श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तथा घरोंकी सफाई करने लगी ॥ ३१ ॥ कोई-कोई प्रदक्षिणा तथा बार-बार नमस्कार करती हुई श्रेष्ठ आराधना करने लगी, कोई पैरके एक अँगूठेमें खड़ी होकर विनायकके ध्यानमें निमग्न हो गयी ॥ ३२ ॥ कोई नेत्रोंको बन्द करके उनके स्तोत्रोंका पाठ करने लगी। इस प्रकार आराधना करते हुए बहुत-सा समय व्यतीत हो जानेपर भी वे विनायक प्रसन्न नहीं हुए ॥ ३३ ॥ तब वे अत्यन्त चिन्तित हो उठीं और अब हम क्या करें, ऐसा सोचते हुए व्याकुल हो गयीं। तदनन्तर कुछ देवियोंने पुष्पोंकी विशाल राशिको, दूसरी देवियोंने बहुतसे दूर्वादलोंको समर्पित करके धूप, दीप, नैवेद्य तथा स्वर्णद्वारा देव विनायकका पूजन किया। किसी देवीने मन्दारके पुष्पोंसे तथा किसीने स्वर्णकमलोंद्वारा उनकी पूजा की ॥ ३४-३५॥ तभी उन्होंने आकाशवाणी सुनी कि 'शमीपत्रके बिना की गयी पूजासे विभु गणेश प्रसन्न नहीं होते'। तदनन्तर उन सभी देवियोंने शमीपत्रोंके द्वारा परम भक्तिभावसे उन देवाधिदेव गजाननकी पूजा की। शमीदलोंके द्वारा पूजित होनेपर दयार्द्रहृदय होकर वे भगवान् गणेश उनके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। उस समय वे चार भुजाओंके द्वारा अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने किरीट तथा बाजूबन्द धारण कर रखा था। माला तथा कुण्डलोंसे वे मण्डित थे ॥ ३६-३८ ॥ उनके कान लम्बे थे। उनका गण्डस्थल सुशोभित हो रहा था। वे दो दाँतोंसे मण्डित थे। वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित थे। उनका वाहन मूषक भी साथमें था। वे पीले वस्त्रोंको धारण किये हुए थे। उन सभी देवियोंने करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाले उन भगवान् गणेशका दर्शन किया। उन्होंने अपनी आँखोंको बन्द करके भूमिपर गिरकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३९-४० ॥ उनका दर्शनकर उनका मुखमण्डल अत्यन्त प्रसन्न हो गया, वे परम आनन्दमें निमग्न हो गयीं, तब उन्होंने सौम्य तेजसे आच्छन्न विग्रहवाले उन भगवान् गजाननकी स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ ४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी और मन्दारकी प्रशंसाका वर्णन' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥ सैंतीसवाँ अध्याय देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति, गजाननसे वर प्राप्तकर देवोंको पुनः अपने पूर्ववत् स्वरूपकी प्राप्ति, देवताओंद्वारा हेरम्ब गणपति की मूर्तिका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, ब्रह्माजीद्वारा मन्दारकाष्ठसे निर्मित गणेशप्रतिमाका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, मन्दार तथा शमीके माहात्म्यका वर्णन कीर्ति बोली- हे महामुने! उन देवियोंने किस प्रकारसे उन गजाननकी स्तुति की, उसे मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ मुनि बोले- हे कीर्ते ! उस स्तुतिको मैं बताता हूँ, तुम ध्यान देकर उसे सुनो ॥ १ १/२ ॥ वे बोलीं- हे सर्वरूप ! आपको नमस्कार है, आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है। सब कुछ करनेवाले आपको नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करनेवाले कृपालु गणेशजीको नमस्कार है। सबका संहार करनेवालेको नमस्कार है। अनन्त शक्तिसे सम्पन्न आपको नमस्कार है। सबको ज्ञान प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। सबकी रक्षा करनेवाले तथा सबके आदिमें विद्यमान रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥ २-३ ॥ आप परब्रह्मस्वरूप हैं तथा निर्गुण हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। चिदानन्दस्वरूप आपको नमस्कार है, वेदोंसे भी अगोचर आपको नमस्कार है। आप मायाके आश्रय हैं, अपरिमेय हैं, गुणातीत हैं, आपको नमस्कार है। सत्यस्वरूप, अनन्तरूप और सत्त्वादि गुणोंमें विक्षोभ उत्पन्न करनेवालेको नमस्कार है ॥ ४-५ ॥ शरणागतोंका पालन करनेवाले तथा दैत्यों और दानवोंका भेदन करनेवाले आप गणेशजीको नमस्कार