भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 656 में से

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पृष्ठ 345

यहाँ पृष्ठ पर अंकित सम्पूर्ण पाठ का पंक्तिवार लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

क्री०ख०-अ०३१ ]    * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना *    ३४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[पूर्वार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]

यज्ञके प्रयत्नके विषयमें बताते हुए कहा—विरोचनका पुत्र बलि तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ३१॥ वह सौवाँ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कर लेनेके अनन्तर मेरे इन्द्रपदको ले लेगा। जब वे इतना कह ही पाये थे कि भगवान् विष्णुने सब कुछ जान लिया ॥ ३२॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने इन्द्रके कष्टके विषयमें चिन्ता करते हुए उनसे कहा—हे इन्द्र! राजा बलि मेरा भक्त है। वह तपस्वी है तथा उसने अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है। वेदवचनोंके अनुसार उसे तपस्याके शुभ फलको प्राप्त करना चाहिये। शुभ या अशुभ जो भी कर्म किया जाता है, वह निष्फल नहीं होता ॥ ३३-३४ ॥ हे इन्द्र ! तुम अपना चित्त स्थिर करो। मैं तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा। तदनन्तर वे प्रभु देवी अदितिके गर्भमें आये। देवी अदितिने नौवें मासमें शुभ पुत्रको जन्म दिया। उस शिशुकी प्रभासे प्रसवगृहके वे दीपक निष्प्रभ हो गये ॥ ३५-३६ ॥ बुद्धिमान् कश्यपजीने शीघ्र ही शीतल जलसे स्नान करनेके अनन्तर स्वस्तिवाचनपूर्वक उस बालकका यथाविधि जातकर्म-संस्कार किया। तदनन्तर मातृपूजन करनेके अनन्तर नान्दीमुख श्राद्ध करके बालकको घृत तथा


[पूर्वार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]

मधुका प्राशन कराकर उसको देखा ॥ ३७-३८ ॥ उस बालकको ह्रस्व किंतु प्रशस्त मस्तकवाला, छोटे पैर, विशाल शरीरयुक्त एवं दिव्य ज्ञानसे समन्वित, दिव्य देहवाला, चार भुजाओंवाला तथा विविध प्रकारके अलंकरणोंसे समन्वित देखकर कश्यपजीने उसे साक्षात् विष्णु समझकर उसको प्रणाम किया और आनन्दित होकर कहा—आज मेरा तप, मेरा वंश, मेरे नेत्र, मेरा ज्ञान तथा मेरा यह आश्रम धन्य हो गया है। आप सच्चिदानन्द-स्वरूपका दर्शनकर आज यह धरती, स्वर्ग और रसातल भी धन्य हो गया है ॥ ३९-४१ ॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षि कश्यपके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे जगदीश्वर बोले—माता अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न होकर पृथिवीके महान् भारका हरण करनेके लिये तथा बड़े भ्राता देवराज इन्द्रके कार्यको सफल बनानेके लिये मैं आपके यहाँ पुत्ररूपमें प्रकट हुआ हूँ। ऐसा कहकर वे सामान्य बालक बनकर रोने लगे और उन्होंने माताके स्तनोंका पान किया ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनिने उस बालकका नामकरण, निष्क्रमण तथा अन्नप्राशन-संस्कार किया। तदुपरान्त तीसरे वर्षमें चूडाकरण और पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत- संस्कार सम्पन्न किया ॥ ४४ ॥


[अध्याय समाप्ति एवं नवीन अध्याय शीर्षक]

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वामनावतार-वर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥ ——— ❖ ——— इकतीसवाँ अध्याय पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना, वामनद्वारा गणेशकी आराधना, गणेशका प्रकट होकर वामनको दर्शन और अनेक वर देना, वामनभगवान्द्वारा बलिके यज्ञमें पधारना और तीन पग भूमिका दान प्राप्तकर अपने भक्त बलिको पाताल भेजना, वामनद्वारा स्थापित सुमुख नामक गणेश-प्रतिमाका माहात्म्य


[उत्तरार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]

ब्रह्माजी बोले—मुनि कश्यपजीने शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष—इन षट् अंगोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन बालक वामनको करवाया। एक दिन वामनने अपने पिताजीसे पूछा—[हे तात !] किस उपायके द्वारा देवताओं [-को उन]-के पदकी प्राप्ति होगी और पृथ्वीके भारका हरण कैसे होगा? उसे


[उत्तरार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]

आप मुझे यथार्थरूपसे बतलाइये ॥ १-२ ॥ कश्यप बोले—हे मेरे पुत्र! मैं तुम्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्रदान करूँगा, वह मन्त्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है और गणेशजीको प्रसन्न करनेवाला है। जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले, अनेक ब्रह्माण्डोंकी संरचना करनेवाले तथा सभी कारणोंके भी