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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

यहाँ पृष्ठ पर अंकित सम्पूर्ण पाठ का पंक्तिवार लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

क्री०ख०-अ०३१ ]    * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना *    ३४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[पूर्वार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]

यज्ञके प्रयत्नके विषयमें बताते हुए कहा—विरोचनका पुत्र बलि तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ३१॥ वह सौवाँ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कर लेनेके अनन्तर मेरे इन्द्रपदको ले लेगा। जब वे इतना कह ही पाये थे कि भगवान् विष्णुने सब कुछ जान लिया ॥ ३२॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुने इन्द्रके कष्टके विषयमें चिन्ता करते हुए उनसे कहा—हे इन्द्र! राजा बलि मेरा भक्त है। वह तपस्वी है तथा उसने अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है। वेदवचनोंके अनुसार उसे तपस्याके शुभ फलको प्राप्त करना चाहिये। शुभ या अशुभ जो भी कर्म किया जाता है, वह निष्फल नहीं होता ॥ ३३-३४ ॥ हे इन्द्र ! तुम अपना चित्त स्थिर करो। मैं तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा। तदनन्तर वे प्रभु देवी अदितिके गर्भमें आये। देवी अदितिने नौवें मासमें शुभ पुत्रको जन्म दिया। उस शिशुकी प्रभासे प्रसवगृहके वे दीपक निष्प्रभ हो गये ॥ ३५-३६ ॥ बुद्धिमान् कश्यपजीने शीघ्र ही शीतल जलसे स्नान करनेके अनन्तर स्वस्तिवाचनपूर्वक उस बालकका यथाविधि जातकर्म-संस्कार किया। तदनन्तर मातृपूजन करनेके अनन्तर नान्दीमुख श्राद्ध करके बालकको घृत तथा


[पूर्वार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]

मधुका प्राशन कराकर उसको देखा ॥ ३७-३८ ॥ उस बालकको ह्रस्व किंतु प्रशस्त मस्तकवाला, छोटे पैर, विशाल शरीरयुक्त एवं दिव्य ज्ञानसे समन्वित, दिव्य देहवाला, चार भुजाओंवाला तथा विविध प्रकारके अलंकरणोंसे समन्वित देखकर कश्यपजीने उसे साक्षात् विष्णु समझकर उसको प्रणाम किया और आनन्दित होकर कहा—आज मेरा तप, मेरा वंश, मेरे नेत्र, मेरा ज्ञान तथा मेरा यह आश्रम धन्य हो गया है। आप सच्चिदानन्द-स्वरूपका दर्शनकर आज यह धरती, स्वर्ग और रसातल भी धन्य हो गया है ॥ ३९-४१ ॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षि कश्यपके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे जगदीश्वर बोले—माता अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न होकर पृथिवीके महान् भारका हरण करनेके लिये तथा बड़े भ्राता देवराज इन्द्रके कार्यको सफल बनानेके लिये मैं आपके यहाँ पुत्ररूपमें प्रकट हुआ हूँ। ऐसा कहकर वे सामान्य बालक बनकर रोने लगे और उन्होंने माताके स्तनोंका पान किया ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनिने उस बालकका नामकरण, निष्क्रमण तथा अन्नप्राशन-संस्कार किया। तदुपरान्त तीसरे वर्षमें चूडाकरण और पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत- संस्कार सम्पन्न किया ॥ ४४ ॥


[अध्याय समाप्ति एवं नवीन अध्याय शीर्षक]

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वामनावतार-वर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥ ——— ❖ ——— इकतीसवाँ अध्याय पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना, वामनद्वारा गणेशकी आराधना, गणेशका प्रकट होकर वामनको दर्शन और अनेक वर देना, वामनभगवान्द्वारा बलिके यज्ञमें पधारना और तीन पग भूमिका दान प्राप्तकर अपने भक्त बलिको पाताल भेजना, वामनद्वारा स्थापित सुमुख नामक गणेश-प्रतिमाका माहात्म्य


[उत्तरार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]

ब्रह्माजी बोले—मुनि कश्यपजीने शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष—इन षट् अंगोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन बालक वामनको करवाया। एक दिन वामनने अपने पिताजीसे पूछा—[हे तात !] किस उपायके द्वारा देवताओं [-को उन]-के पदकी प्राप्ति होगी और पृथ्वीके भारका हरण कैसे होगा? उसे


[उत्तरार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]

आप मुझे यथार्थरूपसे बतलाइये ॥ १-२ ॥ कश्यप बोले—हे मेरे पुत्र! मैं तुम्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्रदान करूँगा, वह मन्त्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है और गणेशजीको प्रसन्न करनेवाला है। जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले, अनेक ब्रह्माण्डोंकी संरचना करनेवाले तथा सभी कारणोंके भी

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[शीर्षक एवं पृष्ठ संख्या] ३४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

कारणके महाकारणरूप उन विघ्नेश्वर गणेशजीके प्रसन्न हो जानेपर सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, अतः तुम उन्हें प्रसन्न करनेका यत्न करो ॥ ३-४ १/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**ऐसा कहकर मुनि कश्यपने उन्हें शुभ मुहूर्तमें गणेशजीका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ५ ॥ उसी समय वे बालक वामन मुनि कश्यपको प्रणामकर तथा उनसे आज्ञा प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक तपस्याहेतु उस आश्रमसे चल पड़े ॥ ६ ॥ इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने विदर्भदेशमें एक उत्तम स्थान देखा, जो लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा हुआ था और सरोवरसे सुशोभित था ॥ ७ ॥ वहाँ पद्मासनमें स्थित होकर बालक वामनने निराहार तथा जितेन्द्रिय होकर संवत्सरपर्यन्त उस शुभ षडक्षर मन्त्रका जप किया। उन बालक वामनकी वैसी निर्वाणावस्था (मनोयोग) देखकर भगवान् गणेश सिद्धि- बुद्धिके साथ प्रकट हुए। वे मयूरपर आरूढ़ थे तथा लम्बी सूँड़से सुशोभित हो रहे थे ॥ ८-९ ॥ उनकी दस भुजाएँ शोभित हो रही थीं, वे रत्नोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनकी नाभि विषधर सर्पसे सुशोभित हो रही थी। वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित थे ॥ १० ॥ दृढ़ निष्ठावाले अपने भक्तके पास वे उसी प्रकार आये, जैसे कोई धेनु अपने बछड़ेके समीप आती है। वामन अपने समक्ष अपने तेजसे सभी तेजोंको निष्प्रभ बना देनेवाले, सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले तथा सभी प्रकारके विघ्नोंका निवारण कर देनेवाले देवाधिदेव भगवान् गजाननका दर्शनकर अत्यन्त भक्तिभावसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११-१२ ॥ **वामन बोले—**मैं उन विघ्नराजकी वन्दना करता हूँ, जो स्वयं अव्यक्त हैं, किंतु (दृश्यमान जगत्‌के) कारणरूप हैं, जिनके स्वरूपकी वेदोंद्वारा वन्दना की गयी


[दायाँ स्तम्भ]

है, जो सभी देवोंके अधिदेव हैं, अनन्त ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर हैं, जगत्‌की सृष्टि करनेवाले हैं, सभी वेदान्तोंके द्वारा वेद्य हैं, मायासे परे हैं, स्वसंवेद्य हैं, जगत्‌का पालन तथा लय करनेवाले हैं, सभी विद्याओंके निधान हैं, सर्वेश्वर हैं, सर्वरूप हैं, सभी प्रकारके भयोंका निवारण करनेवाले हैं तथा जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त कमनीय है। नागोंके सहित ब्रह्मा, शंकर तथा मुनिजनोंद्वारा जो नित्य सेवित होते रहते हैं, जो तेजकी राशि हैं, तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले सत्स्वरूप हैं, तीनों गुणोंसे रहित अर्थात् गुणातीत हैं, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा बोध्य हैं, अपने भक्तोंके इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं, अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञानके प्रकाशक हैं, साम्ब आदिके द्वारा स्तूयमान हैं और जो सभी जीवोंके देहमें स्थित रहनेवाले तथा भुक्ति एवं मुक्तिको प्रदान करनेवाले हैं* ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकारसे स्तुति किये गये वे देवाधिदेव गजानन प्रसन्न होकर वामनसे बोले—मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, वैसा तुम वर माँगो। मैं तुम्हारी तपस्या तथा इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर वह तुम्हें प्रदान करूँगा ॥ १५ ॥ **वामन बोले—**हे जगदीश्वर! आपके यथार्थ स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता तथा सनक-सनन्दन आदि ब्रह्मर्षिगण भी नहीं जानते हैं, आज आपके उसी स्वरूपका मुझे दर्शन हुआ है, फिर आपसे मैं अन्य किसी दूसरे वरकी क्या याचना करूँ? ॥ १६ ॥ फिर भी आपका वचन भंग न हो, इस भयसे मैं आपसे वर माँगता हूँ। हे नाथ! उसे आप मुझे प्रदान करें। मुझे कभी भी पराजय प्राप्त न हो और सम्पूर्ण कार्योंमें मुझे विघ्नका कोई भय न हो ॥ १७ ॥ राजा बलि यज्ञके प्रभावसे इन्द्रके पदको प्राप्त


[पाद-टिप्पणी (मूल संस्कृत श्लोक)]

* अव्यक्तं व्यक्तहेतुं निगमनुततनुं सर्वदेवाधिदेवं ब्रह्माण्डानांमधीशं जगदुदयकरं सर्ववेदान्तवेद्यम्। मायातीतं स्ववेद्यं स्थितिविलयकरं सर्वविद्यानिधानं सर्वेशं सर्वरूपं सकलभयहरं कामदं कान्तरूपम् ॥ तं वन्दे विघ्नराजं विधिवरमुनिभिः सेव्यमानं सनागैः तेजोरार्शि त्रिसत्यं त्रिगुणविरहितं तत्त्वमस्यादिबोध्यम्। भक्तेच्छोपात्तदेहं निजजनसुखदं तत्त्वबुद्धिप्रकाशं साम्बाद्यैः स्तूयमानं सकलतनुगतं भुक्तिमुक्तिप्रदं तम् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३१।१३-१४)

क्री०ख०-अ०३१ ] * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना * ३४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

३४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- हे ब्रह्मन्! मैंने भूमि दे दी, [तब] संकल्प करवानेके | पदसे निवृत्त हो जानेके पश्चात् तुम ही उस पदको प्राप्त लिये उद्यत वामनने राजा बलिसे कहा- संकल्प कीजिये। | करोगे। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता उन प्रभु भगवान् उसी समय शुक्राचार्य दूसरा रूप धारणकर संकल्पजलकी | वामनकी स्तुति करने लगे ॥ ४१-४२ ॥ धाराको रोककर वैसे ही स्थित हो गये। तब राजा बलिने | देवताओंने उनके ऊपर पुष्पवर्षा की और वे विविध उस जलपात्र (कमण्डलु)-की टोंटीके अन्दर एक | वाद्योंको बजाने लगे। उन सबने भगवान् वामनकी पूजा तिनका प्रविष्ट कराया, जिससे भग्ननेत्र होकर शुक्राचार्य | की, उनके गीत गाये तथा दूसरे देवता नृत्य करने लगे। बाहर निकल आये ॥ ३५-३६ ॥ | तदनन्तर अनन्त पराक्रमवाले वे वामन भगवान् अन्तर्धान तब उन वामनके हाथमें बलिने संकल्पजल दिया। | हो गये। प्रसन्नमन होकर देवतागण जहाँसे आये थे, आनन्दविभोर होते हुए वामनने भगवान् गणेशका स्मरण | वहाँ-वहाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ४३-४४॥ किया और वे बढ़ने लगे। तदनन्तर अपने सिरसे | ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार देव वामनद्वारा स्थापित स्वर्गलोकका अतिक्रमणकर उन्होंने एक पैरसे आकाश | की गयी भगवान् गणेशजीकी वह मूर्ति तीनों लोकोंमें और पृथ्वीको तथा दूसरे पैरसे सभी पातालोंको नापकर | विख्यात हो गयी। वह मूर्ति मनुष्योंको सब प्रकारकी तीसरा पग बलिके मस्तकपर रख दिया ॥ ३७-३८ ॥ | कामना प्रदान करनेवाली है॥ ४५ ॥ तब भगवान् वामन बलिसे बोले—तुम पाताललोकमें | इस प्रकार मैंने राजा बलिके द्वारा की गयी सभी जाओ। तदनन्तर राजा बलिने उनसे कहा- आपको छोड़कर | चेष्टाओंका प्रसंगानुसार वर्णन किया। साथ ही भगवान् मैं कैसे जाऊँ? राजा बलिका यह वचन सुनकर भगवान् | वामनके बुद्धिकौशल तथा चातुर्यका और सुमुख गजाननकी वामन उनसे पुनः बोले- तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करनेके | महिमाका भी प्रतिपादन किया। उन महात्मा वामनने लिये तुम्हें मेरा सान्निध्य वहाँ भी प्राप्त होगा ॥ ३९-४० ॥ | रेवानदीके दक्षिण भागमें स्थित अदोष नामक नगरमें दस देवराज इन्द्र मेरी शरणमें आये थे, अतः मुझे | भुजाओंवाले उन सुमुख गजाननकी स्थापना की। अब उनका प्रिय करना था। तुम मेरे भक्त हो, अतः इसके | मैं उन भगवान् विनायकको शमीके प्रिय होनेके विषयमें अनन्तर तुम्हारा भी प्रिय होगा। देवराज इन्द्रके ऐन्द्र | स्पष्ट रूपसे आपसे वर्णन करूँगा ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बलिचेष्टित' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ बत्तीसवाँ अध्याय गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य, राजा प्रियव्रतका आख्यान, उनकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्तिद्वारा गणेशजीकी आराधना ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् व्यासजी ! आप सावधान | शमीपत्रको अर्पण करनेसे होती है ॥ २-३ ॥ होकर उस प्राचीन इतिहासको सुनिये, जिसे स्वयं | 'शमी' इस नामके उच्चारणमात्रसे ही वाणीद्वारा भगवान् गणेशजीने प्रियव्रतसे कहा था ॥ १ ॥ | किया गया समस्त पाप नष्ट हो जाता है। शमीका स्मरण गजानन बोले- हे आर्य! आप शमीपत्रकी महान् | करनेसे मानस पाप तथा उसका स्पर्श कर लेनेसे फलप्रद महिमाको सुनिये। न यज्ञोंके द्वारा, न दानोंसे, न | शारीरिक पाप नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ सैकड़ों-करोड़ व्रतोंसे, न जपोंसे अथवा न विविध | शमीका नित्य पूजन करनेसे, उसका ध्यान करनेसे प्रकारके पूजनोंसे, न कमलपुष्पोंके अर्पणसे और न अन्य | तथा श्रद्धाभक्तिसे उसका वन्दन करनेसे निर्विघ्नता, पुष्पोंसे मुझको वैसी सन्तुष्टि प्राप्त होती है, जैसी कि | आयुष्य तथा ज्ञानकी प्राप्ति होती है और पापका क्षय

क्री०ख०-अ०३२ ] गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य ३४७

क्री०ख०-अ०३२ ] * गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य * ३४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

भी हो जाता है। समस्त इच्छाओंकी पूर्ति हो जाती है और मनकी चंचलता दूर हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ५ १/२ ॥ मुनि व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! राजा प्रियव्रत कौन थे ? उनका कैसा स्वभाव था ? वे कहाँ उत्पन्न हुए थे ? महात्मा गजाननने उनसे शमीके गुणोंका किस प्रकार वर्णन किया था ? हे सुव्रत ! मेरे इस संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ६-७ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! इस विषयमें भी एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है, जो भगवान् शंकर तथा पार्वतीजीके संवादके रूपमें है ॥ ८ ॥

पार्वतीजी बोलीं—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे जगदीश्वर ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है, तो यह बतायें कि गजाननको शमी किस प्रकार प्रिय हुई ? ॥ ९ ॥ भगवान् शंकर बोले—हे प्रिये ! हे पवित्र मुस्कानवाली ! सुनो, मैं एक कथा कहूँगा, जिससे तुमको पता चलेगा कि गणेशजीको शमी कैसे प्रिय हुई ॥ १० ॥ पूर्वकालकी बात है, प्रियव्रत नामके एक महान् बुद्धिशाली राजा थे। वे सत्यवादी, धर्मपरायण, धर्मात्मा, प्रशंसनीय आचरणवाले, तेजस्वी, दान देनेवाले तथा वेद-शास्त्रोंके अर्थतत्त्वको जाननेवाले थे। वे सभी शुभ

लक्षणोंसे सम्पन्न और सर्वाधिक बलशाली चतुरङ्गिणी सेनासे समन्वित थे ॥ ११-१२ ॥ राजा प्रियव्रत अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते थे। उनकी पहली भार्याका नाम कीर्ति था तथा दूसरी भार्याका नाम प्रभा था। उनके धूर्त तथा कुशल नामक दो मन्त्री थे। वे दोनों नीतिशास्त्रमें अत्यन्त कुशल तथा कार्तिकेयके समान पराक्रमवाले थे ॥ १३-१४ ॥ उन्होंने अपनी बुद्धि तथा पराक्रमके बलपर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने अधीन कर लिया। राजा प्रियव्रतको उनकी भार्या प्रभाने अपने वशमें कर लिया था ॥ १५ ॥ राजा प्रियव्रत नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित, युवावस्थाके द्वारा आक्रान्त शरीरवाली तथा रम्भा आदि अप्सराओंसे भी अत्यन्त रमणीय उस प्रभाके साथ रात- दिन नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते रहते थे ॥ १६ ॥ वे क्षणभरके लिये भी उसका वियोग सह नहीं पाते थे। राजा प्रियव्रत अपनी ज्येष्ठ भार्या कीर्तिको सदा धिक्कारते रहते थे और यहाँतक कि उसकी कोई भी बात नहीं सुनते थे ॥ १७ ॥ वे क्रोधपूर्वक उसे देखते थे और उसकी मृत्युके बारेमें सोचा करते थे। वे न तो उससे कुछ बोलते थे और न कुछ उसका दिया हुआ ग्रहण करते थे ॥ १८ ॥ यथासमय उस प्रभाका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो प्रभाके पति अर्थात् राजा प्रियव्रतके समान ही था। राजाने उसका जातकर्म-संस्कार करके अनेक प्रकारके दान- धर्मका आचरण किया ॥ १९ ॥ राजाने ब्राह्मणोंद्वारा बताया गया 'पद्मनाभि' यह नाम उस शिशुका रखा। वह बालक उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षका चन्द्रमा बढ़ता है ॥ २० ॥ वह अपने पितासे भी अधिक बुद्धिमान् तथा युद्धमें अधिक कुशल था। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें पिता प्रियव्रतने उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कर दिया ॥ २१ ॥ मद्रदेशके अत्यन्त बुद्धिमान् तथा बलशाली राजा प्रियव्रतने पांचालनरेशकी कन्याको अपने पुत्रकी भार्या बनानेका निश्चय किया ॥ २२ ॥

३४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अत्यन्त वैभवशाली उन दोनों राजाओंने उन दोनोंका विवाह कर दिया। एक समयकी बात है, राजाकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्ति दास्यभावको प्राप्त होकर पाद-संवहन करनेकी दृष्टिसे पति प्रियव्रतके समीपमें आयी, किंतु सपत्नी प्रभाके द्वारा लात मारे जानेसे भूमिपर गिर पड़ी ॥ २३-२४ ॥ वह दुखी होकर, रोते हुए, लज्जित होते हुए अपने भवनमें चली आयी और सोचने लगी कि मैं अब किसकी शरणमें जाऊँ, कौन मेरे दुःखको दूर करेगा ? ॥ २५ ॥ सपत्नी (सौत)-के द्वारा अपमानित अब मेरे रक्षक स्वयं अव्यय भगवान् करुणासागर श्रीहरि ही होंगे, जो कि केवल स्मरणमात्र करनेसे द्रौपदीके रक्षक बने थे। जिस पत्नीको पति नहीं मानते हैं, उसे कोई दूसरा भी नहीं मानता, अतः अब जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है। मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगी, अथवा हालाहल विषका पान कर लूँगी अथवा जलपूर्ण वापीमें कूद जाऊँगी। इस प्रकार व्याकुल चित्तवाली भार्या कीर्तिका मन कुछ निश्चित नहीं कर पा रहा था ॥ २६-२८ ॥ दैववश उसी समय ब्राह्मणश्रेष्ठ पुरोहित देवल वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने रानीसे कहा कि तुम सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली तथा समस्त कष्टोंका हरण करनेवाली गणेशजीकी उपासना करो। तब रानी कीर्ति मन्दारवृक्षके काष्ठसे निर्मित प्रतिमाको शीघ्र लाकर पवित्र दिनमें स्नान करके उन गजाननका परम ध्यान-योगसे पूजन करनेके लिये बैठ गयी ॥ २९-३१ ॥ सभी जनोंके द्वारा भगवान् शिव, विष्णु, देवी दुर्गा तथा परम तेजसम्पन्न सूर्यको छोड़कर सबसे प्रथम देवाधिदेव गजाननकी ही पूजा की जाती है ॥ ३२ ॥ विचार करनेपर वास्तवमें इन पाँचों देवोंमें कोई भेद नहीं है। जो मनुष्य इनमें भेददृष्टि रखता है, वह नरकोंमें जाता है। परम आनन्दसे परिपूर्ण वह एक ही परमेश्वर लोकोंपर अनुग्रह करनेकी दृष्टिसे स्वेच्छानुसार पाँच रूपोंमें उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे कि एक ही पुरुष किसीका पुत्र तो किसीका मामा कहलाता है ॥ ३३-३४ ॥ कीर्तिने सोलह उपचारोंके द्वारा भलीभाँति उस मूर्तिका पूजन किया। उसने दूर्वा, पुष्प, दक्षिणा समर्पितकर अनेक बार उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर वह दोनों हाथ जोड़कर उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगी ॥ ३५-३६ ॥ कीर्ति बोली—आप ही जगत्के एकमात्र आधार हैं, आप ही सबके कारण हैं, आप ही ब्रह्मा तथा विष्णु हैं और आप ही विशाल सूर्य हैं ॥ ३७ ॥ आप ही चन्द्रमा, यम, वैश्रवण कुबेर, वरुण तथा वायुदेव हैं। आप ही समस्त सागर, सभी नदियाँ, लताएँ तथा पुष्पसमूह हैं। आप ही सुख और दुःख तथा सुख- दुःखके हेतु हैं। आप ही बन्धनरूप हैं और आप ही उस बन्धनसे मुक्त करानेवाले हैं, आप ही अभीष्ट कार्योंमें नित्य विघ्न उपस्थित करनेवाले और महान् विघ्नकर्ता तथा विराट् रूप हैं ॥ ३८-३९ ॥ आप ही पुत्र तथा लक्ष्मीको देनेवाले हैं और आप ही समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आप ही इस विश्वको उत्पन्न करनेवाले और आप ही विश्वके संहारक भी हैं। आप ही प्रकृति, आप ही पुरुष, निर्गुण तथा महान् हैं। आप ही चन्द्ररूप धारणकर समस्त जगत्का आप्यायन करते हैं ॥ ४०-४१ ॥ आप ही भूतकाल, वर्तमानकाल तथा भविष्यकाल और आप ही भावात्मक तथा स्वराट् हैं। आप समस्त प्राणियोंकी शरण हैं और शत्रुओंको परम सन्ताप प्रदान करनेवाले हैं। आप कर्मकाण्डपरायण यज्ञकर्ता हैं और आप ही ज्ञानकाण्डपरायण परम पवित्र हैं। आप सर्वज्ञ, सबके विधाता, सबके साक्षीस्वरूप तथा सर्वत्र गमन करनेवाले हैं ॥ ४२-४३ ॥ आप ही सर्वत्र व्याप्त और आच्छादक, सर्वसत्य- स्वरूप, प्रभु, सर्वमायामय और सभी मन्त्रों तथा तन्त्रोंके विधानको जाननेवाले हैं ॥ ४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'राजभार्याकृत गणेशाराधनाका वर्णन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

तैंतीसवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०३३ ] * प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन * ३४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तैंतीसवाँ अध्याय प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन, स्वप्नमें कीर्तिको अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानके प्रभावसे राजा प्रियव्रतका कीर्तिको धर्मपत्नीरूपमें स्वीकार कर लेना, यथासमय कीर्तिको 'क्षिप्रप्रसादन' नामक पुत्रकी प्राप्ति और सपत्नीद्वारा उसे विष देना, महर्षि गृत्समदद्वारा पुत्रको जिला देना, शमीका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे राजा प्रियव्रतकी वह ज्येष्ठ भार्या कीर्ति प्रतिदिन उन विनायककी पूजाकर उनकी स्तुति करने लगी। एक दिनकी बात है, उसकी सखियाँ दूर्वा लेनेके लिये वहाँ आयीं ॥ १ ॥ ज्येष्ठमास होनेके कारण उन्होंने कहीं भी शुभ दूर्वांकुरोंको प्राप्त नहीं किया। अतः वे बहुत-से शमीपत्रोंको लेकर उसके पास आयीं। वे बहुत थककर लौटी थीं, उन्होंने कीर्तिको बतलाया कि दूर्वा कहीं भी नहीं मिल पायी, अतः तुम सभी उपचारोंके साथ इन शमीपत्रोंसे विनायककी पूजा करो ॥ २-३ ॥ दूर्वा न मिलनेसे उस दिन वह निराहार रहकर अपने नियम-परायण रही। शमीपत्रोंके अर्पण करनेसे उन विनायकको परम सन्तुष्टि प्राप्त हुई ॥ ४ ॥ उस दिन वह कीर्ति विनायकदेवके समक्ष ही सो गयी। इसी प्रकार पूजन करते हुए जब उसे एक वर्ष व्यतीत हो चुका तो वर्षके पूरा होनेपर उसने एक अत्यन्त अद्भुत स्वप्न देखा कि वही विनायककी मूर्ति उससे इस प्रकार बोली—हे सुभ्रू ! तुम्हारे द्वारा शमीपत्रोंसे पूजित होनेके कारण मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ, मैं तुम्हें वर प्रदान करती हूँ। जब वह कीर्ति कुछ नहीं बोली तो वही विनायकमूर्ति पुनः उससे बोली— ॥ ५-६ ॥ मूर्ति बोली—तुम्हारा पति तुम्हारे अनुकूल हो जायगा, तुम अत्यन्त शुभ भोगोंको प्राप्त करोगी। तुम्हारा एक महाबलशाली पुत्र होगा, जो मुझमें भक्ति रखनेवाला होगा। तुम उसका 'क्षिप्रप्रसादन' यह सुन्दर नाम रखना। चौथे वर्षमें विषके द्वारा उसकी मृत्यु हो जायगी, किंतु तत्क्षण ही गृत्समद नामक द्विज वहाँ उपस्थित होकर उसे पुनः जीवित कर देंगे। क्षिप्रप्रसादन नामक वह पुत्र राज्यकर्ता, धर्मपरायण तथा चिरायु होगा। मुझे सन्तोष प्रदान करनेवाले इस (तुम्हारे द्वारा किये गये) स्तोत्रका जो पाठ करेगा, राजा भी उसके वशमें हो जायगा, फिर दूसरे किसी सामान्य जनकी क्या बात है ! ॥ ७-१० ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला पुत्रवान्, धनसम्पन्न और वेद-वेदांगका पारगामी विद्वान् हो जायगा। उसकी बुद्धि बढ़ेगी और मेधाशक्ति भी वृद्धिको प्राप्त होकर अत्यन्त दृढ़ हो जायगी। जो तीनों सन्ध्याकालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह अपने सभी अभिलषित पदार्थोंको प्राप्त कर लेगा, उसकी मुझमें दृढ़भक्ति हो जायगी और वह अन्तमें मोक्षको प्राप्त करेगा ॥ ११-१२ ॥ स्वप्नमें इस प्रकारके वरोंको प्रदान करके देव विनायक क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। कीर्ति जग पड़ी और उसकी आँखोंमें आँसू भर गये। आश्चर्यचकित हो वह मन-ही- मन कहने लगी कि दीनानाथ भगवान् विनायकने मेरे ऊपर महान् कृपा की है। उन्होंने जो मुझे साक्षात् दर्शन दिया, यह मुझपर महान् अनुग्रह है ॥ १३-१४ ॥ सभी प्राणियोंपर कृपा करनेवाले उन देव विनायकने अत्यन्त आदरके साथ आज मेरी रक्षा की है ॥ १५ ॥ यही परम सिद्धि है, यही परम तप है, यही परम लाभ है, जो कि उन देवने मेरे साथ वार्ता की है ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रभातकालमें उसने स्नान किया। वह परम आनन्दमें भरी हुई थी। उसने अत्यन्त श्रद्धाभक्तिके साथ वरदायी शुभ भगवान् गणेशका पूजन किया। उसने अपना व्रत पूर्णकर गणेशजीकी मूर्तिको पूर्ववाले स्थानपर स्थापित किया और पुरोहितको बुलाकर भक्तिपूर्वक गणेशजीका पूजन किया ॥ १७-१८ ॥ गणेशजीका मनसे ध्यान करते हुए कीर्ति उनके नाममन्त्रका जप करने लगी और वह उनके द्वारा प्रदत्त वरोंका स्मरण करते हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ १९ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर प्रारब्धानुसार एवं ईश्वरकी इच्छासे प्रभा नामवाली राजाकी वह छोटी रानी

३५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

प्रथम स्तम्भ (बायाँ स्तम्भ): कान्तिहीन तथा रक्त-पित्तके विकारसे ग्रस्त हो गयी॥ २०॥ उसके हाथों, पैरों तथा नाकसे नित्य रक्त निकलने लगा। वह अत्यन्त बीभत्स स्वरूपवाली हो गयी, तब पति राजा प्रियव्रतने मनसे उसका परित्याग कर दिया॥ २१॥ बहुत प्रयत्न करनेपर भी चिकित्सा-सम्बन्धी सभी उपायोंके विफल हो जानेपर अब राजा न तो उससे बोलते थे और न ही उसकी ओर देखते ही थे। तत्पश्चात् तपस्याके द्वारा अत्यन्त सुन्दर आकृतिवाली हो गयी कीर्तिके भवनमें [किसी समय] राजा गये। भगवान् गणेशकी कृपासे राजा प्रियव्रत स्वयं ही उसके वशीभूत हो गये। वे उसका हाथ पकड़कर उसे शय्यापर ले गये॥ २२-२३॥ वे कीर्तिमें एकनिष्ठावान् होकर उसके साथ स्वेच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे। नृपश्रेष्ठ प्रियव्रत क्षणभरके लिये भी उसका वियोग सहन नहीं कर पाते थे॥ २४॥ उस पतिपरायणा कीर्तिने भी अनेक प्रकारके भोगों तथा अलंकारोंका उपभोग किया। वह गर्भवती हुई और यथासमय उसने एक पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके जन्मसे हर्षित होकर राजा प्रियव्रतने ब्राह्मणोंको [उस] शुभ मुहूर्तमें यथायोग्य अनेक प्रकारके दानोंको दिया॥ २५-२६॥ उन्होंने पाँच ब्राह्मणोंको विभिन्न दिशाओंमें बैठाकर पुत्रका जातकर्म-संस्कार कराया और फिर उस बालकका ‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुसज्जित अपने पुत्रको देखकर राजाको अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ऐसे ही पुत्रका दर्शन करके रानी कीर्ति भी अत्यन्त आनन्दको प्राप्त हुई॥ २७-२८॥ सपत्नी कीर्तिके सुन्दर पुत्रको देखकर प्रभा अत्यन्त दुखी हो गयी। वह यह सोचने लगी कि ज्येष्ठा रानी कीर्तिका यह पुत्र ही आगे चलकर राजा होगा॥ २९॥ तब उसने दही-भातमें विष मिलाकर कीर्तिके पुत्रको खिला दिया। तब क्षणभरमें ही वह विह्वलताको प्राप्त हो गया और उसके नेत्र उलटे हो गये॥ ३०॥ तदनन्तर वह प्रभा स्वयं भी अत्यन्त आतुर होकर बड़े जोरसे शब्द करती हुई रोने लगी। प्रभाका वह कातर शब्द सुनकर कीर्ति उस बालकके पास वेगपूर्वक आयी। उसने उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको बड़े आदरके साथ राजाको बतलाया। तब राजाकी आज्ञासे वैद्योंने भी अनेक

द्वितीय स्तम्भ (दायाँ स्तम्भ): प्रकारकी औषधियाँ उस बालकको दीं॥ ३१-३२॥ उन्होंने विषके दोषका परीक्षण करके राजाको बताया कि नाना प्रकारके मन्त्रों तथा औषधियोंसे कोई भी लाभ नहीं हो पा रहा है। राजाने प्रभाको धिक्कारा और उसे घरसे दूर कर दिया। तदनन्तर कीर्ति उस बालकको लेकर सखियोंके साथ वनमें चली आयी॥ ३३-३४॥ जब वह नगरसे एक योजन दूर पहुँची थी कि उसी बीच उस बालककी मृत्यु हो गयी। अपनी गोदमें बालकको लेकर शोकसे विह्वल हुई वह कीर्ति रोने लगी। जिस प्रकार वायुके झोंकेसे लता भूमिपर गिर पड़ती है, वैसे ही वह भी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी। उसके आभूषण गिर गये। हाथका कंकण टूट गया और मस्तकपरसे आँचल खिसक गया॥ ३५-३६॥ क्षणभरके बाद जब उसे कुछ होश आया तो वह द्विरदानन भगवान् गणेशका स्मरण करने लगी। वह अपने नवजात शिशुकी उत्पत्ति तथा बालचेष्टाओंका स्मरण करते हुए अपनी छाती पीटने लगी॥ ३७॥ दैवयोगसे उसी समय उस मार्गसे गृत्समद नामवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा आ पड़े, वे साक्षात् सूर्यके समान तेजसे सम्पन्न थे। वे गणेशजीके भक्तोंमें सबसे अग्रणी तथा तपस्याकी परम निधि थे। दयार्द्र होकर वे वहीं रुक गये। तब उस कीर्तिने उन्हें प्रणाम किया॥ ३८-३९॥ वह लम्बी साँस लेते हुए बोली-गणेशजीकी कृपासे मुझे यह पुत्र प्राप्त हुआ, किंतु अब यह बालक मृत्युको प्राप्त हो गया है, इसे आप अपनी तपस्याके बलसे जीवित करनेकी कृपा करें॥ ४०॥ मैंने उन्हीं गणेश भगवान्‌की आज्ञासे इसका ‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। किंतु मेरी सपत्नीने दुष्ट भावसे भावित होकर इसे विष दे दिया॥ ४१॥ हे मुने! उसी कारण इसने ऐसी मृत्यु प्राप्त की है। हे तपोधन! सत्पुरुषोंका दर्शन विफल नहीं होता है, इसलिये मैं [आपसे इसका जीवन] माँग रही हूँ॥ ४२॥ साधुपुरुष शरणमें आये हुएके परित्यागकी इच्छा नहीं करते। कीर्तिका उस प्रकारका वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ वे गृत्समद क्षणभरके लिये ध्यानमें स्थित हो गये, तदनन्तर बोले-हे देवि! सुनो, मैं इस पुत्रको जीवित

क्री०ख०-अ०३४ ] * भृशुण्डीके शापसे औरव-पुत्रीका शमीवृक्षकी योनि-प्राप्तिका आख्यान * ३५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करनेका उपाय बताता हूँ। तुमने अज्ञानमें शमीपत्रोंके द्वारा | जिस पुण्यके प्रभावसे मेरा बालक विषके प्रभावका विनायककी जो पूजा की है, उससे प्राप्त पुण्यफलको तुम | परित्यागकर पुनः सुखी हो गया और शीघ्र ही जीवन मेरी आज्ञासे इसके हाथमें अर्पित करो ॥ ४३-४५ ॥ | प्राप्तकर उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे कि कोई सोया उस पुण्यके प्रभावसे इस समय शीघ्र ही तुम्हारा | हुआ उठ खड़ा होता है। इसी कारण मैं शमीपत्रके द्वारा पुत्र उठ खड़ा होगा। मुनि गृत्समदजीके इस प्रकारके | की गयी पूजाकी महिमाको आपसे पूछती हूँ ॥ ५२१/२ ॥ वचन सुनते ही वह कीर्ति आनन्दमें निमग्न हो गयी ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माजी बोले—उसका वह वचन सुनकर महर्षि उसने शमीपत्रोंद्वारा की गयी गणेशपूजाका उत्कट | गृत्समद उससे बोले— ॥ ५३ ॥ पुण्यफल अपने पुत्रको समर्पित कर दिया। उसी समय | गृत्समद बोले—जिसके नामका उच्चारण वह कीर्तिका पुत्र वैसे ही उठ खड़ा हो गया, जैसे कि | करनेमात्रसे करोड़ों पातक विनष्ट हो जाते हैं, उस उसपर अमृतकी वर्षा की गयी हो ॥ ४७ ॥ | शमीकी महिमाको सम्पूर्ण रूपसे बतानेमें इस पृथ्वीपर कीर्तिने अत्यन्त हर्षित होकर मुनिके चरणोंमें | कौन समर्थ है ? ॥ ५४ ॥ बार-बार सिर रखकर प्रणाम किया। वह उन मुनि | मैं अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपमें उसे बताता हूँ। गृत्समदसे कहने लगी कि आपने यह कैसे जाना कि मैंने | व्रत, दान, तपस्या, विविध तीर्थोंके सेवन, ग्रीष्ममें शमीपत्रोंद्वारा गणेशजीका पूजन किया है ? ॥ ४८ ॥ | पंचाग्निसाधना और हेमन्त ऋतुमें जलमें निवास करनेसे हे मुने! शमीपत्रद्वारा किये गये गणेशजीके पूजनके | वह फल प्राप्त नहीं होता, जो कि शमीपत्रोंके द्वारा उस पुण्य प्रभाव तथा उसकी महिमाको बतलानेकी कृपा | गणेशजीका पूजन करनेसे प्राप्त होता है ॥ ५५-५६ ॥ करें, जिसके प्रभावसे मेरा बालक जी उठा और | प्रातःकालमें अथवा तीनों सन्ध्याकालोंमें जो भगवान् यमकिंकरोंद्वारा मुक्त हो गया ॥ ४९ ॥ | गणेशजीका ध्यान करके भक्तिभावपूर्वक शमीका स्मरण ताकि शमीपत्रद्वारा की गयी गणेश-पूजाकी महिमाको | करता है, उसकी वन्दना करता है अथवा पूजन करता जानकर मैं नित्य उनका शमीपत्रोंद्वारा पूजन किया | है, भगवान् विनायक उसपर प्रसन्न हो जाते हैं, उसे करूँगी। जिस शमीपूजनके प्रभावसे अत्यन्त क्रूर, न रोके | मनोभिलषित पदार्थोंको देते हैं और अन्तमें मोक्ष प्राप्त करा जानेयोग्य भी यमदूतोंको गणनायके दूतोंने रणांगणमें बहुत | देते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इस विषयमें भी इस युद्ध करके परास्त कर दिया और फिर वे दूत मेरे पुत्रको | प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो देवर्षि नारदजी जीवित करके गजाननके धामको चले गये ॥ ५०-५१ ॥ | और महात्मा इन्द्रके बीच हुआ था ॥ ५७–५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालकके पुनः जीवित होनेका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥ ❖————❖ चौंतीसवाँ अध्याय महर्षि भृशुण्डीके शापसे ब्राह्मण औरवकी पुत्री शमीकाका शमीवृक्षकी तथा महर्षि शौनकके शिष्य धौम्यपुत्र मन्दारका मन्दारवृक्षकी योनि प्राप्त करनेका आख्यान कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन् ! देवर्षि नारदजी और | ब्रह्माजी बोले—उसका इस प्रकारका वचन देवराज इन्द्रके बीच जो संवाद हुआ था, उसे आप | सुनकर वे मुनि गृत्समद देवर्षि नारद तथा इन्द्रके बीच पूर्णरूपसे बताइये, उसे सुनकर मैं समस्त संशयोंको | जो संवाद हुआ था, उस इतिहासका वर्णन करने भुलाकर वैसे ही सन्तुप्त हो जाऊँगी, जैसी तृप्ति अमृत | लगे ॥ २ ॥ पीनेसे होती है ॥ १ ॥ | गृत्समद बोले—हे सुभ्रू ! एक बारकी बात है,

३५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तीनों लोकोंके भ्रमणमें निरत दिव्यदर्शन देवर्षि नारदजी स्वेच्छानुसार पर्यटन करते हुए इन्द्रके पास पहुँचे ॥ ३ ॥ हे शुभानने ! इन्द्रने उनकी पूजा की और [लोकोंके] विशेष समाचारके विषयमें पूछा। तब बुद्धिमान् नारदजीने जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ॥ ४ ॥ नारदजी बोले- मालव नामक देशमें औरव नामके एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे वेद-वेदांगोंके ज्ञाता तथा साक्षात् प्रकाशमान सूर्यके समान तेजस्वी थे। वे अपने मनकी शक्तिसे इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌की रचना करने, उसका पालन करने तथा विनाश करनेमें समर्थ थे। वे अपनी धर्मपत्नीमें ही निष्ठा रखते थे। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सोनेमें उनकी समान दृष्टि थी ॥ ५-६ ॥ वे अत्यन्त मेधावी, तपश्चर्यामें श्रेष्ठ तथा साक्षात् दूसरी अग्निके समान तेजस्वी थे। उनकी पत्नीका नाम सुमेधा था, जो परम धार्मिक थी। वह अत्यन्त लावण्यसम्पन्न, पतिको प्रिय तथा विविध प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित रहती थी, उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे कामदेवपत्नी रतिको भी तुच्छ बना दिया था और अप्सराओंके समूहोंको भी तिरस्कृत कर दिया था ॥ ७-८ ॥ वह अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती थी। पतिके द्वारा भी अत्यन्त आदरके साथ उसका पालन- पोषण होता था। उन दोनोंके एक कन्या हुई, उसका भी उन दोनोंने बड़े ही स्नेहसे लालन-पालन किया ॥ ९ ॥ उन दोनोंने अपनी इच्छाके अनुसार उसका 'शमीका' यह नाम रखा। वह कन्या जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करती थी, उसके सामर्थ्यवान् पिता वह-वह वस्तु उसे दे देते थे। वह रूपवती कन्या जब सात वर्षकी हो गयी, तो उसके पिता औरव उसके विवाहके लिये वरके विषयमें सोचने लगे ॥ १०-११ ॥ उन्होंने सुना कि महर्षि धौम्यका एक पुत्र है, वह मुनि वेद-शास्त्रोंमें पारंगत है, तेजकी परमराशि है और महर्षि शौनकका शिष्य है ॥ १२ ॥ वह गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला, महान् संयमी, गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला, शान्त स्वभाववाला तथा श्रेष्ठ था, उस मन्दार नामवाले ब्रह्मचारीको उन्होंने एक शुभ दिनमें बुलाकर अपनी गृहोक्त विधिके अनुसार उसे अपनी कन्या समर्पित कर दी और बहुत सारा दहेज भी दिया। विवाह हो जानेके अनन्तर मन्दार अपने आश्रममें चला आया ॥ १३-१४ ॥ शमीकाको युवावस्थासे सम्पन्न जानकर वह मन्दार पुनः वहाँ आया। औरवने अत्यन्त मान-सम्मानपूर्वक उसका पूजन किया। उसे भोजन कराकर, वस्त्र आदि तथा सुवर्ण प्रदानकर शुभ मुहूर्तमें उन दोनों कन्या तथा जामाताको विदा किया। उस समय ब्राह्मण औरवने अपने जामातासे कहा- ॥ १५-१६ ॥ हे ब्रह्मन् ! यह पुत्री मैंने आपको विधानपूर्वक सौंपी है, इसका आप बहुत स्नेहपूर्वक पालन करें, जैसा कि मैंने आजतक किया है। श्वशुरको प्रणामकर 'ऐसा ही होगा' यह कहकर मन्दार चल पड़ा और अपने आश्रमस्थलपर आकर वह अपनी भार्या शमीकाके साथ आनन्द-विहार करने लगा ॥ १७-१८ ॥ एक समयकी बात है, भृशुण्डी नामक श्रेष्ठ ऋषि उस मन्दारके आश्रममें आये। वे गणेशजीके महान् भक्त थे। रुष्ट होनेपर वे साक्षात् देदीप्यमान अग्निके समान और प्रसन्न होनेपर ईश्वरके समान हो जाते थे। तपस्या करते रहनेसे उनकी भ्रू (भौंह)-से शुण्डा (सूँड़) निकल आयी थी, इसीलिये वे भृशुण्डी नामसे विख्यात हो गये ॥ १९-२० ॥ उनका उदरदेश बहुत बड़ा था, शरीरकी आकृति विशाल थी। वे विविध प्रकारके अलंकरणोंसे मण्डित थे। मन्दार तथा शमीकाने उन्हें देखा। उनका वैसा विकृत रूप देखकर आनन्दित होकर उस समय वे दोनों हँसने लगे। तब वे अपने अपमानके भयसे दुखी होकर क्रुद्ध हो गये, उनकी आँखें लाल-लाल हो गयीं ॥ २१-२२ ॥ वे बोले-अरे मन्दबुद्धि! तुम मतवाले होकर मुझे नहीं जान रहे हो, इसी कारण दाँत खोलकर पत्नीसहित तुम मुझपर हँस रहे हो, अतः तुम दोनों सभी प्राणियोंद्वारा वर्जित वृक्षकी योनिको प्राप्त करो ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी बोले-शाप सुनकर वे दोनों अत्यन्त दुखी हो गये। प्रणाम करके वे दोनों बोले- हे ब्रह्मन् ! शापसे

क्री०ख०-अ०३४] * भृशुण्डीके शापसे औरव-पुत्रीका शमीवृक्षकी योनि-प्राप्तिका आख्यान * ३५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

पैंतीसवाँ अध्याय

३५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पैंतीसवाँ अध्याय महर्षि शौनक तथा ब्राह्मण औरवके समक्ष भगवान् गजाननका प्राकट्य और उन्हें शमी तथा मन्दारके माहात्म्यको बतलाना ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन दोनों ब्राह्मण औरव | कर सकते हैं?॥६॥ तथा महर्षि शौनकको दुखी देखकर हाथमें पाश धारण | आपकी महान् कृपा जिस व्यक्तिपर होती है, वह करनेवाले, दस भुजावाले भगवान् विनायक उनपर प्रसन्न | अपने प्रारब्धानुसार शुभाशुभ कर्मोंका भोग करता हुआ हुए और वे महातेजस्वी उनके समक्ष प्रकट हुए॥१॥ | तथा शरीर, वाणी एवं मनसे आपको प्रणिपात करता वे किरीट, कुण्डल, माला, बाजूबन्द तथा कटिसूत्र | हुआ जीवनकालमें ही मुक्त कहा जाता है॥७॥ धारण किये हुए थे। उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर | आप अपने भक्तोंके भक्तिभावसे सन्तुष्ट होकर रखा था। वे सिंहपर विराजमान थे और अग्निके समान | भाँति-भाँतिके रूपोंमें अवतीर्ण होकर उन सभीकी समस्त तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे॥२॥ | कामनाओंको पूर्ण करते हैं। आप इस संसार-सागरसे करोड़ों सूर्योंके समान आभावाले उस परम स्वरूपको | मुक्ति दिलानेवाले हैं। अतः आप विभुकी हम शरण देखकर वे दोनों हाथ जोड़कर उन विनायकदेवको | ग्रहण करते हैं*॥८॥ प्रणामकर उनकी स्तुति करने लगे॥३॥ | गणेश बोले—हे ब्राह्मणो! मैं आप लोगोंकी वे दोनों बोले—आप इस समस्त जगत्के बीज, | परम भक्तिसे, परम तपसे तथा आप दोनोंद्वारा की गयी इसके परम रक्षक और अपने भक्तोंको नाना प्रकारसे | इस श्रेष्ठ स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। आपलोग वर आनन्द प्रदान करनेवाले हैं। आप अपने प्रति आदर भाव | माँगैं॥९॥ रखनेवाले भक्तोंके पूजनसे प्रसन्न होकर उनके सभी | कुत्सित योनिसे मुक्ति प्रदान करनेवाले इस मेरे प्रकारके विघ्नोंका विनाश कर देते हैं और उनके महान्‌से | स्तोत्रका जो तीनों सन्ध्याकालोंमें तीन बार पाठ करेगा, भी महान् कार्योंको सम्पन्न कर देते हैं॥४॥ | वह सभी प्रकारके मनोरथोंको प्राप्त कर लेगा॥१०॥ आप पर से परे हैं, परमार्थस्वरूप हैं, वेदान्तके द्वारा | उसका छः मासतक पाठ करनेसे विद्याकी प्राप्ति वेद्य हैं, हृदयमें स्थित रहनेपर भी उससे परे हैं। आप | होती है और नित्य पाठ करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती सभी श्रुतियोंसे भी अगोचर हैं, इस प्रकारके स्वरूपवाले | है। जो इसका पाँच बार पाठ करता है, वह मनुष्य आयु अपने अभीष्टदेव आपको हम प्रणाम करते हैं॥५॥ | तथा आरोग्यको प्राप्त करता है॥११॥ न तो पद्मयोनि ब्रह्मा, न शंकर, न विष्णु, न इन्द्र, | ब्रह्माजी बोले—गणेशजीका वचन सुनकर वे न षडानन और न सहस्र सिरवाले शेषनाग ही आपके | दोनों बड़े आदरके साथ उनके चरणोंमें गिर पड़े [और मायावी स्वरूपको यथार्थरूपमें जान पाते हैं, तो हम | उनमें शौनकजी बोले]—हे देव! [इन] ब्राह्मण औरवकी आपके उस स्वरूपको इदमित्थंके रूपमें कैसे निश्चित | एक शमीका नामकी शुभ पुत्री थी। इन्होंने [मुझ]

  • तावूचतुः विश्वस्य बीजं परमोऽस्य पाता नानाविधानन्दकरः स्वकानाम्। निजार्चनेनादृतचेतसां त्वं विघ्नप्रहर्ता गुरुकर्यकर्ता॥ परात् परस्त्वं परमार्थभूतो वेदान्तवेद्यो हृदयान्तिगोऽपि। सर्वश्रुतीनां च न गोचरोऽसि नमाव इत्थं निजदैवतं त्वाम्॥ न पद्मयोनिर्न हरो हरिश्च हरिः षडास्यो न सहस्रमूर्धा। मायाविनस्ते न विदुः स्वरूपं कथं नु शक्यं परिनिश्चितुं तत्॥ तवानुकम्पा महती यदा स्याद् विभुब्जतः कर्म शुभाशुभं स्वम्। कायेन वाचा मनसा नमँस्त्वा जीवंश्च मुक्तो नर उच्यते सः॥ त्वं भावतुष्टो विदधासि कामान् नानाविधाकारतयाखिलानाम्। संसृत्यकूपारविमुक्तिहेतुः अतो विभुं त्वां शरणं प्रपन्नौ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३५।४-८)

क्री०ख०-अ०३५] * महर्षि शौनक तथा ब्राह्मण औरवके समक्ष भगवान् गजाननका प्राकट्य * ३५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] शौनकके शिष्य तथा धौम्य ऋषिके पुत्र बुद्धिमान् मन्दारके साथ अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया था। मन्दार वेदशास्त्रोंका ज्ञाता था॥ १२-१३॥ उन दोनोंने एक बार मार्गमें महर्षि भृशुण्डीको देखकर उनका अज्ञानपूर्वक उपहास कर दिया था। महर्षिने उनके उपहासको अपनी अवहेलना जानकर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन दोनोंको शाप दे दिया॥ १४॥ उनके शापसे वे दोनों मन्दार तथा शमीका वृक्षकी योनिको प्राप्त हो गये। उन दोनोंके माता-पिता शोकमें निमग्न होकर अत्यन्त दुखी हैं॥ १५॥ हे देव! हम दोनों भी बहुत दुखी हैं, अतः हम सभीके लिये जो प्रिय हो, आप वैसा करनेकी कृपा करें। हे गजानन! आप शीघ्र ही इन दोनोंको कुत्सित वृक्षयोनिसे मुक्त करें॥ १६॥ गजानन बोले—हे ब्राह्मणो! मैं असम्भव वरदान कैसे दे सकता हूँ और अपने भक्तके वचनको कैसे मिथ्या बना सकता हूँ, फिर भी मैं प्रसन्न होकर यह वरदान देता हूँ कि आजसे मैं निश्चित ही मन्दारवृक्षके मूलमें निवास करूँगा और यह मन्दारवृक्ष मृत्युलोक तथा स्वर्गलोकमें भी अत्यन्त पूज्य होगा॥ १७-१८॥ जो व्यक्ति मन्दारवृक्षकी जड़ोंसे मेरी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करेगा और शमीपत्रोंके द्वारा तथा दूर्वादलोंसे मेरा पूजन करेगा, [वह मुझे अत्यन्त प्रीति पहुँचायेगा; क्योंकि] ये तीनों संसारमें अत्यन्त दुर्लभ हैं॥ १९॥ हे मुनियो! क्योंकि मैं शमीका आश्रय लेकर सदा उसमें स्थित रहता हूँ। इसी कारण मैंने इन दोनों वृक्षोंको यह दुर्लभ वर दिया है॥ २०॥ आप दोनोंके अनुरोधवश ही मैंने ऐसा किया है, महर्षि भृशुण्डीजीका वचन अन्यथा नहीं हो सकता। दूर्वाके अभावमें मन्दारवृक्षके पत्तोंसे और दोनोंके अभावमें शमीपत्रोंसे मेरा पूजन विहित है॥ २१॥ शमीपत्रसे की गयी पूजा, दूर्वा तथा मन्दार— दोनोंसे की गयी पूजाका फल प्रदान करती है, इसमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे श्रेष्ठ द्विजो! विविध प्रकारके यज्ञों, विविध तीर्थोंके सेवन एवं व्रतोंसे

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] तथा विविध दानों एवं नियमोंके पालनसे व्यक्ति वह पुण्य नहीं प्राप्त करता है, जो पुण्यफल शमीपत्रोंके द्वारा मेरी पूजा करनेसे प्राप्त करता है॥ २२-२३॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! मैं न तो धन-वैभवसे, न सुवर्ण राशियोंसे, न विविध प्रकारके अन्नके दानोंसे, न वस्त्रोंसे, न विविध पुष्पोंके अर्पण करनेसे, न मणिसमूहोंसे, न मोतियोंसे वैसा सन्तुष्ट होता हूँ, जैसा कि शमीपत्रोंके पूजनसे, ब्राह्मणोंके पूजनसे और निरन्तर मन्दार पुष्पोंके समूहोंके पूजनसे प्रसन्न होता हूँ॥ २४॥ जो प्रातःकाल उठकर शमीका दर्शन करता है, उसे प्रणाम करता है और उसका पूजन करता है, वह न तो कष्ट, न रोग, न विघ्न और न बन्धनको ही प्राप्त होता है। मेरे कृपाप्रसादसे वह स्त्री, पुत्र, धन, पशु तथा अन्य भी सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है, मेरी शरण ग्रहण करनेसे वह अन्तमें मुक्ति प्राप्त करता है॥ २५-२६॥ मन्दारके पुष्पोंसे पूजनका भी यही फल बताया गया है। मन्दारकी मूर्ति बनाकर जिस घरमें मेरा पूजन किया जायगा, वहाँ मैं स्वयं विद्यमान रहूँगा और वहाँ न कभी अलक्ष्मीका प्रवेश होगा, न कोई विघ्न होंगे, न किसीकी अपमृत्यु होगी, न कोई ज्वरसे ग्रस्त होगा और न तो अग्नि तथा चोरका कोई भय ही कभी रहेगा॥ २७-२८॥ ब्राह्मण वेदवेदांगादि शास्त्रोंका ज्ञाता हो जायगा, क्षत्रिय सर्वत्र विजय प्राप्त करेगा, वैश्य समृद्धिसे सम्पन्न हो जायगा और शूद्र उत्तम गति प्राप्त करेगा॥ २९॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर वे देव गणेश उसी समय मन्दार वृक्षके मूलमें स्थित हो गये। इसी प्रकार वे देवाधिदेव विनायक शमीवृक्षके मूलमें भी प्रतिष्ठित हो गये। ब्राह्मण औरव भी पत्नीसहित तपस्यामें स्थित हो गये। उन्होंने शमीवृक्षके नीचे तपस्या की और वे अन्तमें उत्तम लोकको प्राप्त हुए॥ ३०-३१॥ शोकको प्राप्त हुए वे औरव ब्राह्मण अपने दृढ़ योगबलके प्रभावसे उसी शमीवृक्षके गर्भमें प्रविष्ट हो गये, तभीसे वे शमीगर्भ इस नामसे विख्यात अग्नि हो गये, लोकमें इसी कारण अग्निहोत्र करनेवाले अग्नि उत्पन्न करनेके लिये शमीकी लकड़ीका मन्थन (अरणि-

देव गजाननद्वारा उच्चरित वाणीको सुनकर महर्षि

३५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मन्थन) करते हैं॥ ३२१/२॥ देव गजाननद्वारा उच्चरित वाणीको सुनकर महर्षि शौनकने भी मन्दारवृक्षके मूलसे गजाननकी एक सुन्दर मूर्ति बनवाकर प्रसन्नतापूर्वक मन्दारपुष्पों, शमीपत्रों तथा दूर्वादलोंके द्वारा उसका पूजन किया॥ ३३-३४॥ भगवान् गजाननने प्रसन्न होकर महर्षि शौनकको अनेक वर प्रदान किये। तदनन्तर वे अपने आश्रममें चले आये और सर्वदा उस (मूर्ति)-का पूजन करने लगे॥ ३५॥ गृत्समद बोले—तबसे लेकर शमी भगवान् गणेशजीको अत्यन्त प्रिय हो गयी। इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण वृत्तान्त आपको बतलाया, पुनः आपसे कुछ और कहता हूँ॥ ३६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गजाननकृत शमीमन्दार-प्रशंसावर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥ छत्तीसवाँ अध्याय गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर विघ्नस्वरूप देवी सावित्रीका रुष्ट होना और उन देवों तथा मुनियोंको जलरूप (नदीरूप) प्राप्त करनेका शाप देना, पुनः ब्रह्माजीके कहनेपर देवपत्नियोंका शमीपत्रद्वारा गणेशजीका पूजन करना, प्रसन्न होकर गजाननका उन्हें दर्शन देना गृत्समद बोले—सह्याद्रिपर्वतके महाप्रभावसम्पन्न पुण्यक्षेत्रमें भगवान् शंकर देवी गिरिजा और अपने गणों तथा मुनियोंके साथ निवास करते थे॥ १॥ एक बारकी बात है, देवताओं, गन्धर्वों तथा किन्नरोंको साथ लेकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपनी दोनों पत्नियोंसहित भगवान् शिवका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये॥ २॥ भगवान् शंकरका दर्शनकर तथा उनकी पूजा करके ब्रह्माजीने अपने आगमनका कारण उन्हें बताया। तब भगवान् सदाशिवने जमदग्नि, वसिष्ठ, मार्कण्डेय, नारद, कपिल, पुलह, कण्व, विश्वामित्र, त्रित तथा द्वित—इन प्रधान ऋषियोंको वहाँ बुलाया॥ ३-४॥ भगवान् शिवके द्वारा बुलाये गये वे सभी ऋषि- महर्षि तथा अन्य भी सभी उनके दर्शनकी अभिलाषासे वहाँ आये। उन्होंने उषाकालमें शुभ मुहूर्त निकालकर यज्ञका समारम्भ किया॥ ५॥ शीघ्रतावश यज्ञारम्भ करते समय वे ऋषि-महर्षि मंगलमयी विनायकपूजाको करना भूल गये। उस समय ब्रह्माजीकी पत्नी देवी सावित्री गृहके कामोंमें लगी थीं, अतः उन मुनीश्वरोंने सावित्रीको छोड़कर ब्रह्माजीकी दूसरी पत्नी गायत्रीको ही बैठाकर पुण्याहवाचन किया। तदनन्तर मातृकापूजन करनेके पश्चात् आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया॥ ६-७॥ इसके पश्चात् वे मुनिगण ज्योंही अग्निकुण्डमें अग्निकी स्थापना करने लगे, त्योंही देवी सावित्री वहाँ उपस्थित हो गयीं और यज्ञका आरम्भ देखकर अत्यन्त क्रोधमें भर गयीं। क्रोधसे रक्त नेत्रवाली वे सभी सभासदोंको देखकर कहने लगीं॥ ८१/२॥

क्री०ख०-अ० ३६ ] * गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर सावित्रीका रुष्ट होना * ३५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

सावित्री बोलीं- मेरा तिरस्कार करके प्रारम्भ किया गया यह यज्ञ सफल नहीं होगा ॥ ९ ॥ ऋषि बोले- चराचर जगत्को जला डालनेकी इच्छासे अपने मुखसे अग्निकी ज्वालाको छोड़ते हुए उन्होंने देवताओं तथा मुनियोंको शाप दे डाला कि तुम सब जड़ हो जाओगे; क्योंकि तुम सबने यज्ञकी अनधिकारिणी उस गायत्रीको यज्ञमें नियुक्त किया ॥ १० ॥ तब देवता अत्यन्त दुखीमन होते हुए उन्हें प्रणाम करके सबकी जननी उन सावित्रीसे उच्च स्वरसे प्रार्थना करने लगे। हे शुभे ! ड और ल-में भेद न होनेके कारण हम जडरूप नहीं, अपितु जलरूप अर्थात् नदी-नदके रूपमें हो जायँगे ॥ ११-१२ ॥ उन देवी सावित्रीके द्वारा 'ऐसा ही हो' यह कहे जानेपर वे सभी देवता नदीरूपको प्राप्त हो गये। भगवान् महेश्वर वेणी नामक नदी बन गये तथा कृष्ण कृष्णा नामक नदी हो गये। इस प्रकार वे सभी देवता तत्तद् नामवाले नदी बन गये ॥ १३ १/२ ॥ जहाँपर अज्ञानियोंके द्वारा सर्वप्रथम विघ्नराज गणेशजीकी पूजा नहीं होती, वहाँ निश्चित ही विघ्न उपस्थित होते हैं, जैसे कि पूर्वकालमें त्रिपुरासुरके वधके समय गणेशजीका पूजन न करनेसे शंकरजीको विघ्न उपस्थित हुए थे ॥ १४-१५ ॥ यज्ञमें विघ्न उपस्थित हो जानेपर ब्रह्माजीको यह महान् चिन्ता हुई कि मेरे ही प्रयोजनके कारण सभी देवताओंको नदीरूप होना पड़ा। न जाने किस कर्मके कारण सभी लोकोंमें मेरा अपमान हो गया। मेरे संकल्पमें यह अत्यन्त कठिन बाधा आज कैसे उपस्थित हुई ? ॥ १६-१७ ॥ इस यज्ञके प्रारम्भमें विघ्नोंका हरण करनेवाले जगन्नाथ गणेशजीका न तो स्मरण किया गया और न उनकी पूजा ही हुई, इसी कारण सभी देवता मोहमें पड़ गये। अब मैं उन गणेशजीको प्रसन्न करूँगा, तदनन्तर यज्ञ सम्पन्न होगा। ब्रह्माजी जब इस प्रकारसे विचार कर ही रहे थे कि उसी समय सभी देवांगनाएँ देवताओंको नदीरूपमें परिवर्तित जानकर ब्रह्माजीके समीपमें आयीं ॥ १८-१९ १/२ ॥ पुलोमाकी पुत्री शची इन्द्राणी, पार्वती, छाया, कमला तथा अन्य भी देवपत्नयाँ उन कमलासन ब्रह्माजीसे कहने लगीं- आपने यज्ञ कैसे आरम्भ किया ? जो मान्य थे, उनकी पूजा क्यों नहीं की? आपने सर्वप्रथम विघ्नोंका हरण करनेवाले गजाननकी पूजा क्यों नहीं की? आप यदि भूल गये थे तो देवोंने क्यों नहीं आपको स्मरण दिलाया ? ॥ २०-२२ ॥ अब हमारे द्वारा क्या किया जाना चाहिये अथवा जलरूपधारी देवोंको क्या करना चाहिये ? हे कमलोद्भव ब्रह्माजी ! हे देव ! आपको छोड़कर अब हम किसकी शरणमें जायँ ? उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर ब्रह्माजी उनसे बोले-आपलोग भयभीत न हों, मैं ऐसा यज्ञ करूँगा, जिससे आप सभी लोगोंका कल्याण होगा ॥ २३-२४ ॥ भगवान् गजाननके प्रसन्न हो जानेपर उनके भक्तोंके लिये क्या असाध्य रहता है! आप सब लोग उनकी आराधना कीजिये, वे गणेश आप सभीका प्रिय करेंगे ॥ २५ ॥ मैं भी जगत्के ईश्वर, सभी कारणोंके भी परम कारण तथा आदि-अन्तसे रहित, उन भगवान् विनायकको प्रसन्न करूँगा। इस प्रकारसे कही गयीं वे सभी देवियाँ ब्रह्माजीके निर्देशानुसार दूरस्थित कल्याणकारी कर्नाटक देशको गयीं और वे वहाँ मन्दारवृक्षके मूलमें स्थित विघ्नेशका ध्यान करने लगीं ॥ २६-२७ ॥ उन विघ्नेश विनायककी पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने वक्रतुण्डनामसे स्थापना की थी और उनसे विविध वरोंको प्राप्तकर वे भगवान् श्रीराम प्रधान राक्षसोंको मारकर विजयी हुए थे। साथ ही विख्यात राक्षसराज रावणका वधकर अपनी पत्नी सीताको प्राप्तकर उन्होंने अपना धाम प्राप्त किया था। वहींपर उन सभी देवांगनाओंने कठोर तप किया ॥ २८-२९ ॥ कोई देवी गणेशजीके नाममन्त्रका जप करने लगी, कोई उनका मन्त्र जपने लगी और कोई पद्मासनमें स्थित होकर उन परमेश्वर गणेशका ध्यान करने लगी ॥ ३० ॥ कोई वीरासनमें स्थित हो गयी, कोई निराहार व्रतमें स्थित हो गयी। कोई-कोई मन्दिरके दरवाजोंकी, चौराहोंकी

३५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तथा घरोंकी सफाई करने लगी ॥ ३१ ॥ कोई-कोई प्रदक्षिणा तथा बार-बार नमस्कार करती हुई श्रेष्ठ आराधना करने लगी, कोई पैरके एक अँगूठेमें खड़ी होकर विनायकके ध्यानमें निमग्न हो गयी ॥ ३२ ॥ कोई नेत्रोंको बन्द करके उनके स्तोत्रोंका पाठ करने लगी। इस प्रकार आराधना करते हुए बहुत-सा समय व्यतीत हो जानेपर भी वे विनायक प्रसन्न नहीं हुए ॥ ३३ ॥ तब वे अत्यन्त चिन्तित हो उठीं और अब हम क्या करें, ऐसा सोचते हुए व्याकुल हो गयीं। तदनन्तर कुछ देवियोंने पुष्पोंकी विशाल राशिको, दूसरी देवियोंने बहुतसे दूर्वादलोंको समर्पित करके धूप, दीप, नैवेद्य तथा स्वर्णद्वारा देव विनायकका पूजन किया। किसी देवीने मन्दारके पुष्पोंसे तथा किसीने स्वर्णकमलोंद्वारा उनकी पूजा की ॥ ३४-३५॥ तभी उन्होंने आकाशवाणी सुनी कि 'शमीपत्रके बिना की गयी पूजासे विभु गणेश प्रसन्न नहीं होते'। तदनन्तर उन सभी देवियोंने शमीपत्रोंके द्वारा परम भक्तिभावसे उन देवाधिदेव गजाननकी पूजा की। शमीदलोंके द्वारा पूजित होनेपर दयार्द्रहृदय होकर वे भगवान् गणेश उनके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। उस समय वे चार भुजाओंके द्वारा अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने किरीट तथा बाजूबन्द धारण कर रखा था। माला तथा कुण्डलोंसे वे मण्डित थे ॥ ३६-३८ ॥ उनके कान लम्बे थे। उनका गण्डस्थल सुशोभित हो रहा था। वे दो दाँतोंसे मण्डित थे। वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित थे। उनका वाहन मूषक भी साथमें था। वे पीले वस्त्रोंको धारण किये हुए थे। उन सभी देवियोंने करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाले उन भगवान् गणेशका दर्शन किया। उन्होंने अपनी आँखोंको बन्द करके भूमिपर गिरकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३९-४० ॥ उनका दर्शनकर उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न हो गया, वे परम आनन्दमें निमग्न हो गयीं, तब उन्होंने सौम्य तेजसे आच्छन्न विग्रहवाले उन भगवान् गजाननकी स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी और मन्दारकी प्रशंसाका वर्णन' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥ सैंतीसवाँ अध्याय देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति, गजाननसे वर प्राप्तकर देवोंको पुनः अपने पूर्ववत् स्वरूपकी प्राप्ति, देवताओंद्वारा हेरम्ब गणपति की मूर्तिका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, ब्रह्माजीद्वारा मन्दारकाष्ठसे निर्मित गणेशप्रतिमाका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, मन्दार तथा शमीके माहात्म्यका वर्णन कीर्ति बोली- हे महामुने! उन देवियोंने किस प्रकारसे उन गजाननकी स्तुति की, उसे मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ मुनि बोले- हे कीर्ते ! उस स्तुतिको मैं बताता हूँ, तुम ध्यान देकर उसे सुनो ॥ १ १/२ ॥ वे बोलीं- हे सर्वरूप ! आपको नमस्कार है, आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है। सब कुछ करनेवाले आपको नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करनेवाले कृपालु गणेशजीको नमस्कार है। सबका संहार करनेवालेको नमस्कार है। अनन्त शक्तिसे सम्पन्न आपको नमस्कार है। सबको ज्ञान प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। सबकी रक्षा करनेवाले तथा सबके आदिमें विद्यमान रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥ २-३ ॥ आप परब्रह्मस्वरूप हैं तथा निर्गुण हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। चिदानन्दस्वरूप आपको नमस्कार है, वेदोंसे भी अगोचर आपको नमस्कार है। आप मायाके आश्रय हैं, अपरिमेय हैं, गुणातीत हैं, आपको नमस्कार है। सत्यस्वरूप, अनन्तरूप और सत्त्वादि गुणोंमें विक्षोभ उत्पन्न करनेवालेको नमस्कार है ॥ ४-५ ॥ शरणागतोंका पालन करनेवाले तथा दैत्यों और दानवोंका भेदन करनेवाले आप गणेशजीको नमस्कार

क्री०ख०-अ०३७ ] * देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति * ३५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] है। आप विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं, नाना प्रकारके अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ६ ॥ अपने हाथोंमें अनेक आयुध धारण करनेवालेको नमस्कार है। सभी शत्रुओंका विनाश करनेवालेको नमस्कार है। हे भक्तोंके हितकारक ! अनेक वर प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है१॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उनकी स्तुति करके पुनः उन्हें प्रणाम करके उन्होंने बहुत-से वरोंकी याचना की ॥ ७१/२ ॥ वे बोलीं—हे देव ! जलरूपताको प्राप्त देवताओंको आप उनका पूर्व स्वरूप प्रदान करें तथा आप ऐसी कृपा करें कि हम कभी भी आपका विस्मरण न करें, सर्वदा स्मरण करते रहें ! ॥ ८१/२ ॥ गणेशजी बोले—तुम सबने अपनी पूजा- आराधनाके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लिया है। अतः मैं तुम सबकी मनोभिलषित वाञ्छाको अवश्य पूर्ण करूँगा। तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर 'तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' ऐसा वचन मैं देता हूँ ॥ ९१/२ ॥ देवी सावित्रीके कथनानुसार सभी देवता मंगलमय जलरूपमें परिणत हुए हैं। उन देवीके वचनको अन्यथा करनेमें पितामह ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, अतः सभी देवता एक अंशसे जलस्वरूप (नदीरूप) - को प्राप्त करनेपर भी अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त करेंगे और अपने- अपने अधिकारोंको प्राप्त करेंगे। मेरा कहा हुआ मिथ्या नहीं होगा। तुम सभी देवांगनाएं एवं देवगण यहाँपर शमीपत्रोंके द्वारा मेरा पूजन करो ॥ १०-१२ ॥ जिसने मुझे शमीपत्र अर्पित कर दिया, उसने मानो सम्पूर्ण भुवन ही मुझे प्रदान कर दिया, उसे सौ भार सुवर्ण२

[दायाँ स्तम्भ] दान करनेका फल प्राप्त होगा। इसमें कोई संशय नहीं ॥ १३ ॥ ब्रह्माजी बोले—विघ्नेश्वर गणेशजीके इस प्रकारसे कहनेपर सभी देवता अपने-अपने स्वरूपमें स्थित हो गये और अंशरूपसे वे नदीरूपमें भी स्थित रहे। तब उन्होंने विनायकका दर्शन किया ॥ १४ ॥ वे देवता भगवान् गजाननको प्रणाम करके तथा उनकी स्तुति करके प्रार्थना करने लगे कि हे देव ! आप हमारे अपराधको क्षमा करें। हमने बुद्धिमें मोह उत्पन्न हो जानेके कारण बिना आपका पूजन किये और पितामह ब्रह्माजीकी ज्येष्ठ पत्नी देवी सावित्रीकी उपेक्षाकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया था और उसका फल भी तत्काल हमने देख लिया, अब आपकी कृपासे हमने अपना पुनः नवीन रूप प्राप्त किया है। आपकी कृपासे हम परमानन्दको प्राप्त हुए हैं। ऐसा कहकर उन्होंने शमीपत्रोंके द्वारा विनायकका पूजन किया ॥ १५-१७ ॥ वे विघ्ननाशन विनायक भी उन देवताओंको आनन्दित करके अन्तर्धान हो गये। तब उन देवताओंने गणेशजीकी पत्थरकी एक शुभ मूर्ति बनायी, जो चार भुजाओंवाली थी और हाथीके सूँडयुक्त मुखवाली थी, उस मूर्तिको उन्होंने 'हेरम्ब' यह नाम रखा। साथ ही एक श्रेष्ठ मन्दिर बनवाकर उसमें उस मूर्तिको बड़े ही आदरपूर्वक स्थापित किया ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर सभी लोगोंपर उपकार करनेकी दृष्टिसे वे देवता बोले—जो व्यक्ति विद्याके अधीश्वर इन हेरम्ब गणपतिका इस उत्तम नगरमें भक्तिपूर्वक पूजन करेगा, उसके ऊपर प्रसन्न होकर भगवान् हेरम्ब उसकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करेंगे। इन हेरम्बका वन्दन करनेसे, स्मरण करनेसे अथवा प्रणाम करनेसे गजानन पूर्वोक्त फल प्रदान करेंगे, इसमें कोई संशय नहीं ॥ २०-२१ ॥


[पाद-टिप्पणी / Footnotes] १-नमस्ते सर्वरूपाय सर्वान्तर्यामिणे नमः । नमः सर्वकृते तुभ्यं सर्वदात्रे कृपालवे ॥ नमः सर्वविनाशाय नमस्तेऽनन्तशक्तये । नमः सर्वप्रबोधाय सर्वपात्रेऽखिलादये ॥ परब्रह्मस्वरूपाय निर्गुणाय नमो नमः । चिदानन्दस्वरूपाय वेदानामप्यगोचर ॥ मायाश्रयायामेयाय गुणातीताय ते नमः । सत्यायानन्तरूपाय गुणविक्षोभकारिणे ॥ शरणागतपालाय दैत्यदानवभेदिने । नमो नानावताराय विश्वरक्षणतत्पर ॥ अनेकायुधहस्ताय सर्वशत्रुनिबर्हण । अनेकवरदात्रे ते भक्तानां हितकारक ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३७। २-७) २-दो हजार पल सुवर्णका मान एक भारके बराबर होता है।

३६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वहाँपर पूर्वमें मन्दारवृक्षके काष्ठसे निर्मित जो | बतायी है। इस महिमाका श्रवण करनेसे सभी पाप विनायकजीकी विशाल मूर्ति थी, उसे ग्रहणकर इन्द्र परम | विनष्ट हो जाते हैं ॥ २८ ॥ ऋद्धिशाली अपनी पुरी अमरावतीमें ले गये ॥ २२ ॥ | तभीसे लेकर मंगलमयी शमी भगवान् गणेशको वे प्रभु इन्द्र आज भी सपत्नीक उस मूर्तिकी | अत्यन्त प्रिय हो गयी। तुम्हारे द्वारा अनजानमें भी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। तदनन्तर उन सभी देवताओंने | [शमीदलोंके द्वारा] जो विनायककी पूजा हो गयी थी, भी अपने-अपने लोकमें मन्दारकाष्ठकी गणेशमूर्ति बनाकर | उसीके फलस्वरूप तुम्हारा पुत्र जीवित होकर उठ खड़ा शमीपत्रोंके द्वारा उनकी पूजा की। इसके फलस्वरूप वे | हुआ है। मन्दारकी भी महिमा मैंने भलीभाँति निरूपित सभी अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ परम आनन्दको प्राप्त | कर दी। [हे कीर्ते!] अब अनुमति दो, मैं अपने हुए और उन्होंने उत्तम भोगोंको प्राप्त किया ॥ २३-२४ ॥ | आश्रमको जाऊँगा ॥ २९-३० ॥ ब्रह्माजीने बारह वर्षोंतक परम तप करके भगवान् | ब्रह्माजी बोले-शमी तथा मन्दारकी महिमाको विघ्नेश्वरको प्रसन्न करनेके अनन्तर पुनः यज्ञ किया ॥ २५ ॥ | सुननेके अनन्तर रानी कीर्तिने अपने पुत्रके कल्याणके उन ब्रह्माजीने भी मन्दारकाष्ठसे विघ्नराज गणपतिकी | लिये गणपतिमन्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३१ ॥ एक वरदायिनी मूर्ति बनवाकर अत्यन्त आदरके साथ | गणेशजीकी प्रीतिको बढ़ानेवाले इस श्रेष्ठ आख्यानका शमीपत्रोंके द्वारा अनेक बार उसका पूजन किया। उन्होंने | जो श्रवण करता है, वह व्यक्ति कभी भी संकटको प्राप्त स्वर्णपत्रों, दूर्वा, मन्दारपुष्पों, केतकीके पुष्पों तथा श्वेत | नहीं होता और अपनी समस्त कामनाओंको प्राप्त कर दूर्वांकुरोंके द्वारा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उस | लेता है। जो व्यक्ति सर्वदा प्रातःकाल उठकर शमी, मूर्त्तिका पूजन किया ॥ २६-२७ ॥ | मन्दार तथा गणेशजीका श्रद्धाभक्तिपूर्वक स्मरण करता गृत्समद बोले-हे मातः ! हे शुभे ! इस प्रकार | है, वह सभी पापोंसे रहित हो जाता है और सुखी होता मैंने अत्यन्त संक्षेपमें मन्दार तथा शमीकी महिमा तुम्हें | है ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी तथा मन्दारके माहात्म्यका वर्णन' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥ अड़तीसवाँ अध्याय रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा गणेशजीके 'ढुण्ढिराज' नामक चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश, ढुण्ढिराज गणेशका माहात्म्य, काशीविश्वनाथ तथा गंगाजीकी महिमा, भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा शंकरजीकी आराधना और वरप्राप्ति कीर्ति बोली-हे ब्रह्मन् ! आपने शमीकी महिमाका | कीजिये, जो सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य हो, भलीभाँति बड़े आदरके साथ वर्णन किया और मन्दारके | गणेशजीको भलीभाँति प्रसन्न करनेवाला हो और अपने माहात्म्यको भी बतलाया, उससे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो | राज्यको प्राप्त करानेवाला हो, साथ ही वह मन्त्र ऐसा रही है। हे मुनीश्वर ! आपने मेरे इस पुत्रको जीवन प्रदान | हो कि जिसका जप करनेमें बालक भी समर्थ हो ॥ ३ ॥ किया है और इसे गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश भी | गृत्समद बोले-[हे देवि!] भगवान् गजाननके दिया है, किंतु अभी छोटा बालक होनेके कारण यह उस | चरणकमलोंमें लगी हुई तुम्हारी बुद्धिको मैंने भलीभाँति मन्त्रका उच्चारण करनेमें समर्थ नहीं हो पायेगा ॥ १-२ ॥ | समझ लिया है, अतः मैं गणेशजीका सुख प्रदान अतः हे मुने ! आप इसे इस समय ऐसा मन्त्र प्रदान | करनेवाला स्वयं का मन्त्र इसे प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥

क्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] जिन भगवान् विनायकका चार अक्षरोंवाला [ढुण्ढिराज] नाम सम्पूर्ण जगत्‌का कारणभूत है, जो [ढुण्ढिराज] शुभ तथा अशुभ कर्मोंके साक्षी हैं, दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं, सभी धर्मोंकी रक्षा करनेवाले हैं, काशीके राजा दिवोदासका उपकार करनेवाले हैं, जो वाराणसीमें द्विजका रूप धारण करके विराजमान हैं, जिन्होंने भगवान् विश्वनाथके लिये अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करनेके लिये प्रयत्न किया था, जो सर्वान्तर्यामी हैं, विश्वेश्वरद्वारा जिनकी स्तुति की गयी हैं, संसारका पालन करनेके लिये जो जनार्दन भगवान् विष्णुद्वारा स्तुत हैं, सृष्टि करनेके लिये पितामह ब्रह्माजीद्वारा जिनकी पूजा की जाती है और जिनका ध्यान किया जाता है, सम्पूर्ण जगत्‌के विनाशके लिये जो भगवान् शिवद्वारा पूजित होते हैं, पुलोमाकी पुत्री शचीके स्वामी देवराज इन्द्रके द्वारा दैत्योंका संहार करनेके लिये तथा देवताओंके राज्यसुखकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक जिनका पूजन किया गया है; सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, यम, अग्नि तथा वायुदेवने भी अपने-अपने अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये जिनका पूजन किया है, साथ ही देवगुरु बृहस्पति तथा दैत्यगुरु शुक्राचार्यने भी अपने उत्कर्षके लिये जिनकी पूजा की है, जिन ढुण्ढिराज गणेशकी आराधना शेषनागने पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये की है। साथ ही गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, राक्षस, ऋषिगण, पशु तथा सभी शुभ स्थावर तथा जंगम प्राणी अपने-अपने कार्योंकी सिद्धिके लिये जिन विश्वके स्वामी भगवान् गणेशजीकी आराधना करते हैं, वे अखिल जगत्‌के स्वामी ही ढुण्ढिराज कहलाते हैं, वे अपार गुणोंसे भी परे हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवोंने जिनके गुणोंका पार नहीं पाया है। उन भगवान् ढुण्ढिराजका तुम्हारे द्वारा भक्तिभावपूर्वक शमीपत्रोंसे पूजन होनेपर निश्चित ही तुम्हारा पुत्र शत्रुओंका नाश करनेवाला और राज्यका अधिकारी बनेगा ॥ ५-१५॥ कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन्! मैंने ढुण्ढिराजसम्बन्धी सम्पूर्ण महिमाका श्रवण किया। वे ढुण्ढिराज कौन-सा कर्म करनेवाले हैं, किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ, वे

[दायाँ स्तम्भ] किसके अंश हैं, उनका पराक्रम कैसा है? किसने उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम रखा, पूर्वकालमें वे किसके द्वारा पूजित हुए? हे ब्रह्मन्! मेरे इस संशयका आप पूर्णतः निराकरण करनेकी कृपा करें ॥ १६-१७॥ मुनि बोले—हे भद्रे! हे शुभे! तुमने और भी अधिक जाननेकी इच्छासे बहुत अच्छी बात पूछी है। तुमने भक्तिभावसे इस विषयमें पूछा है, अतः मैं तुम्हारे संशयको दूर करता हूँ ॥ १८॥ जिस प्रकारसे उन ढुण्ढिराजने दुरासद नामक दैत्य तथा अनेक राक्षसोंका वध किया, जिस प्रकारसे वे मायासे रूप धारणकर श्रेष्ठ राजा दिवोदासको मोहित करने गये थे, जिस उपायसे वे विश्वेश्वर भगवान् शिवको अविमुक्तक्षेत्र काशीमें लाये थे और हे नृपांगना ! जैसे उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम पड़ा था, वह सब मैं उसी प्रकार बताता हूँ, जिस प्रकारसे कि मैंने स्कन्दजीके द्वारा महर्षि अगस्त्यजीके प्रति कहते हुए सुना था। हे शुभे! उसीको तुम एकाग्रमन होकर सुनो ॥ १९-२१॥ स्कन्द बोले—हे ब्रह्मन् अगस्त्यजी! आप अविमुक्त- क्षेत्रसम्बन्धी उस कथाको ध्यानपूर्वक सुनिये, जिसके सुननेमात्रसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥ एक बारकी बात है, भगवान् श्रीहरिने महर्षि कश्यपजीसे कहा था कि आप विविध प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये। तब उन्होंने तपस्या करके उसके प्रभावसे प्राणियोंकी मैथुनी सृष्टि की। उन्होंने इक्कीस हजार योनियोंवाले अण्डज, उतने ही स्वेदज तथा उतने ही उद्भिज्ज प्राणियोंकी सृष्टि की। इन चार प्रकारकी योनियोंमें मनुष्ययोनि अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २३-२४॥ वह मनुष्यजन्म बड़े ही पुण्यसे प्राप्त होता है, उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म और भी विशेष पुण्यसे प्राप्त होता है। सम्यक् रूपसे धर्मका पालन और अधर्मका परित्याग करते हुए यदि उस ब्राह्मणत्वकी रक्षा की जाय तो वह उस परम धामको प्राप्त कराता है, जहाँसे फिर यहाँ पुनरागमन नहीं होता। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकता ही रहता है ॥ २५-२६॥ दुराचरण करनेवाले प्राणी नारकीय यातनाओंका

३६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] भोग करते हैं। बहुत समयतक इसी प्रकार यातनाओंको भोगते हुए पापकर्मोंके क्षीण हो जानेपर वे पुनः मृत्युलोकमें आते हैं और काने, बौने तथा दरिद्री होते हैं। उन प्राणियोंपर दया करनेके लिये ब्रह्मा, शिव आदि देवोंने तथा महाभाग ऋषियोंने विविध प्रकारके तीर्थों तथा अत्यन्त पवित्र क्षेत्रोंको बनाया है, जो प्राणियोंके पापोंका हरण कर लेनेवाले हैं॥ २७-२८॥ उन तीर्थस्थलों तथा पुण्यक्षेत्रोंमें देवता तथा ऋषिगण जीवोंके पापोंको विनष्ट करते हुए विराजमान रहते हैं, उन तीर्थोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। पापोंसे प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये देवता तथा ऋषि सदा ही उन तीर्थोंमें निवास करते हैं॥ २९-३०१/२॥ भगवान् विश्वनाथने सर्वगुणसम्पन्न, सबसे श्रेष्ठ, भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करनेवाली, मंगलमयी वाराणसी नामकी पुरीका निर्माण किया था, वह पुरी ध्यान करनेवाले तथा ज्ञानी जनोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है तथा सर्वतीर्थमयी और अत्यन्त रमणीय है॥ ३१-३२॥ जहाँपर तपस्या करते समय सर्वसामर्थ्यसम्पन्न भगवान् विष्णुने [अपने चक्रसे] प्रसिद्ध चक्र-सरोवरका निर्माण किया था, जो अत्यन्त सुन्दर है और स्नानमात्र कर लेनेसे मुक्ति प्रदान करनेवाला है। जिसका दर्शनकर

[दायाँ स्तम्भ] भगवान् शिवजीके कन्धोंमें कम्पन होनेसे उनके कानोंमें पहने हुए कुण्डलोंसे [निकलकर] मणि उस चक्रसरोवरमें गिर पड़ी थी, तभीसे वह चक्रसरोवर तीर्थ 'मणिकर्णिका' नामसे प्रख्यात हो गया॥ ३३-३४॥ तदनन्तर राजर्षि भगीरथद्वारा आहूत की गयी भागीरथी गंगा नदी वहाँ आयीं। यहाँ मृत्युके प्राप्त होनेपर कीट-पतंगोंतककी मुक्ति होती है॥ ३५॥ गंगाजीका तीन बार मात्र नाम ले लेनेसे वे काशीवासका फल प्रदान करनेवाली हो जाती हैं। [वास्तवमें] वहाँकी लताएँ, झाड़ियाँ, तृण तथा वृक्ष भी धन्य ही हैं, अन्य स्थानोंके नहीं। गंगामें रहनेवाले कछुए तथा मत्स्य भी मृत्युके पश्चात् [रूपवान्] पृथ्वीके कैलास (काशी)- को छोड़कर उस धाममें जाते हैं, जहाँ रूपातीत भगवान् शिव नाना रूप धारणकर स्थित रहते हैं॥ ३६-३७॥ वे गिरिजापति भगवान् शंकर ही सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, ब्रह्मा, विनायक तथा शक्तिस्वरूपा दुर्गा हैं और वे ही इस जगत्के कारणस्वरूप हैं॥ ३८॥ प्रलयकालमें वे काशीपुरीको अपने त्रिशूलके अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। वे एक ही परमेश्वर शिव लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये पाँच स्वरूपों (शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश तथा सूर्य)-में हो जाते हैं॥ ३९॥ भक्तगण जिस-जिस स्वरूपका ध्यान करते हैं, भगवान् शंकर तत्क्षण ही वैसा स्वरूप धारण कर लेते हैं। इन पाँचों देवोंमें जो भेद मानता है, वह मनुष्य अवीची नामवाले नरकोंको प्राप्त होता है॥ ४०॥ जो व्यक्ति एक ओर तो इन पंचदेवोंमेंसे किसी एककी स्तुति करता है और दूसरी ओर किसी देवकी निन्दा करता है, वह बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंमें पड़ा रहता है। भस्मासुर नामक राक्षसका दुरासद नामका एक प्रसिद्ध पुत्र था। उसने शुक्राचार्यजीके पास जाकर भगवान् शंकरकी पंचाक्षरी विद्या ('नमः शिवाय' मन्त्र) प्राप्त किया॥ ४१-४२॥ एक हजार दिव्य वर्षोंतक वह एक पैरके अँगूठेपर निराहार रहकर खड़ा रहा। वह सूखे काष्ठके समान हो गया था। उसके सारे शरीरमें दीमकोंने बाँबी बना ली थी,