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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 656 में से

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पृष्ठ 357

क्री०ख०-अ०३५] * महर्षि शौनक तथा ब्राह्मण औरवके समक्ष भगवान् गजाननका प्राकट्य * ३५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] शौनकके शिष्य तथा धौम्य ऋषिके पुत्र बुद्धिमान् मन्दारके साथ अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया था। मन्दार वेदशास्त्रोंका ज्ञाता था॥ १२-१३॥ उन दोनोंने एक बार मार्गमें महर्षि भृशुण्डीको देखकर उनका अज्ञानपूर्वक उपहास कर दिया था। महर्षिने उनके उपहासको अपनी अवहेलना जानकर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन दोनोंको शाप दे दिया॥ १४॥ उनके शापसे वे दोनों मन्दार तथा शमीका वृक्षकी योनिको प्राप्त हो गये। उन दोनोंके माता-पिता शोकमें निमग्न होकर अत्यन्त दुखी हैं॥ १५॥ हे देव! हम दोनों भी बहुत दुखी हैं, अतः हम सभीके लिये जो प्रिय हो, आप वैसा करनेकी कृपा करें। हे गजानन! आप शीघ्र ही इन दोनोंको कुत्सित वृक्षयोनिसे मुक्त करें॥ १६॥ गजानन बोले—हे ब्राह्मणो! मैं असम्भव वरदान कैसे दे सकता हूँ और अपने भक्तके वचनको कैसे मिथ्या बना सकता हूँ, फिर भी मैं प्रसन्न होकर यह वरदान देता हूँ कि आजसे मैं निश्चित ही मन्दारवृक्षके मूलमें निवास करूँगा और यह मन्दारवृक्ष मृत्युलोक तथा स्वर्गलोकमें भी अत्यन्त पूज्य होगा॥ १७-१८॥ जो व्यक्ति मन्दारवृक्षकी जड़ोंसे मेरी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करेगा और शमीपत्रोंके द्वारा तथा दूर्वादलोंसे मेरा पूजन करेगा, [वह मुझे अत्यन्त प्रीति पहुँचायेगा; क्योंकि] ये तीनों संसारमें अत्यन्त दुर्लभ हैं॥ १९॥ हे मुनियो! क्योंकि मैं शमीका आश्रय लेकर सदा उसमें स्थित रहता हूँ। इसी कारण मैंने इन दोनों वृक्षोंको यह दुर्लभ वर दिया है॥ २०॥ आप दोनोंके अनुरोधवश ही मैंने ऐसा किया है, महर्षि भृशुण्डीजीका वचन अन्यथा नहीं हो सकता। दूर्वाके अभावमें मन्दारवृक्षके पत्तोंसे और दोनोंके अभावमें शमीपत्रोंसे मेरा पूजन विहित है॥ २१॥ शमीपत्रसे की गयी पूजा, दूर्वा तथा मन्दार— दोनोंसे की गयी पूजाका फल प्रदान करती है, इसमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे श्रेष्ठ द्विजो! विविध प्रकारके यज्ञों, विविध तीर्थोंके सेवन एवं व्रतोंसे

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] तथा विविध दानों एवं नियमोंके पालनसे व्यक्ति वह पुण्य नहीं प्राप्त करता है, जो पुण्यफल शमीपत्रोंके द्वारा मेरी पूजा करनेसे प्राप्त करता है॥ २२-२३॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! मैं न तो धन-वैभवसे, न सुवर्ण राशियोंसे, न विविध प्रकारके अन्नके दानोंसे, न वस्त्रोंसे, न विविध पुष्पोंके अर्पण करनेसे, न मणिसमूहोंसे, न मोतियोंसे वैसा सन्तुष्ट होता हूँ, जैसा कि शमीपत्रोंके पूजनसे, ब्राह्मणोंके पूजनसे और निरन्तर मन्दार पुष्पोंके समूहोंके पूजनसे प्रसन्न होता हूँ॥ २४॥ जो प्रातःकाल उठकर शमीका दर्शन करता है, उसे प्रणाम करता है और उसका पूजन करता है, वह न तो कष्ट, न रोग, न विघ्न और न बन्धनको ही प्राप्त होता है। मेरे कृपाप्रसादसे वह स्त्री, पुत्र, धन, पशु तथा अन्य भी सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है, मेरी शरण ग्रहण करनेसे वह अन्तमें मुक्ति प्राप्त करता है॥ २५-२६॥ मन्दारके पुष्पोंसे पूजनका भी यही फल बताया गया है। मन्दारकी मूर्ति बनाकर जिस घरमें मेरा पूजन किया जायगा, वहाँ मैं स्वयं विद्यमान रहूँगा और वहाँ न कभी अलक्ष्मीका प्रवेश होगा, न कोई विघ्न होंगे, न किसीकी अपमृत्यु होगी, न कोई ज्वरसे ग्रस्त होगा और न तो अग्नि तथा चोरका कोई भय ही कभी रहेगा॥ २७-२८॥ ब्राह्मण वेदवेदांगादि शास्त्रोंका ज्ञाता हो जायगा, क्षत्रिय सर्वत्र विजय प्राप्त करेगा, वैश्य समृद्धिसे सम्पन्न हो जायगा और शूद्र उत्तम गति प्राप्त करेगा॥ २९॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर वे देव गणेश उसी समय मन्दार वृक्षके मूलमें स्थित हो गये। इसी प्रकार वे देवाधिदेव विनायक शमीवृक्षके मूलमें भी प्रतिष्ठित हो गये। ब्राह्मण औरव भी पत्नीसहित तपस्यामें स्थित हो गये। उन्होंने शमीवृक्षके नीचे तपस्या की और वे अन्तमें उत्तम लोकको प्राप्त हुए॥ ३०-३१॥ शोकको प्राप्त हुए वे औरव ब्राह्मण अपने दृढ़ योगबलके प्रभावसे उसी शमीवृक्षके गर्भमें प्रविष्ट हो गये, तभीसे वे शमीगर्भ इस नामसे विख्यात अग्नि हो गये, लोकमें इसी कारण अग्निहोत्र करनेवाले अग्नि उत्पन्न करनेके लिये शमीकी लकड़ीका मन्थन (अरणि-