श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ० ३६ ] * गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर सावित्रीका रुष्ट होना * ३५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
सावित्री बोलीं- मेरा तिरस्कार करके प्रारम्भ किया गया यह यज्ञ सफल नहीं होगा ॥ ९ ॥ ऋषि बोले- चराचर जगत्को जला डालनेकी इच्छासे अपने मुखसे अग्निकी ज्वालाको छोड़ते हुए उन्होंने देवताओं तथा मुनियोंको शाप दे डाला कि तुम सब जड़ हो जाओगे; क्योंकि तुम सबने यज्ञकी अनधिकारिणी उस गायत्रीको यज्ञमें नियुक्त किया ॥ १० ॥ तब देवता अत्यन्त दुखीमन होते हुए उन्हें प्रणाम करके सबकी जननी उन सावित्रीसे उच्च स्वरसे प्रार्थना करने लगे। हे शुभे ! ड और ल-में भेद न होनेके कारण हम जडरूप नहीं, अपितु जलरूप अर्थात् नदी-नदके रूपमें हो जायँगे ॥ ११-१२ ॥ उन देवी सावित्रीके द्वारा 'ऐसा ही हो' यह कहे जानेपर वे सभी देवता नदीरूपको प्राप्त हो गये। भगवान् महेश्वर वेणी नामक नदी बन गये तथा कृष्ण कृष्णा नामक नदी हो गये। इस प्रकार वे सभी देवता तत्तद् नामवाले नदी बन गये ॥ १३ १/२ ॥ जहाँपर अज्ञानियोंके द्वारा सर्वप्रथम विघ्नराज गणेशजीकी पूजा नहीं होती, वहाँ निश्चित ही विघ्न उपस्थित होते हैं, जैसे कि पूर्वकालमें त्रिपुरासुरके वधके समय गणेशजीका पूजन न करनेसे शंकरजीको विघ्न उपस्थित हुए थे ॥ १४-१५ ॥ यज्ञमें विघ्न उपस्थित हो जानेपर ब्रह्माजीको यह महान् चिन्ता हुई कि मेरे ही प्रयोजनके कारण सभी देवताओंको नदीरूप होना पड़ा। न जाने किस कर्मके कारण सभी लोकोंमें मेरा अपमान हो गया। मेरे संकल्पमें यह अत्यन्त कठिन बाधा आज कैसे उपस्थित हुई ? ॥ १६-१७ ॥ इस यज्ञके प्रारम्भमें विघ्नोंका हरण करनेवाले जगन्नाथ गणेशजीका न तो स्मरण किया गया और न उनकी पूजा ही हुई, इसी कारण सभी देवता मोहमें पड़ गये। अब मैं उन गणेशजीको प्रसन्न करूँगा, तदनन्तर यज्ञ सम्पन्न होगा। ब्रह्माजी जब इस प्रकारसे विचार कर ही रहे थे कि उसी समय सभी देवांगनाएँ देवताओंको नदीरूपमें परिवर्तित जानकर ब्रह्माजीके समीपमें आयीं ॥ १८-१९ १/२ ॥ पुलोमाकी पुत्री शची इन्द्राणी, पार्वती, छाया, कमला तथा अन्य भी देवपत्नयाँ उन कमलासन ब्रह्माजीसे कहने लगीं- आपने यज्ञ कैसे आरम्भ किया ? जो मान्य थे, उनकी पूजा क्यों नहीं की? आपने सर्वप्रथम विघ्नोंका हरण करनेवाले गजाननकी पूजा क्यों नहीं की? आप यदि भूल गये थे तो देवोंने क्यों नहीं आपको स्मरण दिलाया ? ॥ २०-२२ ॥ अब हमारे द्वारा क्या किया जाना चाहिये अथवा जलरूपधारी देवोंको क्या करना चाहिये ? हे कमलोद्भव ब्रह्माजी ! हे देव ! आपको छोड़कर अब हम किसकी शरणमें जायँ ? उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर ब्रह्माजी उनसे बोले-आपलोग भयभीत न हों, मैं ऐसा यज्ञ करूँगा, जिससे आप सभी लोगोंका कल्याण होगा ॥ २३-२४ ॥ भगवान् गजाननके प्रसन्न हो जानेपर उनके भक्तोंके लिये क्या असाध्य रहता है! आप सब लोग उनकी आराधना कीजिये, वे गणेश आप सभीका प्रिय करेंगे ॥ २५ ॥ मैं भी जगत्के ईश्वर, सभी कारणोंके भी परम कारण तथा आदि-अन्तसे रहित, उन भगवान् विनायकको प्रसन्न करूँगा। इस प्रकारसे कही गयीं वे सभी देवियाँ ब्रह्माजीके निर्देशानुसार दूरस्थित कल्याणकारी कर्नाटक देशको गयीं और वे वहाँ मन्दारवृक्षके मूलमें स्थित विघ्नेशका ध्यान करने लगीं ॥ २६-२७ ॥ उन विघ्नेश विनायककी पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने वक्रतुण्डनामसे स्थापना की थी और उनसे विविध वरोंको प्राप्तकर वे भगवान् श्रीराम प्रधान राक्षसोंको मारकर विजयी हुए थे। साथ ही विख्यात राक्षसराज रावणका वधकर अपनी पत्नी सीताको प्राप्तकर उन्होंने अपना धाम प्राप्त किया था। वहींपर उन सभी देवांगनाओंने कठोर तप किया ॥ २८-२९ ॥ कोई देवी गणेशजीके नाममन्त्रका जप करने लगी, कोई उनका मन्त्र जपने लगी और कोई पद्मासनमें स्थित होकर उन परमेश्वर गणेशका ध्यान करने लगी ॥ ३० ॥ कोई वीरासनमें स्थित हो गयी, कोई निराहार व्रतमें स्थित हो गयी। कोई-कोई मन्दिरके दरवाजोंकी, चौराहोंकी