श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०२८ ] * राजा साम्ब तथा दुष्टबुद्धिके जन्म-जन्मान्तरोंकी कथा * ३३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
बालहत्याका ही विचार करते थे। इस प्रकार पापपरायण तथा दूषितबुद्धिवाले वे दोनों राजा और अमात्य पापके पर्वतके समान अत्यन्त दुःसह हो गये थे। उनके घरमें भिक्षा लेने न कोई ब्राह्मण जाता था और न कोई संन्यासी ही ॥ ६-७ ॥ पूरे राज्यमें भी कोई न तो राजाका नाम लेता था और न कोई मन्त्रीका। एक बारकी बात है, वे दोनों आखेट करनेके लिये एक गहन वनमें प्रविष्ट हुए ॥ ८ ॥ उन्होंने मृगोंके समूहों तथा अनेक प्रकारके पक्षियोंके समूहोंका वध किया। फिर वे दोनों उन्हें नगरके लिये भेजकर स्वयं घोड़ेपर सवार होकर वापस आने लगे ॥ ९ ॥ [तभी] मार्गमें उन्होंने विनायकका एक विशाल मन्दिर देखा, जिसमें देव विनायककी अत्यन्त मंगलमयी जीर्ण मूर्ति विद्यमान थी। श्रीरामके पिता दशरथजीने पुत्रप्राप्तिके लिये तप करते समय उस मूर्तिको स्थापित किया था। [वहाँ] उन्होंने विनायकके दशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए बहुत दिनोंतक ध्यान किया था ॥ १०-११ ॥ यहींपर भगवान् विनायक उनकी भक्तिसे प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूपसे प्रकट हुए थे। उन्हें वर प्रदानकर उन देवने उनकी मनोकामना पूर्ण की थी तथा आज भी वे अभिलषित वर प्रदान करते हैं ॥ १२ ॥ राजा दशरथने महर्षि वसिष्ठके हाथों इस दृढ़ मूर्तिकी स्थापना करवायी थी। तब वसिष्ठमुनिने 'वरद विनायक' इस मूर्तिका नाम रखा। इनके दर्शनसे, इनका स्मरण करनेसे अथवा इनका पूजन करनेसे मनुष्योंको धर्म-अर्थ-काम तथा मोक्ष-चतुर्विध पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकार महर्षि वसिष्ठजीके वचनके अनुसार यह स्थान पृथ्वीमें प्रसिद्ध हुआ। श्रीगणेशजीकी सेवा करनेसे, उनका स्मरण करनेसे तथा उनका पूजन करनेसे श्रीदशरथजीको राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामक चार पुत्र एक ही साथ प्राप्त हुए। वे चारों लोकमें अत्यन्त प्रसिद्ध, सर्वज्ञ तथा शूरवीरोंके मान्य थे ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार अत्यन्त रमणीय तथा राजा (दशरथ)- के द्वारा निर्मित कराये गये उस मन्दिरका दर्शनकर वे दोनों राजा तथा अमात्य घोड़ेसे उतर पड़े और उन्होंने [पूर्वके पुण्यवश] सभी पापोंको विनष्ट करनेवाले प्रभु श्रीगणेशजीका पत्रों तथा पुष्पोंद्वारा पूजन किया और उन्हें प्रणाम किया। उन विभुकी प्रदक्षिणा करके वे क्षणमात्रमें वहाँसे चले गये। उन दोनोंका यह पुण्यकार्य दैववश ही हो गया था। इस प्रकार पापपरायण वे दोनों राजा तथा मन्त्री राज्य करनेके बाद मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १७-१९ ॥ यमदूतोंके द्वारा पाशोंसे बाँधकर उन्हें यमराजके पास ले जाया गया। तब यमराजने चित्रगुप्तको बुलाकर उनके शुभ-अशुभ कर्मोंके विषयमें पूछा ॥ २० ॥ वे बोले- हे सूर्यपुत्र यमराजजी ! इन दोनोंका पुण्य तो लेशमात्र भी नहीं है और इनके पापोंकी गणना भी नहीं है। इसपर यमराज दूतोंसे बोले। इन दोनोंको बाँधो- बाँधो और लोहेके दण्डसे मारो और हजारों वर्षोंतकके लिये अवीचिमय नरककुण्डमें डाल दो ॥ २१-२२ ॥ इस प्रकार एक-एक नरककुण्डमें क्रमशः इनके अपने संचित पापकर्मोंका भोग करवाकर इन्हें मृत्युलोकमें नीच योनिमें डाल दो ॥ २३ ॥ हे दूतो! इन दोनोंका थोड़ा-सा पुण्यकर्म है। उसे तुम लोग सुनो। इन दोनोंने प्रसंगवश भगवान् गजाननका दर्शन किया है और उनका पूजन भी किया है ॥ २४ ॥ उसी पुण्यकर्मके कारण वे गजानन ही वहाँसे इनका उद्धार करेंगे। यमके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उन दूतोंने उन्हें दृढ़तापूर्वक बाँधकर मारा ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् दूतोंने उन दोनोंको क्रमशः सौ-सौ वर्षोंतक कुम्भीपाक, शोणितोद, रौरव, कालकूट, तामिस्र, अन्धतामिस्र, पूयशोणितकर्दम आदि नरकोंमें डाला। कण्टक नामक नरकमें उनके अंग छिद गये, तप्तबालुक नामक नरकमें वे संतप्त हो उठे ॥ २६-२७ ॥ सूचीमुख नामक नरकमें वे दोनों सूईके समान तीखे मुखवाले कीड़ोंके द्वारा बार-बार काटे गये। तदनन्तर उन्हें महाभयंकर असिपत्रवन नामक नरकमें डाला गया। वहाँपर शस्त्रोंके आघातसे पापियोंका शरीर छिन्न-भिन्न हो जाता है। तदनन्तर तप्तशिला नामक नरकमें उन दोनोंको घनकी चोटसे पीटा गया ॥ २८-२९ ॥