श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- दीमकोंने बाँबी बना ली थी ॥ १७ ॥ जब कृपानिधि भगवान् शंकर उन्हें वर प्रदान करनेके लिये उपस्थित हुए, तब उन दोनोंने भक्तिपूर्वक भगवान् त्रिलोचनकी स्तुति की ॥ १८ ॥ अपने हाथ जोड़कर वे दोनों उनके चरणोंपर गिर पड़े और उनके दर्शनके प्रभावसे प्रस्फुटित बुद्धिवाले वे यथाज्ञान यथाशक्ति स्तुति करने लगे ॥ १९ ॥ जो देव वृषभके वाहनपर विराजमान रहनेवाले हैं, दस भुजाओंवाले हैं। ललाटपर अर्धचन्द्रको धारण करनेवाले तथा नागोंसे सुशोभित हैं। जो विविध रूपवाले गणों तथा गिरिराजपुत्री पार्वतीसे समन्वित हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्के कारण हैं। जो बाघम्बर तथा गजचर्म धारण करनेवाले हैं। जिनके तीन नयन हैं, जो त्रिशूलको धारण करनेवाले और कामदेवका दहन करनेवाले हैं। जो भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेके लिये एकमात्र आश्रय- स्वरूप हैं और जो धर्म-अर्थ [, काम] तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं [वे भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों] ॥ २० ॥ इस प्रकार सर्वव्यापी परमेश्वर महादेवकी स्तुति करके उन्होंने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान उन भगवान् शिवको प्रणाम किया ॥ २१ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने प्रसन्न होकर उन दोनोंसे कहा-वर माँगो। तब उन दोनोंने वरोंको माँगते हुए कहा कि देवताओं, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, श्रेष्ठ मनुष्यों, पिशाचों तथा चारण आदि किसी भी योनिके प्राणीके द्वारा हमारी मृत्यु न हो। न शस्त्रोंसे, न गीले पदार्थसे, न शुष्क पदार्थसे, न किसी जन्तु और न किसी जलचर प्राणीके द्वारा ही हमारी मृत्यु न हो। अन्य किसी स्थावर अथवा जंगम प्राणीसे हमारी मृत्यु न हो। हमारी मृत्यु न दिनमें हो, न रातमें हो। न तो पृथ्वीमें हो, न आकाशमें हो, न उन दोनोंके मध्यमें हो और न ही उषाकालमें हमारी मृत्यु हो ॥ २२-२४ ॥ तब भगवान् शिवने 'ऐसा ही होगा' कहा और फिर वे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनोंने पृथ्वी तथा आकाशके मध्यभाग [स्वर्गादि दिव्यलोक] और रसातलपर विजय प्राप्त कर ली ॥ २५ ॥ देवताओंके सभी स्थानोंको बलपूर्वक जीतकर वे वहाँ स्थित हो गये। हिरण्यकशिपुका प्रह्लाद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह दैत्योंके लिये कण्टकके समान था और भगवान् विष्णुके भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ था। भगवान् नारायणका नाम-मन्त्र जपनेपर पिता हिरण्यकशिपुने उसे अत्यन्त प्रताड़ित किया था ॥ २६-२७॥ पिता हिरण्यकशिपुके द्वारा अनेक प्रकारकी यातनाओंके दिये जानेपर उन करुणासागर भगवान् विष्णुने जलमें, स्थलमें और विष तथा अग्निसे उसकी अनेक बार रक्षा की। सभी लोगोंको भय पहुँचानेवाले उस हिरण्यकशिपुको नरसिंहरूप धारण करके श्रीहरिने अपने नाखूनोंके द्वारा सायंकालके समय विदीर्ण कर डाला ॥ २८-२९ ॥ इससे पूर्व भगवान् विष्णुने वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्षद्वारा समुद्रमें डुबोयी गयी पृथ्वीको अपनी दाढ़ोंके ऊपर उठाकर यथास्थान स्थित किया। प्रह्लादका पुत्र विरोचन हुआ और उसका पुत्र हुआ बलि ॥ ३० ॥ विरोचन भगवान् सूर्यका भक्त था। उसने उनसे मुकुट प्राप्त किया था। सात अश्वोंवाले रथमें आसीन रहनेवाले भगवान् सूर्यने विरोचनसे कहा था कि इस मुकुटपर यदि किसी दूसरेके हाथका स्पर्श होगा तो यह नष्ट हो जायगा। इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान्