भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 656 में से

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पृष्ठ 344

३४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मण्डप आदिका निर्माण कराया ॥ १०—१२॥ उन सभी ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन करके आभ्युदयिक श्राद्ध (नान्दीश्राद्ध) तथा मातृकापूजन करनेके अनन्तर विविध प्रकारके तत्तद् मन्त्रोंके द्वारा बड़े ही आदरभावपूर्वक सभी मण्डप-देवताओंका स्थापन किया ॥ १३१/२ ॥ उस यज्ञमण्डपमें राजा बलि और उनकी धर्मपत्नी— दोनों दम्पती श्वेत वस्त्रोंसे विभूषित एवं [अलंकारादिसे] अलंकृत होकर सुशोभित हो रहे थे। सभी मन्त्रीगण, राजपरिवारके मित्रगण तथा पुरवासी जनोंसे वे घिरे हुए थे। नगरकी सम्मानित स्त्रियाँ झरोखोंसे उस महोत्सवको देख रही थीं ॥ १४-१५ ॥ यज्ञके लिये वरण किये गये ब्रह्मा (यज्ञकी रक्षाके लिये कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित रहनेवाले ब्राह्मण आचार्य)-द्वारा अन्वारब्ध किये गये अर्थात् कुशसे स्पर्श किये जाते हुए उन ब्राह्मणोंने यज्ञका पूर्वांग कर्म अर्थात् पंचांग-पूजन आदि सम्पन्न किया। तदनन्तर उन्होंने वेद-कल्पोंके वचनोंके अनुसार यज्ञीय पशुका आलभन किया ॥ १६ ॥ तदनन्तर उन्होंने उन-उन देवताओंके निमित्त उनके मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक आहुतियाँ प्रदान कीं। चार द्वारोंवाले उस यज्ञमण्डपके परिसरके मार्गमें तीनों वर्णोंके सभी लोग सम्मानित होकर बिना रोक- टोकके आवागमन कर रहे थे। वहाँ एक ओर विद्वज्जनोंका विवादपूर्वक शास्त्रार्थ चल रहा था ॥ १७-१८॥ कहीं अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और कहीं वैदिक जन वेदमन्त्रोंका पाठ कर रहे थे। कहींपर शैव तथा वैष्णव भक्त मृदंग तथा ताल-वादनके साथ गीतोंका गान कर रहे थे। कहींपर ब्राह्मणजन अपनी इच्छाके अनुसार छः रसोंसे युक्त व्यंजनोंका सेवन कर रहे थे और नाना प्रकारकी कथाओंको कह रहे थे। जिसे सुनकर श्रोतागण अत्यन्त आनन्दित हो रहे थे ॥ १९-२० ॥ इस प्रकारसे उस यज्ञके सम्पादित हो जानेपर वसिष्ठ आदि महर्षियोंने अग्नियोंमें घृतकी विशाल धारा (वसोर्धारा) डाली। तदनन्तर उत्तरंग कर्मोंके समापनके पश्चात् उन दोनों दम्पती (बलि तथा उनकी पत्नी)-को रथमें विराजमानकर अवभृथ स्नान (यज्ञान्तमें किया जानेवाला स्नान) करानेके लिये सभी लोग साथमें गये। उस समय नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी। श्रेष्ठ बन्दीजनोंद्वारा स्तुतिगान हो रहा था। बहुत प्रकारसे वेदध्वनियोंका उच्चारण हो रहा था तथा भगवान्‌को प्रिय लगनेवाले सामोंका गायन हो रहा था ॥ २१-२३ ॥ स्नान करनेके अनन्तर वापस आकर राजा बलिने भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा उन वसिष्ठ आदि महर्षियोंको अनेक प्रकारके रत्नसमुदाय, सम्पत्तियाँ, अनेक वस्त्र, गौएँ, घोड़े, हाथी, विविध प्रकारके सुगन्धित पदार्थ और इच्छापूर्ति करनेवाली वस्तुएँ प्रदानकर सन्तुष्ट किया। इस प्रकारसे उन ब्राह्मणोंने राजा बलिके निन्यानबे यज्ञ पूर्ण किये ॥ २४-२५ ॥ सौवाँ यज्ञ प्रारम्भ होनेपर देवराज इन्द्र अत्यन्त चिन्तित हो उठे। अपना इन्द्रपद छीने जानेकी आशंकासे वे इन्द्र क्षीरसागरके मध्य विराजमान रहनेवाले अपने कनिष्ठ भ्राता (उपेन्द्र विष्णु) शेषशायी भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। उस समय उन विष्णुके चरणोंकी मैं ब्रह्मा स्वयं सेवा कर रहा था। वे देवताओंद्वारा सेवित हो रहे थे। वीणा हाथमें धारण करके देवर्षि नारद तुम्बुरु आदि अन्य प्रमुख गन्धर्वों, अप्सरासमूहों तथा किन्नरगणोंसहित बड़े ही आदरपूर्वक उनका गुणगान कर रहे थे ॥ २६-२८ ॥ ऐसे उन भगवान् विष्णुका दर्शनकर इन्द्रने दोनों हाथ जोड़कर अपने अभीप्सित कार्यकी सिद्धिके लिये बड़े ही आदरभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९ ॥ इन्द्र बोले—हे अनन्तशक्ति! आपको नमस्कार है। विश्वके योनिस্বরূপ आपको नमस्कार है। विश्वका भरण-पोषण करनेवालेको नमस्कार है। विश्वकी सृष्टि करनेवालेको नमस्कार है, हे दैत्योंके विनाशक ! आपको नमस्कार है। अनेक स्वरूपोंवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंके मनोभिलषित पदार्थोंको उन्हें प्रदान करनेवालेको नित्य नमस्कार है ॥ ३० ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति करनेके अनन्तर देवराज इन्द्रने बलिके द्वारा किये जा रहे सौवें अश्वमेध

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