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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

३५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पैंतीसवाँ अध्याय महर्षि शौनक तथा ब्राह्मण औरवके समक्ष भगवान् गजाननका प्राकट्य और उन्हें शमी तथा मन्दारके माहात्म्यको बतलाना ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन दोनों ब्राह्मण औरव | कर सकते हैं?॥६॥ तथा महर्षि शौनकको दुखी देखकर हाथमें पाश धारण | आपकी महान् कृपा जिस व्यक्तिपर होती है, वह करनेवाले, दस भुजावाले भगवान् विनायक उनपर प्रसन्न | अपने प्रारब्धानुसार शुभाशुभ कर्मोंका भोग करता हुआ हुए और वे महातेजस्वी उनके समक्ष प्रकट हुए॥१॥ | तथा शरीर, वाणी एवं मनसे आपको प्रणिपात करता वे किरीट, कुण्डल, माला, बाजूबन्द तथा कटिसूत्र | हुआ जीवनकालमें ही मुक्त कहा जाता है॥७॥ धारण किये हुए थे। उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर | आप अपने भक्तोंके भक्तिभावसे सन्तुष्ट होकर रखा था। वे सिंहपर विराजमान थे और अग्निके समान | भाँति-भाँतिके रूपोंमें अवतीर्ण होकर उन सभीकी समस्त तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे॥२॥ | कामनाओंको पूर्ण करते हैं। आप इस संसार-सागरसे करोड़ों सूर्योंके समान आभावाले उस परम स्वरूपको | मुक्ति दिलानेवाले हैं। अतः आप विभुकी हम शरण देखकर वे दोनों हाथ जोड़कर उन विनायकदेवको | ग्रहण करते हैं*॥८॥ प्रणामकर उनकी स्तुति करने लगे॥३॥ | गणेश बोले—हे ब्राह्मणो! मैं आप लोगोंकी वे दोनों बोले—आप इस समस्त जगत्के बीज, | परम भक्तिसे, परम तपसे तथा आप दोनोंद्वारा की गयी इसके परम रक्षक और अपने भक्तोंको नाना प्रकारसे | इस श्रेष्ठ स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। आपलोग वर आनन्द प्रदान करनेवाले हैं। आप अपने प्रति आदर भाव | माँगैं॥९॥ रखनेवाले भक्तोंके पूजनसे प्रसन्न होकर उनके सभी | कुत्सित योनिसे मुक्ति प्रदान करनेवाले इस मेरे प्रकारके विघ्नोंका विनाश कर देते हैं और उनके महान्‌से | स्तोत्रका जो तीनों सन्ध्याकालोंमें तीन बार पाठ करेगा, भी महान् कार्योंको सम्पन्न कर देते हैं॥४॥ | वह सभी प्रकारके मनोरथोंको प्राप्त कर लेगा॥१०॥ आप पर से परे हैं, परमार्थस्वरूप हैं, वेदान्तके द्वारा | उसका छः मासतक पाठ करनेसे विद्याकी प्राप्ति वेद्य हैं, हृदयमें स्थित रहनेपर भी उससे परे हैं। आप | होती है और नित्य पाठ करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती सभी श्रुतियोंसे भी अगोचर हैं, इस प्रकारके स्वरूपवाले | है। जो इसका पाँच बार पाठ करता है, वह मनुष्य आयु अपने अभीष्टदेव आपको हम प्रणाम करते हैं॥५॥ | तथा आरोग्यको प्राप्त करता है॥११॥ न तो पद्मयोनि ब्रह्मा, न शंकर, न विष्णु, न इन्द्र, | ब्रह्माजी बोले—गणेशजीका वचन सुनकर वे न षडानन और न सहस्र सिरवाले शेषनाग ही आपके | दोनों बड़े आदरके साथ उनके चरणोंमें गिर पड़े [और मायावी स्वरूपको यथार्थरूपमें जान पाते हैं, तो हम | उनमें शौनकजी बोले]—हे देव! [इन] ब्राह्मण औरवकी आपके उस स्वरूपको इदमित्थंके रूपमें कैसे निश्चित | एक शमीका नामकी शुभ पुत्री थी। इन्होंने [मुझ]

  • तावूचतुः विश्वस्य बीजं परमोऽस्य पाता नानाविधानन्दकरः स्वकानाम्। निजार्चनेनादृतचेतसां त्वं विघ्नप्रहर्ता गुरुकर्यकर्ता॥ परात् परस्त्वं परमार्थभूतो वेदान्तवेद्यो हृदयान्तिगोऽपि। सर्वश्रुतीनां च न गोचरोऽसि नमाव इत्थं निजदैवतं त्वाम्॥ न पद्मयोनिर्न हरो हरिश्च हरिः षडास्यो न सहस्रमूर्धा। मायाविनस्ते न विदुः स्वरूपं कथं नु शक्यं परिनिश्चितुं तत्॥ तवानुकम्पा महती यदा स्याद् विभुब्जतः कर्म शुभाशुभं स्वम्। कायेन वाचा मनसा नमँस्त्वा जीवंश्च मुक्तो नर उच्यते सः॥ त्वं भावतुष्टो विदधासि कामान् नानाविधाकारतयाखिलानाम्। संसृत्यकूपारविमुक्तिहेतुः अतो विभुं त्वां शरणं प्रपन्नौ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३५।४-८)