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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 656 में से

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पृष्ठ 343

क्री०ख०-अ०३०] * विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान * ३४१

सूर्यके वरके प्रभावसे विरोचनने तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया ॥ ३१-३२॥ अपने स्थानोंसे च्युत हो जानेपर देवता भगवान् अच्युतकी शरणमें गये। भगवान् विष्णु महान् चिन्ता करते हुए भी किसी निश्चयपर नहीं पहुँचे ॥ ३३ ॥ तब उन्होंने स्त्रीका रूप धारण किया, जो सभी स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उस स्त्रीरूपके द्वारा उन्होंने दीर्घकालतक विरोचनको आनन्दित किया ॥ ३४ ॥ तदनन्तर कुत्सित बुद्धिवाला वह विरोचन जब उस स्त्रीरूपके साथ रमण करनेको उद्यत हुआ, तो सुन्दर दाँतोंवाली उस स्त्रीने कहा—भो [दैत्य] ! मेरी भी एक कामना है, वह यह कि पहले तुम अपने शरीरमें तेलका अभ्यंग करो। उसके बाद ही मेरे साथ रमण करो। उस स्त्रीका यह वचन सुनकर कामासक्त विरोचनने वैसा ही किया ॥ ३५-३६ ॥ वह मुकुटको उतारकर सिरमें तेलकी मालिश करने लगा। उसी समय उस मुकुटके सौ टुकड़े हो गये। मुकुटके चूर्ण होनेके समान ही वह विरोचन भी (प्राप्त वरदानके अनुसार) मुकुटकी गतिको प्राप्त हुआ ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विरोचनवधवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥

तीसवाँ अध्याय विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान, बलिके द्वारा सौवाँ अश्वमेधयज्ञ करनेपर इन्द्रका चिन्तित होना तथा भगवान् विष्णुको अपनी चिन्ता निवेदित करना, भगवान् विष्णुद्वारा अदितिके गर्भसे वामनरूपमें प्रकट होना

ब्रह्माजी बोले—बलि भगवान् विष्णुका भक्त था, अतः उसे पिता विरोचनकी मृत्युपर कुछ भी सन्ताप नहीं हुआ। बलि वेद तथा वेदांगोंका ज्ञाता, प्रतिभासम्पन्न तथा सभी शास्त्रोंमें पारंगत था। वह परायी निन्दा, पराये द्रव्य तथा परद्रोहसे सर्वथा पराङ्मुख था। वह दानी, यज्ञ करनेवाला तथा माननीय जनोंका बड़े ही आदरके साथ सम्मान करनेवाला था ॥ १-२ ॥ वह चलते हुए, बोलते हुए, सोते हुए, भोजन करते हुए, बैठते हुए, जप करते हुए तथा पीते हुए—इस प्रकार सभी समयोंमें अनन्य मनसे नित्य ही भगवान् विष्णुका ध्यान किया करता था ॥ ३ ॥ एक बार बलिने शुक्राचार्यजीको बुलाकर यथाविधि उनकी पूजा करके उनसे नीति-सम्बन्धी यह प्रश्न पूछा कि हे प्राज्ञ ! इन्द्र अमरावतीका सुख-भोग करते हैं। फिर क्यों नहीं अमरावतीके राज्यमें हमारा भाग है, जबकि इन्द्र आदिके साथ हमारा निरन्तर भाईचारा है? मेरे इस संशयका निवारण करनेमें आप पूर्णरूपसे समर्थ हैं ॥ ४-५ ॥ शुक्राचार्य बोले—हे महाभाग ! तुम्हारे पूर्वजोंने इसी कारण निरन्तर देवताओंसे वैर किया था। देवताओंने भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर नाना प्रकारकी मायाका आश्रय ग्रहणकर उन सभीका वध कर दिया था। अतः तुम वैरभाव छोड़कर भलीभाँति सौ अश्वमेध यज्ञोंको सम्पन्न करो। उस पुण्यबलके प्रभावसे तुम निश्चित ही पूर्ण ऐन्द्रपदको प्राप्त कर लोगे ॥ ६-७१/२ ॥ बलि बोला—हे ब्रह्मन् ! आप नीतिशास्त्रमें अत्यन्त कुशल हैं। आपने अच्छी बात बतायी है। साम, दान तथा भेदनीतिको छोड़कर चौथी नीति निग्रह (दण्ड-युद्ध)- को निकृष्ट माना गया है। चौथा वह उपाय दण्डनीति भी पुण्यके प्रभावसे ही सफल हो पाता है, अतः [उसमें भी] पुण्यको ही प्रबल माना गया है ॥ ८-९ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारका निश्चय करके राजा बलिने वसिष्ठ आदि महर्षियोंको बुलाया और भृगु आदि उन सभी मुनियोंकी पूजा करके उसने बहुत प्रकारकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होनेवाले तथा सभीको आनन्द प्रदान करनेवाले श्रेष्ठ अश्वमेधयज्ञका प्रारम्भ किया। उन सभी ऋषि-मुनियोंने [शास्त्रीय रीतिसे] पूर्व दिशाका निर्धारण करके यज्ञकुण्डोंका निर्माण किया। सामग्रियोंका संचयन करवाया और भूमिका शोधन करके वेदी तथा

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