श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उन दोनोंने बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंकी यातनाएँ सहीं। उन दोनोंके सम्पूर्ण दुःखोंका वर्णन करनेमें शेषजी भी समर्थ नहीं हैं। इस प्रकारसे हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारके दुःखोंको भोगकर पापोंका भोग हो जानेके बाद उन्होंने शेष पापोंको भोगनेके लिये पृथ्वीपर जन्म लिया ॥ ३०-३१॥ इस जन्ममें एकने कौएकी योनिमें जन्म लिया तो दूसरा उलूक योनिमें उत्पन्न हुआ। दूसरे जन्ममें एक मेढक हुआ तो दूसरेने गिरगिटकी योनिमें जन्म लिया ॥ ३२॥ अगले जन्ममें एक विषधर सर्प हुआ तो दूसरा बिच्छू बना। उन योनियोंमें भी उन दोनोंने पापकर्म करते हुए अनेक लोगोंको काटा ॥ ३३ ॥ तदनन्तर वे दोनों कुत्ते तथा बिल्लीकी योनिमें, फिर नेवले तथा सूकरकी योनिमें, तदनन्तर भेड़िये तथा सियारकी योनिमें, फिर घोड़े और गधेकी योनिमें उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् वे दोनों ऊँट और हाथी बने, तदनन्तर मगरमच्छ तथा महान् मत्स्य बने, तदनन्तर बाघ और मृग और फिर बैल तथा महिषकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकारसे नाना योनियोंमें भटकते हुए वे चाण्डाल तथा कीटककी योनिमें उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् अन्तमें राक्षस तथा भील (व्याध)-की योनिमें उन्होंने जन्म लिया। इस जन्ममें साम्ब नामक राजा दुर्बुद्धि (भीम) नामवाला व्याध बना और दुष्टबुद्धि नामक वह अमात्य पिंगाक्ष नामक राक्षसके रूपमें भूतलमें प्रसिद्ध हुआ। जन्मभर केवल पाप ही करनेवालेकी चर्चामें बहुत दोष बताये गये हैं॥ ३६-३७ ॥ जब वे दोनों राजा साम्ब और दुष्टबुद्धि नामक अमात्य पूर्वकालमें पापपरायण थे, तो उन्हीं दिनों एकबार आखेटके लिये जाते समय उन दोनोंसे एक पुण्यकर्म भी बन गया था ॥ ३८ ॥ उन्होंने भगवान् विनायकका दर्शन किया। उन्हें प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा की, साथ ही फल, पुष्प आदिके द्वारा उनका अर्चन किया। जिसके कारण गजानन उनपर सन्तुष्ट हो गये ॥ ३९ ॥ उन दोनोंके उस जन्मका वह संचित पुण्य अगाध था। पूर्वकालमें जब वह राक्षस उस भीम नामक व्याधको खानेके लिये आया, तो वह शमीके वृक्षपर चढ़ गया। वहाँ हिलनेसे शमीके पत्ते गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़े। तब गणेशजी दोनोंपर बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥ उन दोनोंको दिव्य देह प्रदानकर उन विभु गजाननने उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति करा दी थी। इस प्रकार उन दोनोंके पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके विषयमें आपको बताया। केवल शमीपत्रमात्रके द्वारा [अज्ञानमें ही हुए] पूजनसे वे गजानन प्रसन्न हो गये। जिस प्रकार कश्यपपुत्र वामनने उन गणेशकी स्थापना की थी और उनके द्वारा किये गये अनुष्ठानके विषयमें तथा जिस प्रकारसे गणनायने प्रसन्न होकर उन्हें वर प्रदान किये, हे मुनि व्यासजी ! वह सब मैं आपको बताता हूँ ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत भीम तथा राक्षसके पूर्वजन्मका वर्णन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥ उनतीसवाँ अध्याय महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपुकी उत्पत्तिका वर्णन, उनकी तपस्या तथा उन्हें वरदानकी प्राप्ति, प्रह्लादपुत्र विरोचनके वधका आख्यान ब्रह्माजी बोले—मैंने कश्यपको आज्ञा दी थी कि आप विविध प्रकारकी सृष्टि करें। महर्षि कश्यप अत्यन्त विनीत, महान् ज्ञानी, भूत-भविष्य तथा वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले, सूर्य तथा अग्निके तेजसे भी अधिक तेजस्वी और उत्तम तपस्याकी निधि थे। उन्होंने सृष्टि करनेकी सामर्थ्य प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त महान् तप किया ॥ १-२ ॥ उन्होंने षडक्षर मन्त्रके द्वारा भगवान् गणेशजीका ध्यान किया। इस प्रकार दिव्य हजार वर्ष बीत जानेपर