी कथा * ३३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
बालहत्याका ही विचार करते थे। इस प्रकार पापपरायण तथा दूषितबुद्धिवाले वे दोनों राजा और अमात्य पापके पर्वतके समान अत्यन्त दुःसह हो गये थे। उनके घरमें भिक्षा लेने न कोई ब्राह्मण जाता था और न कोई संन्यासी ही ॥ ६-७ ॥ पूरे राज्यमें भी कोई न तो राजाका नाम लेता था और न कोई मन्त्रीका। एक बारकी बात है, वे दोनों आखेट करनेके लिये एक गहन वनमें प्रविष्ट हुए ॥ ८ ॥ उन्होंने मृगोंके समूहों तथा अनेक प्रकारके पक्षियोंके समूहोंका वध किया। फिर वे दोनों उन्हें नगरके लिये भेजकर स्वयं घोड़ेपर सवार होकर वापस आने लगे ॥ ९ ॥ [तभी] मार्गमें उन्होंने विनायकका एक विशाल मन्दिर देखा, जिसमें देव विनायककी अत्यन्त मंगलमयी जीर्ण मूर्ति विद्यमान थी। श्रीरामके पिता दशरथजीने पुत्रप्राप्तिके लिये तप करते समय उस मूर्तिको स्थापित किया था। [वहाँ] उन्होंने विनायकके दशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए बहुत दिनोंतक ध्यान किया था ॥ १०-११ ॥ यहींपर भगवान् विनायक उनकी भक्तिसे प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूपसे प्रकट हुए थे। उन्हें वर प्रदानकर उन देवने उनकी मनोकामना पूर्ण की थी तथा आज भी वे अभिलषित वर प्रदान करते हैं ॥ १२ ॥ राजा दशरथने महर्षि वसिष्ठके हाथों इस दृढ़ मूर्तिकी स्थापना करवायी थी। तब वसिष्ठमुनिने 'वरद विनायक' इस मूर्तिका नाम रखा। इनके दर्शनसे, इनका स्मरण करनेसे अथवा इनका पूजन करनेसे मनुष्योंको धर्म-अर्थ-काम तथा मोक्ष-चतुर्विध पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकार महर्षि वसिष्ठजीके वचनके अनुसार यह स्थान पृथ्वीमें प्रसिद्ध हुआ। श्रीगणेशजीकी सेवा करनेसे, उनका स्मरण करनेसे तथा उनका पूजन करनेसे श्रीदशरथजीको राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामक चार पुत्र एक ही साथ प्राप्त हुए। वे चारों लोकमें अत्यन्त प्रसिद्ध, सर्वज्ञ तथा शूरवीरोंके मान्य थे ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार अत्यन्त रमणीय तथा राजा (दशरथ)- के द्वारा निर्मित कराये गये उस मन्दिरका दर्शनकर वे दोनों राजा तथा अमात्य घोड़ेसे उतर पड़े और उन्होंने [पूर्वके पुण्यवश] सभी पापोंको विनष्ट करनेवाले प्रभु श्रीगणेशजीका पत्रों तथा पुष्पोंद्वारा पूजन किया और उन्हें प्रणाम किया। उन विभुकी प्रदक्षिणा करके वे क्षणमात्रमें वहाँसे चले गये। उन दोनोंका यह पुण्यकार्य दैववश ही हो गया था। इस प्रकार पापपरायण वे दोनों राजा तथा मन्त्री राज्य करनेके बाद मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १७-१९ ॥ यमदूतोंके द्वारा पाशोंसे बाँधकर उन्हें यमराजके पास ले जाया गया। तब यमराजने चित्रगुप्तको बुलाकर उनके शुभ-अशुभ कर्मोंके विषयमें पूछा ॥ २० ॥ वे बोले- हे सूर्यपुत्र यमराजजी ! इन दोनोंका पुण्य तो लेशमात्र भी नहीं है और इनके पापोंकी गणना भी नहीं है। इसपर यमराज दूतोंसे बोले। इन दोनोंको बाँधो- बाँधो और लोहेके दण्डसे मारो और हजारों वर्षोंतकके लिये अवीचिमय नरककुण्डमें डाल दो ॥ २१-२२ ॥ इस प्रकार एक-एक नरककुण्डमें क्रमशः इनके अपने संचित पापकर्मोंका भोग करवाकर इन्हें मृत्युलोकमें नीच योनिमें डाल दो ॥ २३ ॥ हे दूतो! इन दोनोंका थोड़ा-सा पुण्यकर्म है। उसे तुम लोग सुनो। इन दोनोंने प्रसंगवश भगवान् गजाननका दर्शन किया है और उनका पूजन भी किया है ॥ २४ ॥ उसी पुण्यकर्मके कारण वे गजानन ही वहाँसे इनका उद्धार करेंगे। यमके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उन दूतोंने उन्हें दृढ़तापूर्वक बाँधकर मारा ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् दूतोंने उन दोनोंको क्रमशः सौ-सौ वर्षोंतक कुम्भीपाक, शोणितोद, रौरव, कालकूट, तामिस्र, अन्धतामिस्र, पूयशोणितकर्दम आदि नरकोंमें डाला। कण्टक नामक नरकमें उनके अंग छिद गये, तप्तबालुक नामक नरकमें वे संतप्त हो उठे ॥ २६-२७ ॥ सूचीमुख नामक नरकमें वे दोनों सूईके समान तीखे मुखवाले कीड़ोंके द्वारा बार-बार काटे गये। तदनन्तर उन्हें महाभयंकर असिपत्रवन नामक नरकमें डाला गया। वहाँपर शस्त्रोंके आघातसे पापियोंका शरीर छिन्न-भिन्न हो जाता है। तदनन्तर तप्तशिला नामक नरकमें उन दोनोंको घनकी चोटसे पीटा गया ॥ २८-२९ ॥
सहीं। उन दोनोंके सम्पूर्ण दुःखोंका वर्णन करनेमें शेषजी
३३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उन दोनोंने बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंकी यातनाएँ सहीं। उन दोनोंके सम्पूर्ण दुःखोंका वर्णन करनेमें शेषजी भी समर्थ नहीं हैं। इस प्रकारसे हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारके दुःखोंको भोगकर पापोंका भोग हो जानेके बाद उन्होंने शेष पापोंको भोगनेके लिये पृथ्वीपर जन्म लिया ॥ ३०-३१॥ इस जन्ममें एकने कौएकी योनिमें जन्म लिया तो दूसरा उलूक योनिमें उत्पन्न हुआ। दूसरे जन्ममें एक मेढक हुआ तो दूसरेने गिरगिटकी योनिमें जन्म लिया ॥ ३२॥ अगले जन्ममें एक विषधर सर्प हुआ तो दूसरा बिच्छू बना। उन योनियोंमें भी उन दोनोंने पापकर्म करते हुए अनेक लोगोंको काटा ॥ ३३ ॥ तदनन्तर वे दोनों कुत्ते तथा बिल्लीकी योनिमें, फिर नेवले तथा सूकरकी योनिमें, तदनन्तर भेड़िये तथा सियारकी योनिमें, फिर घोड़े और गधेकी योनिमें उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् वे दोनों ऊँट और हाथी बने, तदनन्तर मगरमच्छ तथा महान् मत्स्य बने, तदनन्तर बाघ और मृग और फिर बैल तथा महिषकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकारसे नाना योनियोंमें भटकते हुए वे चाण्डाल तथा कीटककी योनिमें उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् अन्तमें राक्षस तथा भील (व्याध)-की योनिमें उन्होंने जन्म लिया। इस जन्ममें साम्ब नामक राजा दुर्बुद्धि (भीम) नामवाला व्याध बना और दुष्टबुद्धि नामक वह अमात्य पिंगाक्ष नामक राक्षसके रूपमें भूतलमें प्रसिद्ध हुआ। जन्मभर केवल पाप ही करनेवालेकी चर्चामें बहुत दोष बताये गये हैं॥ ३६-३७ ॥ जब वे दोनों राजा साम्ब और दुष्टबुद्धि नामक अमात्य पूर्वकालमें पापपरायण थे, तो उन्हीं दिनों एकबार आखेटके लिये जाते समय उन दोनोंसे एक पुण्यकर्म भी बन गया था ॥ ३८ ॥ उन्होंने भगवान् विनायकका दर्शन किया। उन्हें प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा की, साथ ही फल, पुष्प आदिके द्वारा उनका अर्चन किया। जिसके कारण गजानन उनपर सन्तुष्ट हो गये ॥ ३९ ॥ उन दोनोंके उस जन्मका वह संचित पुण्य अगाध था। पूर्वकालमें जब वह राक्षस उस भीम नामक व्याधको खानेके लिये आया, तो वह शमीके वृक्षपर चढ़ गया। वहाँ हिलनेसे शमीके पत्ते गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़े। तब गणेशजी दोनोंपर बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥ उन दोनोंको दिव्य देह प्रदानकर उन विभु गजाननने उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति करा दी थी। इस प्रकार उन दोनोंके पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके विषयमें आपको बताया। केवल शमीपत्रमात्रके द्वारा [अज्ञानमें ही हुए] पूजनसे वे गजानन प्रसन्न हो गये। जिस प्रकार कश्यपपुत्र वामनने उन गणेशकी स्थापना की थी और उनके द्वारा किये गये अनुष्ठानके विषयमें तथा जिस प्रकारसे गणनायने प्रसन्न होकर उन्हें वर प्रदान किये, हे मुनि व्यासजी ! वह सब मैं आपको बताता हूँ ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत भीम तथा राक्षसके पूर्वजन्मका वर्णन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥ उनतीसवाँ अध्याय महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपुकी उत्पत्तिका वर्णन, उनकी तपस्या तथा उन्हें वरदानकी प्राप्ति, प्रह्लादपुत्र विरोचनके वधका आख्यान ब्रह्माजी बोले—मैंने कश्यपको आज्ञा दी थी कि आप विविध प्रकारकी सृष्टि करें। महर्षि कश्यप अत्यन्त विनीत, महान् ज्ञानी, भूत-भविष्य तथा वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले, सूर्य तथा अग्निके तेजसे भी अधिक तेजस्वी और उत्तम तपस्याकी निधि थे। उन्होंने सृष्टि करनेकी सामर्थ्य प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त महान् तप किया ॥ १-२ ॥ उन्होंने षडक्षर मन्त्रके द्वारा भगवान् गणेशजीका ध्यान किया। इस प्रकार दिव्य हजार वर्ष बीत जानेपर
क्री०ख०-अ०२९ ] * महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन * ३३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वे देव गजानन उनके लिये वरप्रदाता हुए॥ ३॥ उन्होंने महर्षि कश्यपजीको सभी प्रकारके अभीप्सित विविध वरोंको प्रदान किया था। तब वरदानके प्रभावसे वे जो-जो भी अपने मनमें कल्पना करते थे, उस-उसको शीघ्रतासे अपने समक्ष पाते थे॥ ४१/२॥ उन्होंने अपनी चौदह पत्नियोंमें अनेक बार गर्भाधान करके अपने तेजसे सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की थी। उन चौदह पत्नियोंमें दिति तथा अदिति नामवाली दो पत्नियाँ श्रेष्ठ थीं॥ ५-६॥ भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये अदितिने भी दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। इससे भगवान् जनार्दन सन्तुष्ट हो गये॥ ७॥ उसके तपसे सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णु संसारके पालन-पोषणके लिये, धर्मकी स्थापनाके लिये तथा इन्द्र आदि देवताओं और उनकी सन्ततिकी रक्षा और दुष्टोंके संहारके लिये पहले देवी अदितिके पुत्रके रूपमें अवतरित हुए। तदनन्तर एक समयकी बात है, जब महर्षि कश्यप होम करनेके लिये उद्यत थे। उस समय दितिने अपने स्वामीसे आदरपूर्वक कहा— ॥ ८-९॥ हे भगवन्! मुझे कामाग्नि पीड़ित कर रही है। अतः आप ऋतुदान कीजिये। उसका ऐसा वचन सुनकर महर्षि कश्यप आदरपूर्वक उससे बोले— ॥ १०॥ यह भयंकर सन्ध्याकाल है। इस समय हवन-कार्य उपस्थित है। तुम क्षणभर धैर्य धारण करो। तदनन्तर मैं तुम्हारे साथ रमण करूँगा। इस समय सहवास करनेसे देवताओं तथा धर्मका विरोधी दुष्ट पुत्र उत्पन्न होगा। दिति स्वामीके इस प्रकारके वचन सुनकर उनका हाथ पकड़कर उनके चरणोंमें गिर पड़ी॥ ११-१२॥ लाल-लाल नेत्रोंवाली होकर वह तीनों लोकोंको जला देनेकी इच्छासे बोल पड़ी—हे मुने! इसी समय यदि आप मेरी अभिलाषा पूर्ण नहीं करेंगे तो कामदेवकी अग्निसे विह्वल हुई मैं अपने शरीरका त्याग कर दूँगी। दैवयोगसे मेरा पुत्र देवताओं अथवा धर्मका विरोधी चाहे जैसा भी हो॥ १३-१४॥ उसका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल महर्षि कश्यपने उसे ऋतुदान दिया और फिर स्नान करनेके अनन्तर होम किया॥ १५॥ कालान्तरमें दितिको महान् बलशाली हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन दोनोंने अत्यन्त उत्कट तपस्या की॥ १६॥ पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय)-का बहुत वर्षोंतक जप करते हुए वे दोनों पैरके एक अँगूठेके बलपर खड़े होकर केवल वायुका भक्षण करते रहे। उनके शरीरपर
३४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- दीमकोंने बाँबी बना ली थी ॥ १७ ॥ जब कृपानिधि भगवान् शंकर उन्हें वर प्रदान करनेके लिये उपस्थित हुए, तब उन दोनोंने भक्तिपूर्वक भगवान् त्रिलोचनकी स्तुति की ॥ १८ ॥ अपने हाथ जोड़कर वे दोनों उनके चरणोंपर गिर पड़े और उनके दर्शनके प्रभावसे प्रस्फुटित बुद्धिवाले वे यथाज्ञान यथाशक्ति स्तुति करने लगे ॥ १९ ॥ जो देव वृषभके वाहनपर विराजमान रहनेवाले हैं, दस भुजाओंवाले हैं। ललाटपर अर्धचन्द्रको धारण करनेवाले तथा नागोंसे सुशोभित हैं। जो विविध रूपवाले गणों तथा गिरिराजपुत्री पार्वतीसे समन्वित हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्के कारण हैं। जो बाघम्बर तथा गजचर्म धारण करनेवाले हैं। जिनके तीन नयन हैं, जो त्रिशूलको धारण करनेवाले और कामदेवका दहन करनेवाले हैं। जो भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेके लिये एकमात्र आश्रय- स्वरूप हैं और जो धर्म-अर्थ [, काम] तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं [वे भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों] ॥ २० ॥ इस प्रकार सर्वव्यापी परमेश्वर महादेवकी स्तुति करके उन्होंने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान उन भगवान् शिवको प्रणाम किया ॥ २१ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने प्रसन्न होकर उन दोनोंसे कहा-वर माँगो। तब उन दोनोंने वरोंको माँगते हुए कहा कि देवताओं, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, श्रेष्ठ मनुष्यों, पिशाचों तथा चारण आदि किसी भी योनिके प्राणीके द्वारा हमारी मृत्यु न हो। न शस्त्रोंसे, न गीले पदार्थसे, न शुष्क पदार्थसे, न किसी जन्तु और न किसी जलचर प्राणीके द्वारा ही हमारी मृत्यु न हो। अन्य किसी स्थावर अथवा जंगम प्राणीसे हमारी मृत्यु न हो। हमारी मृत्यु न दिनमें हो, न रातमें हो। न तो पृथ्वीमें हो, न आकाशमें हो, न उन दोनोंके मध्यमें हो और न ही उषाकालमें हमारी मृत्यु हो ॥ २२-२४ ॥ तब भगवान् शिवने 'ऐसा ही होगा' कहा और फिर वे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनोंने पृथ्वी तथा आकाशके मध्यभाग [स्वर्गादि दिव्यलोक] और रसातलपर विजय प्राप्त कर ली ॥ २५ ॥ देवताओंके सभी स्थानोंको बलपूर्वक जीतकर वे वहाँ स्थित हो गये। हिरण्यकशिपुका प्रह्लाद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह दैत्योंके लिये कण्टकके समान था और भगवान् विष्णुके भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ था। भगवान् नारायणका नाम-मन्त्र जपनेपर पिता हिरण्यकशिपुने उसे अत्यन्त प्रताड़ित किया था ॥ २६-२७॥ पिता हिरण्यकशिपुके द्वारा अनेक प्रकारकी यातनाओंके दिये जानेपर उन करुणासागर भगवान् विष्णुने जलमें, स्थलमें और विष तथा अग्निसे उसकी अनेक बार रक्षा की। सभी लोगोंको भय पहुँचानेवाले उस हिरण्यकशिपुको नरसिंहरूप धारण करके श्रीहरिने अपने नाखूनोंके द्वारा सायंकालके समय विदीर्ण कर डाला ॥ २८-२९ ॥ इससे पूर्व भगवान् विष्णुने वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्षद्वारा समुद्रमें डुबोयी गयी पृथ्वीको अपनी दाढ़ोंके ऊपर उठाकर यथास्थान स्थित किया। प्रह्लादका पुत्र विरोचन हुआ और उसका पुत्र हुआ बलि ॥ ३० ॥ विरोचन भगवान् सूर्यका भक्त था। उसने उनसे मुकुट प्राप्त किया था। सात अश्वोंवाले रथमें आसीन रहनेवाले भगवान् सूर्यने विरोचनसे कहा था कि इस मुकुटपर यदि किसी दूसरेके हाथका स्पर्श होगा तो यह नष्ट हो जायगा। इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान्
क्री०ख०-अ०३०] * विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान * ३४१
सूर्यके वरके प्रभावसे विरोचनने तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया ॥ ३१-३२॥ अपने स्थानोंसे च्युत हो जानेपर देवता भगवान् अच्युतकी शरणमें गये। भगवान् विष्णु महान् चिन्ता करते हुए भी किसी निश्चयपर नहीं पहुँचे ॥ ३३ ॥ तब उन्होंने स्त्रीका रूप धारण किया, जो सभी स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उस स्त्रीरूपके द्वारा उन्होंने दीर्घकालतक विरोचनको आनन्दित किया ॥ ३४ ॥ तदनन्तर कुत्सित बुद्धिवाला वह विरोचन जब उस स्त्रीरूपके साथ रमण करनेको उद्यत हुआ, तो सुन्दर दाँतोंवाली उस स्त्रीने कहा—भो [दैत्य] ! मेरी भी एक कामना है, वह यह कि पहले तुम अपने शरीरमें तेलका अभ्यंग करो। उसके बाद ही मेरे साथ रमण करो। उस स्त्रीका यह वचन सुनकर कामासक्त विरोचनने वैसा ही किया ॥ ३५-३६ ॥ वह मुकुटको उतारकर सिरमें तेलकी मालिश करने लगा। उसी समय उस मुकुटके सौ टुकड़े हो गये। मुकुटके चूर्ण होनेके समान ही वह विरोचन भी (प्राप्त वरदानके अनुसार) मुकुटकी गतिको प्राप्त हुआ ॥ ३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विरोचनवधवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥
तीसवाँ अध्याय विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान, बलिके द्वारा सौवाँ अश्वमेधयज्ञ करनेपर इन्द्रका चिन्तित होना तथा भगवान् विष्णुको अपनी चिन्ता निवेदित करना, भगवान् विष्णुद्वारा अदितिके गर्भसे वामनरूपमें प्रकट होना
ब्रह्माजी बोले—बलि भगवान् विष्णुका भक्त था, अतः उसे पिता विरोचनकी मृत्युपर कुछ भी सन्ताप नहीं हुआ। बलि वेद तथा वेदांगोंका ज्ञाता, प्रतिभासम्पन्न तथा सभी शास्त्रोंमें पारंगत था। वह परायी निन्दा, पराये द्रव्य तथा परद्रोहसे सर्वथा पराङ्मुख था। वह दानी, यज्ञ करनेवाला तथा माननीय जनोंका बड़े ही आदरके साथ सम्मान करनेवाला था ॥ १-२ ॥ वह चलते हुए, बोलते हुए, सोते हुए, भोजन करते हुए, बैठते हुए, जप करते हुए तथा पीते हुए—इस प्रकार सभी समयोंमें अनन्य मनसे नित्य ही भगवान् विष्णुका ध्यान किया करता था ॥ ३ ॥ एक बार बलिने शुक्राचार्यजीको बुलाकर यथाविधि उनकी पूजा करके उनसे नीति-सम्बन्धी यह प्रश्न पूछा कि हे प्राज्ञ ! इन्द्र अमरावतीका सुख-भोग करते हैं। फिर क्यों नहीं अमरावतीके राज्यमें हमारा भाग है, जबकि इन्द्र आदिके साथ हमारा निरन्तर भाईचारा है? मेरे इस संशयका निवारण करनेमें आप पूर्णरूपसे समर्थ हैं ॥ ४-५ ॥ शुक्राचार्य बोले—हे महाभाग ! तुम्हारे पूर्वजोंने इसी कारण निरन्तर देवताओंसे वैर किया था। देवताओंने भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर नाना प्रकारकी मायाका आश्रय ग्रहणकर उन सभीका वध कर दिया था। अतः तुम वैरभाव छोड़कर भलीभाँति सौ अश्वमेध यज्ञोंको सम्पन्न करो। उस पुण्यबलके प्रभावसे तुम निश्चित ही पूर्ण ऐन्द्रपदको प्राप्त कर लोगे ॥ ६-७१/२ ॥ बलि बोला—हे ब्रह्मन् ! आप नीतिशास्त्रमें अत्यन्त कुशल हैं। आपने अच्छी बात बतायी है। साम, दान तथा भेदनीतिको छोड़कर चौथी नीति निग्रह (दण्ड-युद्ध)- को निकृष्ट माना गया है। चौथा वह उपाय दण्डनीति भी पुण्यके प्रभावसे ही सफल हो पाता है, अतः [उसमें भी] पुण्यको ही प्रबल माना गया है ॥ ८-९ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारका निश्चय करके राजा बलिने वसिष्ठ आदि महर्षियोंको बुलाया और भृगु आदि उन सभी मुनियोंकी पूजा करके उसने बहुत प्रकारकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होनेवाले तथा सभीको आनन्द प्रदान करनेवाले श्रेष्ठ अश्वमेधयज्ञका प्रारम्भ किया। उन सभी ऋषि-मुनियोंने [शास्त्रीय रीतिसे] पूर्व दिशाका निर्धारण करके यज्ञकुण्डोंका निर्माण किया। सामग्रियोंका संचयन करवाया और भूमिका शोधन करके वेदी तथा
३४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मण्डप आदिका निर्माण कराया ॥ १०—१२॥ उन सभी ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन करके आभ्युदयिक श्राद्ध (नान्दीश्राद्ध) तथा मातृकापूजन करनेके अनन्तर विविध प्रकारके तत्तद् मन्त्रोंके द्वारा बड़े ही आदरभावपूर्वक सभी मण्डप-देवताओंका स्थापन किया ॥ १३१/२ ॥ उस यज्ञमण्डपमें राजा बलि और उनकी धर्मपत्नी— दोनों दम्पती श्वेत वस्त्रोंसे विभूषित एवं [अलंकारादिसे] अलंकृत होकर सुशोभित हो रहे थे। सभी मन्त्रीगण, राजपरिवारके मित्रगण तथा पुरवासी जनोंसे वे घिरे हुए थे। नगरकी सम्मानित स्त्रियाँ झरोखोंसे उस महोत्सवको देख रही थीं ॥ १४-१५ ॥ यज्ञके लिये वरण किये गये ब्रह्मा (यज्ञकी रक्षाके लिये कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित रहनेवाले ब्राह्मण आचार्य)-द्वारा अन्वारब्ध किये गये अर्थात् कुशसे स्पर्श किये जाते हुए उन ब्राह्मणोंने यज्ञका पूर्वांग कर्म अर्थात् पंचांग-पूजन आदि सम्पन्न किया। तदनन्तर उन्होंने वेद-कल्पोंके वचनोंके अनुसार यज्ञीय पशुका आलभन किया ॥ १६ ॥ तदनन्तर उन्होंने उन-उन देवताओंके निमित्त उनके मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक आहुतियाँ प्रदान कीं। चार द्वारोंवाले उस यज्ञमण्डपके परिसरके मार्गमें तीनों वर्णोंके सभी लोग सम्मानित होकर बिना रोक- टोकके आवागमन कर रहे थे। वहाँ एक ओर विद्वज्जनोंका विवादपूर्वक शास्त्रार्थ चल रहा था ॥ १७-१८॥ कहीं अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और कहीं वैदिक जन वेदमन्त्रोंका पाठ कर रहे थे। कहींपर शैव तथा वैष्णव भक्त मृदंग तथा ताल-वादनके साथ गीतोंका गान कर रहे थे। कहींपर ब्राह्मणजन अपनी इच्छाके अनुसार छः रसोंसे युक्त व्यंजनोंका सेवन कर रहे थे और नाना प्रकारकी कथाओंको कह रहे थे। जिसे सुनकर श्रोतागण अत्यन्त आनन्दित हो रहे थे ॥ १९-२० ॥ इस प्रकारसे उस यज्ञके सम्पादित हो जानेपर वसिष्ठ आदि महर्षियोंने अग्नियोंमें घृतकी विशाल धारा (वसोर्धारा) डाली। तदनन्तर उत्तरंग कर्मोंके समापनके पश्चात् उन दोनों दम्पती (बलि तथा उनकी पत्नी)-को रथमें विराजमानकर अवभृथ स्नान (यज्ञान्तमें किया जानेवाला स्नान) करानेके लिये सभी लोग साथमें गये। उस समय नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी। श्रेष्ठ बन्दीजनोंद्वारा स्तुतिगान हो रहा था। बहुत प्रकारसे वेदध्वनियोंका उच्चारण हो रहा था तथा भगवान्को प्रिय लगनेवाले सामोंका गायन हो रहा था ॥ २१-२३ ॥ स्नान करनेके अनन्तर वापस आकर राजा बलिने भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा उन वसिष्ठ आदि महर्षियोंको अनेक प्रकारके रत्नसमुदाय, सम्पत्तियाँ, अनेक वस्त्र, गौएँ, घोड़े, हाथी, विविध प्रकारके सुगन्धित पदार्थ और इच्छापूर्ति करनेवाली वस्तुएँ प्रदानकर सन्तुष्ट किया। इस प्रकारसे उन ब्राह्मणोंने राजा बलिके निन्यानबे यज्ञ पूर्ण किये ॥ २४-२५ ॥ सौवाँ यज्ञ प्रारम्भ होनेपर देवराज इन्द्र अत्यन्त चिन्तित हो उठे। अपना इन्द्रपद छीने जानेकी आशंकासे वे इन्द्र क्षीरसागरके मध्य विराजमान रहनेवाले अपने कनिष्ठ भ्राता (उपेन्द्र विष्णु) शेषशायी भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। उस समय उन विष्णुके चरणोंकी मैं ब्रह्मा स्वयं सेवा कर रहा था। वे देवताओंद्वारा सेवित हो रहे थे। वीणा हाथमें धारण करके देवर्षि नारद तुम्बुरु आदि अन्य प्रमुख गन्धर्वों, अप्सरासमूहों तथा किन्नरगणोंसहित बड़े ही आदरपूर्वक उनका गुणगान कर रहे थे ॥ २६-२८ ॥ ऐसे उन भगवान् विष्णुका दर्शनकर इन्द्रने दोनों हाथ जोड़कर अपने अभीप्सित कार्यकी सिद्धिके लिये बड़े ही आदरभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९ ॥ इन्द्र बोले—हे अनन्तशक्ति! आपको नमस्कार है। विश्वके योनिस্বরূপ आपको नमस्कार है। विश्वका भरण-पोषण करनेवालेको नमस्कार है। विश्वकी सृष्टि करनेवालेको नमस्कार है, हे दैत्योंके विनाशक ! आपको नमस्कार है। अनेक स्वरूपोंवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंके मनोभिलषित पदार्थोंको उन्हें प्रदान करनेवालेको नित्य नमस्कार है ॥ ३० ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति करनेके अनन्तर देवराज इन्द्रने बलिके द्वारा किये जा रहे सौवें अश्वमेध
यहाँ पृष्ठ पर अंकित सम्पूर्ण पाठ का पंक्तिवार लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
क्री०ख०-अ०३१ ] * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना * ३४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[पूर्वार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]
यज्ञके प्रयत्नके विषयमें बताते हुए कहा—विरोचनका पुत्र बलि तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ३१॥ वह सौवाँ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कर लेनेके अनन्तर मेरे इन्द्रपदको ले लेगा। जब वे इतना कह ही पाये थे कि भगवान् विष्णुने सब कुछ जान लिया ॥ ३२॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने इन्द्रके कष्टके विषयमें चिन्ता करते हुए उनसे कहा—हे इन्द्र! राजा बलि मेरा भक्त है। वह तपस्वी है तथा उसने अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है। वेदवचनोंके अनुसार उसे तपस्याके शुभ फलको प्राप्त करना चाहिये। शुभ या अशुभ जो भी कर्म किया जाता है, वह निष्फल नहीं होता ॥ ३३-३४ ॥ हे इन्द्र ! तुम अपना चित्त स्थिर करो। मैं तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा। तदनन्तर वे प्रभु देवी अदितिके गर्भमें आये। देवी अदितिने नौवें मासमें शुभ पुत्रको जन्म दिया। उस शिशुकी प्रभासे प्रसवगृहके वे दीपक निष्प्रभ हो गये ॥ ३५-३६ ॥ बुद्धिमान् कश्यपजीने शीघ्र ही शीतल जलसे स्नान करनेके अनन्तर स्वस्तिवाचनपूर्वक उस बालकका यथाविधि जातकर्म-संस्कार किया। तदनन्तर मातृपूजन करनेके अनन्तर नान्दीमुख श्राद्ध करके बालकको घृत तथा
[पूर्वार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]
मधुका प्राशन कराकर उसको देखा ॥ ३७-३८ ॥ उस बालकको ह्रस्व किंतु प्रशस्त मस्तकवाला, छोटे पैर, विशाल शरीरयुक्त एवं दिव्य ज्ञानसे समन्वित, दिव्य देहवाला, चार भुजाओंवाला तथा विविध प्रकारके अलंकरणोंसे समन्वित देखकर कश्यपजीने उसे साक्षात् विष्णु समझकर उसको प्रणाम किया और आनन्दित होकर कहा—आज मेरा तप, मेरा वंश, मेरे नेत्र, मेरा ज्ञान तथा मेरा यह आश्रम धन्य हो गया है। आप सच्चिदानन्द-स्वरूपका दर्शनकर आज यह धरती, स्वर्ग और रसातल भी धन्य हो गया है ॥ ३९-४१ ॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षि कश्यपके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे जगदीश्वर बोले—माता अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न होकर पृथिवीके महान् भारका हरण करनेके लिये तथा बड़े भ्राता देवराज इन्द्रके कार्यको सफल बनानेके लिये मैं आपके यहाँ पुत्ररूपमें प्रकट हुआ हूँ। ऐसा कहकर वे सामान्य बालक बनकर रोने लगे और उन्होंने माताके स्तनोंका पान किया ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनिने उस बालकका नामकरण, निष्क्रमण तथा अन्नप्राशन-संस्कार किया। तदुपरान्त तीसरे वर्षमें चूडाकरण और पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत- संस्कार सम्पन्न किया ॥ ४४ ॥
[अध्याय समाप्ति एवं नवीन अध्याय शीर्षक]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वामनावतार-वर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥ ——— ❖ ——— इकतीसवाँ अध्याय पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना, वामनद्वारा गणेशकी आराधना, गणेशका प्रकट होकर वामनको दर्शन और अनेक वर देना, वामनभगवान्द्वारा बलिके यज्ञमें पधारना और तीन पग भूमिका दान प्राप्तकर अपने भक्त बलिको पाताल भेजना, वामनद्वारा स्थापित सुमुख नामक गणेश-प्रतिमाका माहात्म्य
[उत्तरार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]
ब्रह्माजी बोले—मुनि कश्यपजीने शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष—इन षट् अंगोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन बालक वामनको करवाया। एक दिन वामनने अपने पिताजीसे पूछा—[हे तात !] किस उपायके द्वारा देवताओं [-को उन]-के पदकी प्राप्ति होगी और पृथ्वीके भारका हरण कैसे होगा? उसे
[उत्तरार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]
आप मुझे यथार्थरूपसे बतलाइये ॥ १-२ ॥ कश्यप बोले—हे मेरे पुत्र! मैं तुम्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्रदान करूँगा, वह मन्त्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है और गणेशजीको प्रसन्न करनेवाला है। जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले, अनेक ब्रह्माण्डोंकी संरचना करनेवाले तथा सभी कारणोंके भी
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
[शीर्षक एवं पृष्ठ संख्या] ३४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
कारणके महाकारणरूप उन विघ्नेश्वर गणेशजीके प्रसन्न हो जानेपर सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, अतः तुम उन्हें प्रसन्न करनेका यत्न करो ॥ ३-४ १/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**ऐसा कहकर मुनि कश्यपने उन्हें शुभ मुहूर्तमें गणेशजीका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ५ ॥ उसी समय वे बालक वामन मुनि कश्यपको प्रणामकर तथा उनसे आज्ञा प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक तपस्याहेतु उस आश्रमसे चल पड़े ॥ ६ ॥ इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने विदर्भदेशमें एक उत्तम स्थान देखा, जो लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा हुआ था और सरोवरसे सुशोभित था ॥ ७ ॥ वहाँ पद्मासनमें स्थित होकर बालक वामनने निराहार तथा जितेन्द्रिय होकर संवत्सरपर्यन्त उस शुभ षडक्षर मन्त्रका जप किया। उन बालक वामनकी वैसी निर्वाणावस्था (मनोयोग) देखकर भगवान् गणेश सिद्धि- बुद्धिके साथ प्रकट हुए। वे मयूरपर आरूढ़ थे तथा लम्बी सूँड़से सुशोभित हो रहे थे ॥ ८-९ ॥ उनकी दस भुजाएँ शोभित हो रही थीं, वे रत्नोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनकी नाभि विषधर सर्पसे सुशोभित हो रही थी। वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित थे ॥ १० ॥ दृढ़ निष्ठावाले अपने भक्तके पास वे उसी प्रकार आये, जैसे कोई धेनु अपने बछड़ेके समीप आती है। वामन अपने समक्ष अपने तेजसे सभी तेजोंको निष्प्रभ बना देनेवाले, सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले तथा सभी प्रकारके विघ्नोंका निवारण कर देनेवाले देवाधिदेव भगवान् गजाननका दर्शनकर अत्यन्त भक्तिभावसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११-१२ ॥ **वामन बोले—**मैं उन विघ्नराजकी वन्दना करता हूँ, जो स्वयं अव्यक्त हैं, किंतु (दृश्यमान जगत्के) कारणरूप हैं, जिनके स्वरूपकी वेदोंद्वारा वन्दना की गयी
[दायाँ स्तम्भ]
है, जो सभी देवोंके अधिदेव हैं, अनन्त ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, सभी वेदान्तोंके द्वारा वेद्य हैं, मायासे परे हैं, स्वसंवेद्य हैं, जगत्का पालन तथा लय करनेवाले हैं, सभी विद्याओंके निधान हैं, सर्वेश्वर हैं, सर्वरूप हैं, सभी प्रकारके भयोंका निवारण करनेवाले हैं तथा जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त कमनीय है। नागोंके सहित ब्रह्मा, शंकर तथा मुनिजनोंद्वारा जो नित्य सेवित होते रहते हैं, जो तेजकी राशि हैं, तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले सत्स्वरूप हैं, तीनों गुणोंसे रहित अर्थात् गुणातीत हैं, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा बोध्य हैं, अपने भक्तोंके इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं, अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञानके प्रकाशक हैं, साम्ब आदिके द्वारा स्तूयमान हैं और जो सभी जीवोंके देहमें स्थित रहनेवाले तथा भुक्ति एवं मुक्तिको प्रदान करनेवाले हैं* ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकारसे स्तुति किये गये वे देवाधिदेव गजानन प्रसन्न होकर वामनसे बोले—मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, वैसा तुम वर माँगो। मैं तुम्हारी तपस्या तथा इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर वह तुम्हें प्रदान करूँगा ॥ १५ ॥ **वामन बोले—**हे जगदीश्वर! आपके यथार्थ स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता तथा सनक-सनन्दन आदि ब्रह्मर्षिगण भी नहीं जानते हैं, आज आपके उसी स्वरूपका मुझे दर्शन हुआ है, फिर आपसे मैं अन्य किसी दूसरे वरकी क्या याचना करूँ? ॥ १६ ॥ फिर भी आपका वचन भंग न हो, इस भयसे मैं आपसे वर माँगता हूँ। हे नाथ! उसे आप मुझे प्रदान करें। मुझे कभी भी पराजय प्राप्त न हो और सम्पूर्ण कार्योंमें मुझे विघ्नका कोई भय न हो ॥ १७ ॥ राजा बलि यज्ञके प्रभावसे इन्द्रके पदको प्राप्त
[पाद-टिप्पणी (मूल संस्कृत श्लोक)]
* अव्यक्तं व्यक्तहेतुं निगमनुततनुं सर्वदेवाधिदेवं ब्रह्माण्डानांमधीशं जगदुदयकरं सर्ववेदान्तवेद्यम्। मायातीतं स्ववेद्यं स्थितिविलयकरं सर्वविद्यानिधानं सर्वेशं सर्वरूपं सकलभयहरं कामदं कान्तरूपम् ॥ तं वन्दे विघ्नराजं विधिवरमुनिभिः सेव्यमानं सनागैः तेजोरार्शि त्रिसत्यं त्रिगुणविरहितं तत्त्वमस्यादिबोध्यम्। भक्तेच्छोपात्तदेहं निजजनसुखदं तत्त्वबुद्धिप्रकाशं साम्बाद्यैः स्तूयमानं सकलतनुगतं भुक्तिमुक्तिप्रदं तम् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३१।१३-१४)
क्री०ख०-अ०३१ ] * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना * ३४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
३४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- हे ब्रह्मन्! मैंने भूमि दे दी, [तब] संकल्प करवानेके | पदसे निवृत्त हो जानेके पश्चात् तुम ही उस पदको प्राप्त लिये उद्यत वामनने राजा बलिसे कहा- संकल्प कीजिये। | करोगे। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता उन प्रभु भगवान् उसी समय शुक्राचार्य दूसरा रूप धारणकर संकल्पजलकी | वामनकी स्तुति करने लगे ॥ ४१-४२ ॥ धाराको रोककर वैसे ही स्थित हो गये। तब राजा बलिने | देवताओंने उनके ऊपर पुष्पवर्षा की और वे विविध उस जलपात्र (कमण्डलु)-की टोंटीके अन्दर एक | वाद्योंको बजाने लगे। उन सबने भगवान् वामनकी पूजा तिनका प्रविष्ट कराया, जिससे भग्ननेत्र होकर शुक्राचार्य | की, उनके गीत गाये तथा दूसरे देवता नृत्य करने लगे। बाहर निकल आये ॥ ३५-३६ ॥ | तदनन्तर अनन्त पराक्रमवाले वे वामन भगवान् अन्तर्धान तब उन वामनके हाथमें बलिने संकल्पजल दिया। | हो गये। प्रसन्नमन होकर देवतागण जहाँसे आये थे, आनन्दविभोर होते हुए वामनने भगवान् गणेशका स्मरण | वहाँ-वहाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ४३-४४॥ किया और वे बढ़ने लगे। तदनन्तर अपने सिरसे | ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार देव वामनद्वारा स्थापित स्वर्गलोकका अतिक्रमणकर उन्होंने एक पैरसे आकाश | की गयी भगवान् गणेशजीकी वह मूर्ति तीनों लोकोंमें और पृथ्वीको तथा दूसरे पैरसे सभी पातालोंको नापकर | विख्यात हो गयी। वह मूर्ति मनुष्योंको सब प्रकारकी तीसरा पग बलिके मस्तकपर रख दिया ॥ ३७-३८ ॥ | कामना प्रदान करनेवाली है॥ ४५ ॥ तब भगवान् वामन बलिसे बोले—तुम पाताललोकमें | इस प्रकार मैंने राजा बलिके द्वारा की गयी सभी जाओ। तदनन्तर राजा बलिने उनसे कहा- आपको छोड़कर | चेष्टाओंका प्रसंगानुसार वर्णन किया। साथ ही भगवान् मैं कैसे जाऊँ? राजा बलिका यह वचन सुनकर भगवान् | वामनके बुद्धिकौशल तथा चातुर्यका और सुमुख गजाननकी वामन उनसे पुनः बोले- तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करनेके | महिमाका भी प्रतिपादन किया। उन महात्मा वामनने लिये तुम्हें मेरा सान्निध्य वहाँ भी प्राप्त होगा ॥ ३९-४० ॥ | रेवानदीके दक्षिण भागमें स्थित अदोष नामक नगरमें दस देवराज इन्द्र मेरी शरणमें आये थे, अतः मुझे | भुजाओंवाले उन सुमुख गजाननकी स्थापना की। अब उनका प्रिय करना था। तुम मेरे भक्त हो, अतः इसके | मैं उन भगवान् विनायकको शमीके प्रिय होनेके विषयमें अनन्तर तुम्हारा भी प्रिय होगा। देवराज इन्द्रके ऐन्द्र | स्पष्ट रूपसे आपसे वर्णन करूँगा ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बलिचेष्टित' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ बत्तीसवाँ अध्याय गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य, राजा प्रियव्रतका आख्यान, उनकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्तिद्वारा गणेशजीकी आराधना ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् व्यासजी ! आप सावधान | शमीपत्रको अर्पण करनेसे होती है ॥ २-३ ॥ होकर उस प्राचीन इतिहासको सुनिये, जिसे स्वयं | 'शमी' इस नामके उच्चारणमात्रसे ही वाणीद्वारा भगवान् गणेशजीने प्रियव्रतसे कहा था ॥ १ ॥ | किया गया समस्त पाप नष्ट हो जाता है। शमीका स्मरण गजानन बोले- हे आर्य! आप शमीपत्रकी महान् | करनेसे मानस पाप तथा उसका स्पर्श कर लेनेसे फलप्रद महिमाको सुनिये। न यज्ञोंके द्वारा, न दानोंसे, न | शारीरिक पाप नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ सैकड़ों-करोड़ व्रतोंसे, न जपोंसे अथवा न विविध | शमीका नित्य पूजन करनेसे, उसका ध्यान करनेसे प्रकारके पूजनोंसे, न कमलपुष्पोंके अर्पणसे और न अन्य | तथा श्रद्धाभक्तिसे उसका वन्दन करनेसे निर्विघ्नता, पुष्पोंसे मुझको वैसी सन्तुष्टि प्राप्त होती है, जैसी कि | आयुष्य तथा ज्ञानकी प्राप्ति होती है और पापका क्षय
क्री०ख०-अ०३२ ] गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य ३४७
क्री०ख०-अ०३२ ] * गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य * ३४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
भी हो जाता है। समस्त इच्छाओंकी पूर्ति हो जाती है और मनकी चंचलता दूर हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ५ १/२ ॥ मुनि व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! राजा प्रियव्रत कौन थे ? उनका कैसा स्वभाव था ? वे कहाँ उत्पन्न हुए थे ? महात्मा गजाननने उनसे शमीके गुणोंका किस प्रकार वर्णन किया था ? हे सुव्रत ! मेरे इस संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ६-७ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! इस विषयमें भी एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है, जो भगवान् शंकर तथा पार्वतीजीके संवादके रूपमें है ॥ ८ ॥
पार्वतीजी बोलीं—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे जगदीश्वर ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है, तो यह बतायें कि गजाननको शमी किस प्रकार प्रिय हुई ? ॥ ९ ॥ भगवान् शंकर बोले—हे प्रिये ! हे पवित्र मुस्कानवाली ! सुनो, मैं एक कथा कहूँगा, जिससे तुमको पता चलेगा कि गणेशजीको शमी कैसे प्रिय हुई ॥ १० ॥ पूर्वकालकी बात है, प्रियव्रत नामके एक महान् बुद्धिशाली राजा थे। वे सत्यवादी, धर्मपरायण, धर्मात्मा, प्रशंसनीय आचरणवाले, तेजस्वी, दान देनेवाले तथा वेद-शास्त्रोंके अर्थतत्त्वको जाननेवाले थे। वे सभी शुभ
लक्षणोंसे सम्पन्न और सर्वाधिक बलशाली चतुरङ्गिणी सेनासे समन्वित थे ॥ ११-१२ ॥ राजा प्रियव्रत अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते थे। उनकी पहली भार्याका नाम कीर्ति था तथा दूसरी भार्याका नाम प्रभा था। उनके धूर्त तथा कुशल नामक दो मन्त्री थे। वे दोनों नीतिशास्त्रमें अत्यन्त कुशल तथा कार्तिकेयके समान पराक्रमवाले थे ॥ १३-१४ ॥ उन्होंने अपनी बुद्धि तथा पराक्रमके बलपर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने अधीन कर लिया। राजा प्रियव्रतको उनकी भार्या प्रभाने अपने वशमें कर लिया था ॥ १५ ॥ राजा प्रियव्रत नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित, युवावस्थाके द्वारा आक्रान्त शरीरवाली तथा रम्भा आदि अप्सराओंसे भी अत्यन्त रमणीय उस प्रभाके साथ रात- दिन नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते रहते थे ॥ १६ ॥ वे क्षणभरके लिये भी उसका वियोग सह नहीं पाते थे। राजा प्रियव्रत अपनी ज्येष्ठ भार्या कीर्तिको सदा धिक्कारते रहते थे और यहाँतक कि उसकी कोई भी बात नहीं सुनते थे ॥ १७ ॥ वे क्रोधपूर्वक उसे देखते थे और उसकी मृत्युके बारेमें सोचा करते थे। वे न तो उससे कुछ बोलते थे और न कुछ उसका दिया हुआ ग्रहण करते थे ॥ १८ ॥ यथासमय उस प्रभाका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो प्रभाके पति अर्थात् राजा प्रियव्रतके समान ही था। राजाने उसका जातकर्म-संस्कार करके अनेक प्रकारके दान- धर्मका आचरण किया ॥ १९ ॥ राजाने ब्राह्मणोंद्वारा बताया गया 'पद्मनाभि' यह नाम उस शिशुका रखा। वह बालक उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षका चन्द्रमा बढ़ता है ॥ २० ॥ वह अपने पितासे भी अधिक बुद्धिमान् तथा युद्धमें अधिक कुशल था। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें पिता प्रियव्रतने उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कर दिया ॥ २१ ॥ मद्रदेशके अत्यन्त बुद्धिमान् तथा बलशाली राजा प्रियव्रतने पांचालनरेशकी कन्याको अपने पुत्रकी भार्या बनानेका निश्चय किया ॥ २२ ॥
३४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अत्यन्त वैभवशाली उन दोनों राजाओंने उन दोनोंका विवाह कर दिया। एक समयकी बात है, राजाकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्ति दास्यभावको प्राप्त होकर पाद-संवहन करनेकी दृष्टिसे पति प्रियव्रतके समीपमें आयी, किंतु सपत्नी प्रभाके द्वारा लात मारे जानेसे भूमिपर गिर पड़ी ॥ २३-२४ ॥ वह दुखी होकर, रोते हुए, लज्जित होते हुए अपने भवनमें चली आयी और सोचने लगी कि मैं अब किसकी शरणमें जाऊँ, कौन मेरे दुःखको दूर करेगा ? ॥ २५ ॥ सपत्नी (सौत)-के द्वारा अपमानित अब मेरे रक्षक स्वयं अव्यय भगवान् करुणासागर श्रीहरि ही होंगे, जो कि केवल स्मरणमात्र करनेसे द्रौपदीके रक्षक बने थे। जिस पत्नीको पति नहीं मानते हैं, उसे कोई दूसरा भी नहीं मानता, अतः अब जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है। मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगी, अथवा हालाहल विषका पान कर लूँगी अथवा जलपूर्ण वापीमें कूद जाऊँगी। इस प्रकार व्याकुल चित्तवाली भार्या कीर्तिका मन कुछ निश्चित नहीं कर पा रहा था ॥ २६-२८ ॥ दैववश उसी समय ब्राह्मणश्रेष्ठ पुरोहित देवल वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने रानीसे कहा कि तुम सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली तथा समस्त कष्टोंका हरण करनेवाली गणेशजीकी उपासना करो। तब रानी कीर्ति मन्दारवृक्षके काष्ठसे निर्मित प्रतिमाको शीघ्र लाकर पवित्र दिनमें स्नान करके उन गजाननका परम ध्यान-योगसे पूजन करनेके लिये बैठ गयी ॥ २९-३१ ॥ सभी जनोंके द्वारा भगवान् शिव, विष्णु, देवी दुर्गा तथा परम तेजसम्पन्न सूर्यको छोड़कर सबसे प्रथम देवाधिदेव गजाननकी ही पूजा की जाती है ॥ ३२ ॥ विचार करनेपर वास्तवमें इन पाँचों देवोंमें कोई भेद नहीं है। जो मनुष्य इनमें भेददृष्टि रखता है, वह नरकोंमें जाता है। परम आनन्दसे परिपूर्ण वह एक ही परमेश्वर लोकोंपर अनुग्रह करनेकी दृष्टिसे स्वेच्छानुसार पाँच रूपोंमें उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे कि एक ही पुरुष किसीका पुत्र तो किसीका मामा कहलाता है ॥ ३३-३४ ॥ कीर्तिने सोलह उपचारोंके द्वारा भलीभाँति उस मूर्तिका पूजन किया। उसने दूर्वा, पुष्प, दक्षिणा समर्पितकर अनेक बार उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर वह दोनों हाथ जोड़कर उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगी ॥ ३५-३६ ॥ कीर्ति बोली—आप ही जगत्के एकमात्र आधार हैं, आप ही सबके कारण हैं, आप ही ब्रह्मा तथा विष्णु हैं और आप ही विशाल सूर्य हैं ॥ ३७ ॥ आप ही चन्द्रमा, यम, वैश्रवण कुबेर, वरुण तथा वायुदेव हैं। आप ही समस्त सागर, सभी नदियाँ, लताएँ तथा पुष्पसमूह हैं। आप ही सुख और दुःख तथा सुख- दुःखके हेतु हैं। आप ही बन्धनरूप हैं और आप ही उस बन्धनसे मुक्त करानेवाले हैं, आप ही अभीष्ट कार्योंमें नित्य विघ्न उपस्थित करनेवाले और महान् विघ्नकर्ता तथा विराट् रूप हैं ॥ ३८-३९ ॥ आप ही पुत्र तथा लक्ष्मीको देनेवाले हैं और आप ही समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आप ही इस विश्वको उत्पन्न करनेवाले और आप ही विश्वके संहारक भी हैं। आप ही प्रकृति, आप ही पुरुष, निर्गुण तथा महान् हैं। आप ही चन्द्ररूप धारणकर समस्त जगत्का आप्यायन करते हैं ॥ ४०-४१ ॥ आप ही भूतकाल, वर्तमानकाल तथा भविष्यकाल और आप ही भावात्मक तथा स्वराट् हैं। आप समस्त प्राणियोंकी शरण हैं और शत्रुओंको परम सन्ताप प्रदान करनेवाले हैं। आप कर्मकाण्डपरायण यज्ञकर्ता हैं और आप ही ज्ञानकाण्डपरायण परम पवित्र हैं। आप सर्वज्ञ, सबके विधाता, सबके साक्षीस्वरूप तथा सर्वत्र गमन करनेवाले हैं ॥ ४२-४३ ॥ आप ही सर्वत्र व्याप्त और आच्छादक, सर्वसत्य- स्वरूप, प्रभु, सर्वमायामय और सभी मन्त्रों तथा तन्त्रोंके विधानको जाननेवाले हैं ॥ ४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'राजभार्याकृत गणेशाराधनाका वर्णन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥
तैंतीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०३३ ] * प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन * ३४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तैंतीसवाँ अध्याय प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन, स्वप्नमें कीर्तिको अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानके प्रभावसे राजा प्रियव्रतका कीर्तिको धर्मपत्नीरूपमें स्वीकार कर लेना, यथासमय कीर्तिको 'क्षिप्रप्रसादन' नामक पुत्रकी प्राप्ति और सपत्नीद्वारा उसे विष देना, महर्षि गृत्समदद्वारा पुत्रको जिला देना, शमीका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे राजा प्रियव्रतकी वह ज्येष्ठ भार्या कीर्ति प्रतिदिन उन विनायककी पूजाकर उनकी स्तुति करने लगी। एक दिनकी बात है, उसकी सखियाँ दूर्वा लेनेके लिये वहाँ आयीं ॥ १ ॥ ज्येष्ठमास होनेके कारण उन्होंने कहीं भी शुभ दूर्वांकुरोंको प्राप्त नहीं किया। अतः वे बहुत-से शमीपत्रोंको लेकर उसके पास आयीं। वे बहुत थककर लौटी थीं, उन्होंने कीर्तिको बतलाया कि दूर्वा कहीं भी नहीं मिल पायी, अतः तुम सभी उपचारोंके साथ इन शमीपत्रोंसे विनायककी पूजा करो ॥ २-३ ॥ दूर्वा न मिलनेसे उस दिन वह निराहार रहकर अपने नियम-परायण रही। शमीपत्रोंके अर्पण करनेसे उन विनायकको परम सन्तुष्टि प्राप्त हुई ॥ ४ ॥ उस दिन वह कीर्ति विनायकदेवके समक्ष ही सो गयी। इसी प्रकार पूजन करते हुए जब उसे एक वर्ष व्यतीत हो चुका तो वर्षके पूरा होनेपर उसने एक अत्यन्त अद्भुत स्वप्न देखा कि वही विनायककी मूर्ति उससे इस प्रकार बोली—हे सुभ्रू ! तुम्हारे द्वारा शमीपत्रोंसे पूजित होनेके कारण मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ, मैं तुम्हें वर प्रदान करती हूँ। जब वह कीर्ति कुछ नहीं बोली तो वही विनायकमूर्ति पुनः उससे बोली— ॥ ५-६ ॥ मूर्ति बोली—तुम्हारा पति तुम्हारे अनुकूल हो जायगा, तुम अत्यन्त शुभ भोगोंको प्राप्त करोगी। तुम्हारा एक महाबलशाली पुत्र होगा, जो मुझमें भक्ति रखनेवाला होगा। तुम उसका 'क्षिप्रप्रसादन' यह सुन्दर नाम रखना। चौथे वर्षमें विषके द्वारा उसकी मृत्यु हो जायगी, किंतु तत्क्षण ही गृत्समद नामक द्विज वहाँ उपस्थित होकर उसे पुनः जीवित कर देंगे। क्षिप्रप्रसादन नामक वह पुत्र राज्यकर्ता, धर्मपरायण तथा चिरायु होगा। मुझे सन्तोष प्रदान करनेवाले इस (तुम्हारे द्वारा किये गये) स्तोत्रका जो पाठ करेगा, राजा भी उसके वशमें हो जायगा, फिर दूसरे किसी सामान्य जनकी क्या बात है ! ॥ ७-१० ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला पुत्रवान्, धनसम्पन्न और वेद-वेदांगका पारगामी विद्वान् हो जायगा। उसकी बुद्धि बढ़ेगी और मेधाशक्ति भी वृद्धिको प्राप्त होकर अत्यन्त दृढ़ हो जायगी। जो तीनों सन्ध्याकालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह अपने सभी अभिलषित पदार्थोंको प्राप्त कर लेगा, उसकी मुझमें दृढ़भक्ति हो जायगी और वह अन्तमें मोक्षको प्राप्त करेगा ॥ ११-१२ ॥ स्वप्नमें इस प्रकारके वरोंको प्रदान करके देव विनायक क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। कीर्ति जग पड़ी और उसकी आँखोंमें आँसू भर गये। आश्चर्यचकित हो वह मन-ही- मन कहने लगी कि दीनानाथ भगवान् विनायकने मेरे ऊपर महान् कृपा की है। उन्होंने जो मुझे साक्षात् दर्शन दिया, यह मुझपर महान् अनुग्रह है ॥ १३-१४ ॥ सभी प्राणियोंपर कृपा करनेवाले उन देव विनायकने अत्यन्त आदरके साथ आज मेरी रक्षा की है ॥ १५ ॥ यही परम सिद्धि है, यही परम तप है, यही परम लाभ है, जो कि उन देवने मेरे साथ वार्ता की है ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रभातकालमें उसने स्नान किया। वह परम आनन्दमें भरी हुई थी। उसने अत्यन्त श्रद्धाभक्तिके साथ वरदायी शुभ भगवान् गणेशका पूजन किया। उसने अपना व्रत पूर्णकर गणेशजीकी मूर्तिको पूर्ववाले स्थानपर स्थापित किया और पुरोहितको बुलाकर भक्तिपूर्वक गणेशजीका पूजन किया ॥ १७-१८ ॥ गणेशजीका मनसे ध्यान करते हुए कीर्ति उनके नाममन्त्रका जप करने लगी और वह उनके द्वारा प्रदत्त वरोंका स्मरण करते हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ १९ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर प्रारब्धानुसार एवं ईश्वरकी इच्छासे प्रभा नामवाली राजाकी वह छोटी रानी
३५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
प्रथम स्तम्भ (बायाँ स्तम्भ): कान्तिहीन तथा रक्त-पित्तके विकारसे ग्रस्त हो गयी॥ २०॥ उसके हाथों, पैरों तथा नाकसे नित्य रक्त निकलने लगा। वह अत्यन्त बीभत्स स्वरूपवाली हो गयी, तब पति राजा प्रियव्रतने मनसे उसका परित्याग कर दिया॥ २१॥ बहुत प्रयत्न करनेपर भी चिकित्सा-सम्बन्धी सभी उपायोंके विफल हो जानेपर अब राजा न तो उससे बोलते थे और न ही उसकी ओर देखते ही थे। तत्पश्चात् तपस्याके द्वारा अत्यन्त सुन्दर आकृतिवाली हो गयी कीर्तिके भवनमें [किसी समय] राजा गये। भगवान् गणेशकी कृपासे राजा प्रियव्रत स्वयं ही उसके वशीभूत हो गये। वे उसका हाथ पकड़कर उसे शय्यापर ले गये॥ २२-२३॥ वे कीर्तिमें एकनिष्ठावान् होकर उसके साथ स्वेच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे। नृपश्रेष्ठ प्रियव्रत क्षणभरके लिये भी उसका वियोग सहन नहीं कर पाते थे॥ २४॥ उस पतिपरायणा कीर्तिने भी अनेक प्रकारके भोगों तथा अलंकारोंका उपभोग किया। वह गर्भवती हुई और यथासमय उसने एक पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके जन्मसे हर्षित होकर राजा प्रियव्रतने ब्राह्मणोंको [उस] शुभ मुहूर्तमें यथायोग्य अनेक प्रकारके दानोंको दिया॥ २५-२६॥ उन्होंने पाँच ब्राह्मणोंको विभिन्न दिशाओंमें बैठाकर पुत्रका जातकर्म-संस्कार कराया और फिर उस बालकका ‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुसज्जित अपने पुत्रको देखकर राजाको अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ऐसे ही पुत्रका दर्शन करके रानी कीर्ति भी अत्यन्त आनन्दको प्राप्त हुई॥ २७-२८॥ सपत्नी कीर्तिके सुन्दर पुत्रको देखकर प्रभा अत्यन्त दुखी हो गयी। वह यह सोचने लगी कि ज्येष्ठा रानी कीर्तिका यह पुत्र ही आगे चलकर राजा होगा॥ २९॥ तब उसने दही-भातमें विष मिलाकर कीर्तिके पुत्रको खिला दिया। तब क्षणभरमें ही वह विह्वलताको प्राप्त हो गया और उसके नेत्र उलटे हो गये॥ ३०॥ तदनन्तर वह प्रभा स्वयं भी अत्यन्त आतुर होकर बड़े जोरसे शब्द करती हुई रोने लगी। प्रभाका वह कातर शब्द सुनकर कीर्ति उस बालकके पास वेगपूर्वक आयी। उसने उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको बड़े आदरके साथ राजाको बतलाया। तब राजाकी आज्ञासे वैद्योंने भी अनेक
द्वितीय स्तम्भ (दायाँ स्तम्भ): प्रकारकी औषधियाँ उस बालकको दीं॥ ३१-३२॥ उन्होंने विषके दोषका परीक्षण करके राजाको बताया कि नाना प्रकारके मन्त्रों तथा औषधियोंसे कोई भी लाभ नहीं हो पा रहा है। राजाने प्रभाको धिक्कारा और उसे घरसे दूर कर दिया। तदनन्तर कीर्ति उस बालकको लेकर सखियोंके साथ वनमें चली आयी॥ ३३-३४॥ जब वह नगरसे एक योजन दूर पहुँची थी कि उसी बीच उस बालककी मृत्यु हो गयी। अपनी गोदमें बालकको लेकर शोकसे विह्वल हुई वह कीर्ति रोने लगी। जिस प्रकार वायुके झोंकेसे लता भूमिपर गिर पड़ती है, वैसे ही वह भी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी। उसके आभूषण गिर गये। हाथका कंकण टूट गया और मस्तकपरसे आँचल खिसक गया॥ ३५-३६॥ क्षणभरके बाद जब उसे कुछ होश आया तो वह द्विरदानन भगवान् गणेशका स्मरण करने लगी। वह अपने नवजात शिशुकी उत्पत्ति तथा बालचेष्टाओंका स्मरण करते हुए अपनी छाती पीटने लगी॥ ३७॥ दैवयोगसे उसी समय उस मार्गसे गृत्समद नामवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा आ पड़े, वे साक्षात् सूर्यके समान तेजसे सम्पन्न थे। वे गणेशजीके भक्तोंमें सबसे अग्रणी तथा तपस्याकी परम निधि थे। दयार्द्र होकर वे वहीं रुक गये। तब उस कीर्तिने उन्हें प्रणाम किया॥ ३८-३९॥ वह लम्बी साँस लेते हुए बोली-गणेशजीकी कृपासे मुझे यह पुत्र प्राप्त हुआ, किंतु अब यह बालक मृत्युको प्राप्त हो गया है, इसे आप अपनी तपस्याके बलसे जीवित करनेकी कृपा करें॥ ४०॥ मैंने उन्हीं गणेश भगवान्की आज्ञासे इसका ‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। किंतु मेरी सपत्नीने दुष्ट भावसे भावित होकर इसे विष दे दिया॥ ४१॥ हे मुने! उसी कारण इसने ऐसी मृत्यु प्राप्त की है। हे तपोधन! सत्पुरुषोंका दर्शन विफल नहीं होता है, इसलिये मैं [आपसे इसका जीवन] माँग रही हूँ॥ ४२॥ साधुपुरुष शरणमें आये हुएके परित्यागकी इच्छा नहीं करते। कीर्तिका उस प्रकारका वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ वे गृत्समद क्षणभरके लिये ध्यानमें स्थित हो गये, तदनन्तर बोले-हे देवि! सुनो, मैं इस पुत्रको जीवित
क्री०ख०-अ०३४ ] * भृशुण्डीके शापसे औरव-पुत्रीका शमीवृक्षकी योनि-प्राप्तिका आख्यान * ३५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करनेका उपाय बताता हूँ। तुमने अज्ञानमें शमीपत्रोंके द्वारा | जिस पुण्यके प्रभावसे मेरा बालक विषके प्रभावका विनायककी जो पूजा की है, उससे प्राप्त पुण्यफलको तुम | परित्यागकर पुनः सुखी हो गया और शीघ्र ही जीवन मेरी आज्ञासे इसके हाथमें अर्पित करो ॥ ४३-४५ ॥ | प्राप्तकर उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे कि कोई सोया उस पुण्यके प्रभावसे इस समय शीघ्र ही तुम्हारा | हुआ उठ खड़ा होता है। इसी कारण मैं शमीपत्रके द्वारा पुत्र उठ खड़ा होगा। मुनि गृत्समदजीके इस प्रकारके | की गयी पूजाकी महिमाको आपसे पूछती हूँ ॥ ५२१/२ ॥ वचन सुनते ही वह कीर्ति आनन्दमें निमग्न हो गयी ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माजी बोले—उसका वह वचन सुनकर महर्षि उसने शमीपत्रोंद्वारा की गयी गणेशपूजाका उत्कट | गृत्समद उससे बोले— ॥ ५३ ॥ पुण्यफल अपने पुत्रको समर्पित कर दिया। उसी समय | गृत्समद बोले—जिसके नामका उच्चारण वह कीर्तिका पुत्र वैसे ही उठ खड़ा हो गया, जैसे कि | करनेमात्रसे करोड़ों पातक विनष्ट हो जाते हैं, उस उसपर अमृतकी वर्षा की गयी हो ॥ ४७ ॥ | शमीकी महिमाको सम्पूर्ण रूपसे बतानेमें इस पृथ्वीपर कीर्तिने अत्यन्त हर्षित होकर मुनिके चरणोंमें | कौन समर्थ है ? ॥ ५४ ॥ बार-बार सिर रखकर प्रणाम किया। वह उन मुनि | मैं अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपमें उसे बताता हूँ। गृत्समदसे कहने लगी कि आपने यह कैसे जाना कि मैंने | व्रत, दान, तपस्या, विविध तीर्थोंके सेवन, ग्रीष्ममें शमीपत्रोंद्वारा गणेशजीका पूजन किया है ? ॥ ४८ ॥ | पंचाग्निसाधना और हेमन्त ऋतुमें जलमें निवास करनेसे हे मुने! शमीपत्रद्वारा किये गये गणेशजीके पूजनके | वह फल प्राप्त नहीं होता, जो कि शमीपत्रोंके द्वारा उस पुण्य प्रभाव तथा उसकी महिमाको बतलानेकी कृपा | गणेशजीका पूजन करनेसे प्राप्त होता है ॥ ५५-५६ ॥ करें, जिसके प्रभावसे मेरा बालक जी उठा और | प्रातःकालमें अथवा तीनों सन्ध्याकालोंमें जो भगवान् यमकिंकरोंद्वारा मुक्त हो गया ॥ ४९ ॥ | गणेशजीका ध्यान करके भक्तिभावपूर्वक शमीका स्मरण ताकि शमीपत्रद्वारा की गयी गणेश-पूजाकी महिमाको | करता है, उसकी वन्दना करता है अथवा पूजन करता जानकर मैं नित्य उनका शमीपत्रोंद्वारा पूजन किया | है, भगवान् विनायक उसपर प्रसन्न हो जाते हैं, उसे करूँगी। जिस शमीपूजनके प्रभावसे अत्यन्त क्रूर, न रोके | मनोभिलषित पदार्थोंको देते हैं और अन्तमें मोक्ष प्राप्त करा जानेयोग्य भी यमदूतोंको गणनायके दूतोंने रणांगणमें बहुत | देते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इस विषयमें भी इस युद्ध करके परास्त कर दिया और फिर वे दूत मेरे पुत्रको | प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो देवर्षि नारदजी जीवित करके गजाननके धामको चले गये ॥ ५०-५१ ॥ | और महात्मा इन्द्रके बीच हुआ था ॥ ५७–५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालकके पुनः जीवित होनेका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥ ❖————❖ चौंतीसवाँ अध्याय महर्षि भृशुण्डीके शापसे ब्राह्मण औरवकी पुत्री शमीकाका शमीवृक्षकी तथा महर्षि शौनकके शिष्य धौम्यपुत्र मन्दारका मन्दारवृक्षकी योनि प्राप्त करनेका आख्यान कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन् ! देवर्षि नारदजी और | ब्रह्माजी बोले—उसका इस प्रकारका वचन देवराज इन्द्रके बीच जो संवाद हुआ था, उसे आप | सुनकर वे मुनि गृत्समद देवर्षि नारद तथा इन्द्रके बीच पूर्णरूपसे बताइये, उसे सुनकर मैं समस्त संशयोंको | जो संवाद हुआ था, उस इतिहासका वर्णन करने भुलाकर वैसे ही सन्तुप्त हो जाऊँगी, जैसी तृप्ति अमृत | लगे ॥ २ ॥ पीनेसे होती है ॥ १ ॥ | गृत्समद बोले—हे सुभ्रू ! एक बारकी बात है,