श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मन्थन) करते हैं॥ ३२१/२॥ देव गजाननद्वारा उच्चरित वाणीको सुनकर महर्षि शौनकने भी मन्दारवृक्षके मूलसे गजाननकी एक सुन्दर मूर्ति बनवाकर प्रसन्नतापूर्वक मन्दारपुष्पों, शमीपत्रों तथा दूर्वादलोंके द्वारा उसका पूजन किया॥ ३३-३४॥ भगवान् गजाननने प्रसन्न होकर महर्षि शौनकको अनेक वर प्रदान किये। तदनन्तर वे अपने आश्रममें चले आये और सर्वदा उस (मूर्ति)-का पूजन करने लगे॥ ३५॥ गृत्समद बोले—तबसे लेकर शमी भगवान् गणेशजीको अत्यन्त प्रिय हो गयी। इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण वृत्तान्त आपको बतलाया, पुनः आपसे कुछ और कहता हूँ॥ ३६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गजाननकृत शमीमन्दार-प्रशंसावर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥ छत्तीसवाँ अध्याय गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर विघ्नस्वरूप देवी सावित्रीका रुष्ट होना और उन देवों तथा मुनियोंको जलरूप (नदीरूप) प्राप्त करनेका शाप देना, पुनः ब्रह्माजीके कहनेपर देवपत्नियोंका शमीपत्रद्वारा गणेशजीका पूजन करना, प्रसन्न होकर गजाननका उन्हें दर्शन देना गृत्समद बोले—सह्याद्रिपर्वतके महाप्रभावसम्पन्न पुण्यक्षेत्रमें भगवान् शंकर देवी गिरिजा और अपने गणों तथा मुनियोंके साथ निवास करते थे॥ १॥ एक बारकी बात है, देवताओं, गन्धर्वों तथा किन्नरोंको साथ लेकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपनी दोनों पत्नियोंसहित भगवान् शिवका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये॥ २॥ भगवान् शंकरका दर्शनकर तथा उनकी पूजा करके ब्रह्माजीने अपने आगमनका कारण उन्हें बताया। तब भगवान् सदाशिवने जमदग्नि, वसिष्ठ, मार्कण्डेय, नारद, कपिल, पुलह, कण्व, विश्वामित्र, त्रित तथा द्वित—इन प्रधान ऋषियोंको वहाँ बुलाया॥ ३-४॥ भगवान् शिवके द्वारा बुलाये गये वे सभी ऋषि- महर्षि तथा अन्य भी सभी उनके दर्शनकी अभिलाषासे वहाँ आये। उन्होंने उषाकालमें शुभ मुहूर्त निकालकर यज्ञका समारम्भ किया॥ ५॥ शीघ्रतावश यज्ञारम्भ करते समय वे ऋषि-महर्षि मंगलमयी विनायकपूजाको करना भूल गये। उस समय ब्रह्माजीकी पत्नी देवी सावित्री गृहके कामोंमें लगी थीं, अतः उन मुनीश्वरोंने सावित्रीको छोड़कर ब्रह्माजीकी दूसरी पत्नी गायत्रीको ही बैठाकर पुण्याहवाचन किया। तदनन्तर मातृकापूजन करनेके पश्चात् आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया॥ ६-७॥ इसके पश्चात् वे मुनिगण ज्योंही अग्निकुण्डमें अग्निकी स्थापना करने लगे, त्योंही देवी सावित्री वहाँ उपस्थित हो गयीं और यज्ञका आरम्भ देखकर अत्यन्त क्रोधमें भर गयीं। क्रोधसे रक्त नेत्रवाली वे सभी सभासदोंको देखकर कहने लगीं॥ ८१/२॥