श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०२९ ] * महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन * ३३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वे देव गजानन उनके लिये वरप्रदाता हुए॥ ३॥ उन्होंने महर्षि कश्यपजीको सभी प्रकारके अभीप्सित विविध वरोंको प्रदान किया था। तब वरदानके प्रभावसे वे जो-जो भी अपने मनमें कल्पना करते थे, उस-उसको शीघ्रतासे अपने समक्ष पाते थे॥ ४१/२॥ उन्होंने अपनी चौदह पत्नियोंमें अनेक बार गर्भाधान करके अपने तेजसे सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की थी। उन चौदह पत्नियोंमें दिति तथा अदिति नामवाली दो पत्नियाँ श्रेष्ठ थीं॥ ५-६॥ भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये अदितिने भी दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। इससे भगवान् जनार्दन सन्तुष्ट हो गये॥ ७॥ उसके तपसे सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णु संसारके पालन-पोषणके लिये, धर्मकी स्थापनाके लिये तथा इन्द्र आदि देवताओं और उनकी सन्ततिकी रक्षा और दुष्टोंके संहारके लिये पहले देवी अदितिके पुत्रके रूपमें अवतरित हुए। तदनन्तर एक समयकी बात है, जब महर्षि कश्यप होम करनेके लिये उद्यत थे। उस समय दितिने अपने स्वामीसे आदरपूर्वक कहा— ॥ ८-९॥ हे भगवन्! मुझे कामाग्नि पीड़ित कर रही है। अतः आप ऋतुदान कीजिये। उसका ऐसा वचन सुनकर महर्षि कश्यप आदरपूर्वक उससे बोले— ॥ १०॥ यह भयंकर सन्ध्याकाल है। इस समय हवन-कार्य उपस्थित है। तुम क्षणभर धैर्य धारण करो। तदनन्तर मैं तुम्हारे साथ रमण करूँगा। इस समय सहवास करनेसे देवताओं तथा धर्मका विरोधी दुष्ट पुत्र उत्पन्न होगा। दिति स्वामीके इस प्रकारके वचन सुनकर उनका हाथ पकड़कर उनके चरणोंमें गिर पड़ी॥ ११-१२॥ लाल-लाल नेत्रोंवाली होकर वह तीनों लोकोंको जला देनेकी इच्छासे बोल पड़ी—हे मुने! इसी समय यदि आप मेरी अभिलाषा पूर्ण नहीं करेंगे तो कामदेवकी अग्निसे विह्वल हुई मैं अपने शरीरका त्याग कर दूँगी। दैवयोगसे मेरा पुत्र देवताओं अथवा धर्मका विरोधी चाहे जैसा भी हो॥ १३-१४॥ उसका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल महर्षि कश्यपने उसे ऋतुदान दिया और फिर स्नान करनेके अनन्तर होम किया॥ १५॥ कालान्तरमें दितिको महान् बलशाली हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन दोनोंने अत्यन्त उत्कट तपस्या की॥ १६॥ पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय)-का बहुत वर्षोंतक जप करते हुए वे दोनों पैरके एक अँगूठेके बलपर खड़े होकर केवल वायुका भक्षण करते रहे। उनके शरीरपर